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व्यंग्य: भविष्य से लौटी टाइम मशीन और एफटीआईआई में युधिष्ठिर का एक साल

संदीप सिंह | Updated on: 15 July 2016, 18:49 IST
QUICK PILL
नोट: दो साल पहले गुप्त रूप से शुरू हुए एक वैदिक-वैज्ञानिक अभियान के तहत टाइम मशीन का बीते साल प्रथम सफल प्रयोग किया गया. कंप्यूटर में सौ साल आगे का अरसा सेट किया गया था यानि ईसवी 2115 का. टाइम मशीन में दो ज्योतिष-विज्ञानी और बतौर उनके असिस्टेंट कॉस्मोलॉजी के दो वैज्ञानिक भेजे गए थे. ये अपनी जान पर खेलकर वहां से कुछ दस्तावेज लाए हैं. सरकार अब तक इन दस्तावेजों का अध्ययन कर रही है. मालूम पड़ा कि 2115 के लोगों ने भी बीते समय का इतिहास दर्ज किया है. कुछ एक दस्तावेज हमारे हाथ भी लग गए. एक-एक कर आपके सामने परोसा जाएगा.

दस्तावेज नंबर 1 

(मरहूम बड़े बुजुर्ग इब्ने इंशा से, दानिस्ता माफीनामे के साथ, ईसवी 2115 में)

“ये मुल्क हिंदुस्तान है. ये नाम इसको अरबों ने दिया था. ये मुल्क अफसानों और तारीख के फर्क में दिलचस्पी नहीं रखता था. अरसा सौ बरस पहले जब इसे हिन्दुस्थान बनाने की तैयारी चल रही थी, इसकी सरकार के नुमाइंदे एटम बम, सुपरसोनिक जेट, दिल की सर्जरी, ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी साइंस की करामातों को अफसानों और चौपायों की सूंडों वगैरह में ढूंढ लेने का दावा करते थे.

फिल-वक्तन सूबा-ए-हिंदुस्तान में जितनी भी हुकूमतें चलती थीं, जम्हूरी कही जाती थीं. चुनांचे इन सारी हुकूमतों को रामायण-महाभारत नाम के अफसानों से बड़ा प्रेम था. इन अफसानों पर सालाना टीवी सीरियलों और फिल्मों की आमद होती थी. गोया जब भी कोई चैनल घाटे की तरफ लुढ़कता या उसकी टीआरपी घटती, वह झट से इन कहानियों पर कोई मसाला सी चीज पेश कर अपना कारोबार बचा लेता. यही हाल सियासत का भी था. ये अफ़साने अवाम में बड़े मशहूर थे. इन अफसानों में अदाकारी करने वाले कलाकारों को हकीकी दुनिया में देखकर लोग-बाग उनके पैर छूने लगते थे. 

एक वक़्त ऐसा भी था जहां तीन टीवी सीरियलों 'रामायण', 'महाभारत' और ‘सास भी कभी बहू थी' के अदाकारों, साधुओं के कुछ अखाड़ों और दागियों से हिंदुस्थान की सरकारों की कैबिनेट भरी रहती थी.

दरअसल ये अफसाने नेता और कार्यकर्ता बनाने के कारखानों के रूप में काम करते थे. अफसानों की इन तारीखनुमा खदानों से तारणहारों की फसल मुसलसल पैदा होती रहती थी. यहां सियासत एक्टिंग करती और एक्टिंग सियासत.

बेवकूफ, बात-बात पर रोने वाली और हर गलत-सही को मान लेने वाली बहू का किरदार निभाने वाली एक औरत जो कभी विश्वविद्यालय नहीं गयी थी, मुल्क के विश्वविद्यालयों, कालेजों की तालीम देखने का मंत्रालय चला रही थी. गरचे उसकी ज्यादा दिलचस्पी हस्तरेखा 'विज्ञान' में थी. इसने तुलबा लोगों को बहुत हल्कान किया. दकन में एक बहुत ही जहीन दानिशवर तुलबा ने तो इससे तंग आकर खुदकुशी कर ली. बहुत हल्ला हुआ. सरकार की किरकरी हो गयी. सरकार ने डरकर उसे कपड़ा सीने का मंत्रालय दे दिया. 

'कृष्ण' जो जानवरों के डॉक्टर थे

महाभारत में भीम का किरदार निभाने वाला शख्स अब भी गदा लेकर एक पार्टी के दफ्तर जाता था. इसी अफसाने में कृष्ण का किरदार निभाने वाला शख्स जो असल में जानवरों का डाक्टर था, एक पार्टी के टिकट पर संसद का चुनाव जीत चुका था. वहीं रामायण में सीता का किरदार निभाने वाली औरत (जो असल जिन्दगी में अपने शौहर के साथ नेलपालिश और बिंदी का कारोबार चलाती थी) सती प्रथा का समर्थन करने वाली पार्टी के टिकट पर सूबा गुजरात के शहर वड़ोदरा से चुनाव जीतकर संसद पहुंच चुकी थी. मुल्क की सबसे पुरानी पार्टी का एक वजीरे-आजम (जिसे रामायण अफसाने के रावण के वंशजों ने मार डाला) अपनी मौत तक चाहता था कि टीवी सीरियल रामायण में राम का किरदार करने वाला शख्स उसके नाना के चुनाव क्षेत्र इलाहाबाद से चुनाव लड़ जाए. 

गोया ये लाइन बहुत लम्बी थी जिसमें अर्जुन, युधिष्ठर वगैरह को अभी और आना था. नोट करने वाली बात ये थी कि इन अफसानों में जामवंत, सुग्रीव, अंगद, कुंभकर्ण, विदुर का पार्ट करने वालों को ऐसा कोई मौका नहीं मिला. इसमें अपवाद सिर्फ हनुमाननुमा शख्स था. जिसको राष्ट्रवादी सरकार के कुछ मंत्रियों के ख्याल में मुल्क की फौज का ‘कमांडिंग चीफ’ होना चाहिए था. ये व्यक्ति लोगों के घरों की ताक-झांक और 'कोवर्ट ऑपरेशन' में माहिर था. वैसे यह न बताना भी गुनाह होगा कि असल रामायण के अफसाने में यही एक ऐसा व्यक्ति था जो बिना किसी स्वार्थ के सेवाएं दे रहा था.

देखने वाली बात ये थी कि 'धर्म' और 'कर्म' के नाम पर इन अफ़सानों में हर तरह की बेईमानी,  झूठ, धोखा-गद्दारी, नापाक चीजों को महिमामंडित किया गया था जिससे जाहिरा तौर पर इसके अदीब या अदीबों की नीयत पर शक उठता था. ये लोग मारने से पहले इन्सान से उसकी बुलेटप्रूफ जैकेट (कवच-कुंडल) धोखे से मांग लेते थे. हाथी को मारकर बताते थे कि बेटा मरा और गमजदा वालिद का सिर काट लेते थे.

'जुआड़ी' युधिष्ठर

दस्तावेज बताते हैं कि अरसा सौ बरस पहले टीवी सीरियल महाभारत में युधिष्ठिर का रोल करने वाले शख्स को कैमरा चलाने और सिनेमा सिखाने वाले एक आला संस्थान का अध्यक्ष बनाये जाने पर बहुत बवाल हुआ. इस शख्स की कुल जमा पहचान सत्ताधारी पार्टी में होने के साथ-साथ, एक 'बलात्कारी' बाबा के चरणों में लोटने और दोयम दर्जे की सस्ती फिल्मों में काम करने वाले की थी. यह शख्स, मुल्क के तत्कालीन वजीर-ए-आजम को भगवान कृष्ण मानकर पूजता था और उसका नाम लेकर 'यदा यदा हि धर्मस्य' करता रहता था.

असल महाभारत अफसाने में भी यह एक घटिया दर्जे का जुआरी था और जुए में अपनी बीवी, भाइयों और पूरे राजपाट को दांव पर लगाकर हार चुका था. इसकी आंख के सामने इसकी बीवी के कपड़े उतरते रहे और ये चुपचाप बैठा रहा. आगे की तारीख में इसके लिजलिजेपन को छुपाने के लिए विद्वानों ने इसे धर्मराज कहना शुरू कर दिया.

बगल के मुल्कों को ऐसा कोई अफसाना न मिल सका जिनसे वे अपनी सियासी, दीनी और इल्मी जरूरतें पूरी कर सकते. चुनांचे उन्होंने पढ़ने, खासकर औरतों के पढ़ने, अदाकारी करने, नबियों को परदे पर उतारने, नाचने-गाने जैसी फितना हरक़तों पर ही रोक लगा देने की कोशिश 'न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी' की तर्ज़ पर की थी. यही सपना भारतवर्ष के कुछ बिरादरान का भी था. आज सौ बरस बाद यह बताने का सबब यही है कि एक वक़्त में ऐसा भी हुआ था, ताकि सनद रहे.” 

First published: 15 July 2016, 18:49 IST
 
संदीप सिंह @catchhindi

लेखक जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं. छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं. पढाई-लिखाई राजनीती विज्ञान, हिन्दी और दर्शनशास्त्र में हुई है. आजकल कलम की मजदूरी करते हैं. 

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