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ट्रेन डायरी: लेडीज़ कोच की निजी दुनिया

अनुश्री फडनवीस | Updated on: 18 February 2016, 23:55 IST
QUICK PILL
  • मुंबई की लोकल ट्रेन वहां के लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा है. लोकल ट्रेन उन लोगों के लिए एक परिवार की तरह है जिनसे वे रोजाना सफर करते हैं. 
  • इस ट्रेन से चलने का अनुभव मेरे बचपन से जुड़ा है. जब मैं अपनी मां के साथ फैमिली फंक्शन में शामिल होने के लिए ट्रेन में सफर किया करती थी. जब मैंने कॉलेज की शुरुआत की तब ट्रेन में अकेले सफर करने का विचार मेरे लिए डरावना था.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुंबई की लोकल ट्रेन मुंबई की जीवनरेखा है. अगर यह रूकती है तो पूरा शहर थम जाता है. लोकल ट्रेन में तैयारियों के दौरान कई रिश्तें बनते हैं. अजनबी लोग यात्राओं के दौरान दोस्त बनते हैं और कई मामलों में यह बात शादी तक पहुंच जाती है.

वहीं महिलाओं का कोच अपने आप में किसी दुनिया की तरह है. एक तरह से उनका दूसरा घर. कई महिलाएं एक ही ट्रेन से रोजाना सफर करती हैं और यह सिलसिला सदियों से जारी है.

ट्रेन के भीतर एक समानांतर दुनिया है जहां महिलाएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं. वह इसमें स्वेटर बुनती हैं तो कई महिलाएं ऑफिस से फ्री होने के बाद जब ट्रेन में बैठती है तो वह रास्ते में सब्जी काटती चलती है ताकि घर पहुंचने के साथ समय पर खाना बनाया जा सके. कुछ महिलाएं ट्रेन में ही कपड़े बदल लेती हैं जबकि कुछ चलती ट्रेन में अपना मेक अप करती हैं और इसमें मैं भी शामिल हूं.

महिलाओं का कुछ समूह लगातार साथ चलता है लेकिन उनका परिचय बस ट्रेन में सफर तक ही है. यह उनके लिए परिवार का एक हिस्सा है. उन्होंने बताया कि महिलाओं के साथ यात्रा करने में उन्हें सहज महसूस होता है. इस दौरान उन्हें किसी तरह की चिंता नहीं होती. वह तमाम तरह की झंझटों से मुक्त रहती हैं. यहां एक शोर में भी खामोशी हैं.

मेरी इस ट्रेन से चलने का अनुभव मेरे बचपन से जुड़ा है. जब मैं अपनी मां के साथ फैमिली फंक्शन में शामिल होने के लिए ट्रेन में सफर किया करती थी. जब मैंने कॉलेज की शुरुआत की तब ट्रेन में अकेले सफर करने का विचारा मेरे लिए डरावना था. तब मैं अपने मां के साथ जाया करती थी. तब से लेकर आज तक मैंने ट्रेन में अपने कई काम पूरे किए, लोगों के साथ अपना टिफिन साझा किया और कई दोस्त भी बनाए. इतना ही नहीं मैंने इस कोच में सफ करते वक्त अपने फाइनल एग्जाम की तैयारी भी की.

लोकल ट्रेन मेरी दुनिया का हिस्सा रहा है. एक ऐसा हिस्सा जिसे मैं हमेशा अपने साथ रखना चाहूंगी. मेरी ट्रेन डायरी में फोटोग्राफ, डॉक्यूमेंट और कई सारे अनुभव हैं और यह सिर्फ मेरा नहीं दूसरों का भी है.

फोन का इस्तेमा करने से मुझे बेहद मदद मिली. मुझे इसके जरिये लोगों को और करीब से जानने का मौका मिला. कई बार लोगों को इससे परेशानी होती थी जब मैं फोटो लेने के लिए इसका इस्तेमाल करती थी. जब मैं डीएसएलआर  का इस्तेमाल करती तब लोग और भी ज्याद सतर्क हो जाते. उनके मन में कई तरह के सवाल होते.

लेकिन मुझे पता था कि एक दिन यह इतिहास का हिस्सा होगा. मुंबई को लोकल ट्रेन के बिना कल्पना करना मुश्किल है लेकिन किसे पता कि आने वाला भविष्य कैसा होगा. हो सकता है यहां मोनो रेल चलने लगे या फिर मेट्रो जिसमें लेडीज कोच जैसी कोई व्यवस्था ही नहीं हो. 

अभी तक के सफर में मेरी कई लोगों से मुलाकात हुई. कई मुलाकातें वैसी रहीं जिसकी यादें आज भी मेरे जेहन में जस की तस है. 

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First published: 18 February 2016, 23:55 IST
 
अनुश्री फडनवीस

Anushree is a photojournalist from Mumbai with Indus Images

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