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हुर्रे की मौत छत्तीसगढ़ का एक और भयावह सच भर है

राजकुमार सोनी | Updated on: 16 May 2016, 7:45 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ में कोई आधिकारिक आपातकाल लागू नहीं है. लेकिन पुलिस कारस्तानियां एक अघोषित आपातकाल का संकेत देती है.
  • आदिवासी महिला करटम हुर्रे की मौत पुलिस के मनमाने रवैए का नतीजा कही जा रही है, जिसके पति को कथित नक्सली बताकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उसके परिजनों को खबर तक नहीं दी.

बस्तर में माओवाद और सरकार के बीच जारी हिंसा में आम नागरिक किस तरह पिस रहा है, हुर्रे की मौत उसकी दिनोंदिन मोटी होती किताब का एक और पन्ना भर है. लेकिन मानवता के लिए हुर्रे की मौत कभी न खत्म होने वाला अध्याय है. तमाम अध्ययनों और जांच रिपोर्टों में इस बात का खुलासा हो चुका है कि बस्तर में माओवाद के खात्मे के नाम पर अघोषित युद्ध चल रहा है. इस युद्ध के बीच जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहे आदिवासियों को कभी न्याय मिल पाएगा या नहीं?

हुर्रे नाम की आदिवासी महिला अब इस दुनिया में नहीं है, मगर हुर्रे की दास्तान बंदूक की नली पर टिकी हुई क्रूर व्यवस्था के नंगे और भयावह सच को उजागर करने के लिए काफी है.

खुशियां बरबाद

जिंदगी के कुछ बेहद खुशनुमा पड़ावों में एक है मातृत्व का सुख. लेकिन हुर्रे करटम की जिंदगी में यह मातृत्व का पल दु:स्वप्न बनकर आया.

tribal women

बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में स्थित बड़ेगुडरा में रहने वाली आदिवासी महिला हुर्रे को नहीं मालूम था कि उसके पति हुंगा करटम का जंगल जाकर मुर्गियां पकड़ना उसकी पूरी जिंदगी को बरबाद कर देगा. पिछले महीने 13 अप्रैल को हुंगा अपने कुछ साथियों के साथ जंगल में गया तो सर्चिंग के लिए निकली पुलिस ने उन पर माओवादी होने के शक पर फायरिंग कर दी.

जंगली मुर्गे को पकड़ने के लिए जाल बिछाए बैठे करटम पंडू के पैर में गोली लगी जबकि सात अन्य ग्रामीणों ने जान बचाने के लिए खुद को पुलिस के हवाले कर दिया. गिरफ्तार किए गए ग्रामीणों में करटम हुंगा भी शामिल था. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक कमल लोचन कश्यप ने बताया कि सभी खूंखार माओवादी थे और मैलावाड़ा और मोकपाल के बीच सीआरपी जवानों को मौत के घाट उतारने के लिए किए गए विस्फोट की घटना में शामिल थे.

जो ग्रामीण गिरफ्तार किए गए थे उन्हें माओवादी होने के आरोप में जेल भेज दिया गया मगर पुलिस ने उनके परिजनों को इस बात की सूचना तक नहीं दी की उन्हें क्यों और किस आरोप में गिरफ्तार किया गया या उन्हें कहां ले जाया गया.

हुर्रे अपने पति की तलाश में निकल गई. उस समय वह अपने गर्भ के आखिरी चरण में थी

जंगल की बात जंगल में आग की तरह फैली तो हुर्रे अपने पति की तलाश में निकल गई. उस समय हुर्रे अपने गर्भ के आखिरी चरण में थी. हुर्रे अपने पति की तलाश में इधर-उधर भटकती हुई पुलिस मुख्यालय जा पहुंची. वहां एक सिपाही ने उसके साथ हाथापायी की जिसमें बंदूक की बट उसके पेट मेें जा लगी.

पति के अचानक गायब होने के दुख और पुलिस के बट से लगी चोट लिए हुर्रे अपने गांव बड़ेगुडरा लौट आई. कुछ दिनों बाद ही उसने एक कमजोर से बच्चे को जन्म दिया. ग्रामीणों को बच्चे के पैदा होने की कोई ठीक-ठाक तारीख याद नहीं है. ग्रामीण बताते हैं, बच्चे की पैदाइश के बाद हुर्रे को बढ़िया खुराक और आराम की जरूरत थी लेकिन वह अपने पति की तलाश फिर से निकल पड़ी.

किसी ने हुर्रे को बता दिया था कि पुलिस जिसे भी पकड़ती है उसे जेल में बंद कर देती है. गोंडी बोली बोलने वाली हुर्रे बच्चे को छाती से चिपकाए सुबह जेल के बाहर खड़ी हो जाती और फिर शाम तक इस बात का इंतजार करती कि उसका पति शायद किसी समय बाहर निकले.

हुर्रे बच्चे को छाती से चिपकाए सुबह जेल के बाहर खड़ी हो जाती और शाम तक इंतजार करती कि उसका पति शायद बाहर निकले

बाद में एक ग्रामीण की मदद से हुर्रे सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी के पास पहुंची तो पिछले महीने 27 अप्रैल को काफी हील-हुज्जत के बाद उसे अपने पति से मिलाया गया. पति हुंगा ने बच्चे की देखभाल करने की बात कही थी लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. बच्चे के जन्म के तुरंत बाद से लगातार पति की तलाश में खानी-पीना छोड़कर भटक रही हुर्रे बीमार होती चली गई.

अतत: चल बसी हुर्रे

11 मई को सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया, अधिवक्ता शालिनी गेरा, लिंगा कोड़पी, अरविंद गुप्ता और कुछ अन्य लोगों की मदद से हुर्रे को जगदलपुर के महारानी अस्पताल में दाखिल किया गया तो डाक्टरों ने पूरे शरीर में इंफेक्शन फैलने की बात कही. यह भी कहा कि उसके दिमाग ने भी काम करना बंद कर दिया है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं की माने तो अस्पताल में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं का अभाव था. नर्स थी तो डाक्टर नहीं थे और कभी डाक्टर परीक्षण के लिए आते थे तो उनका सीधा जवाब होता था- कुछ नहीं हो पाएगा. इन्हें रायपुर शिफ्ट कर दीजिए. अतत: 15 मई को आदिवासी महिला हुर्रे ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस बात की कोशिश की कि जेल में बंद हुंगा उसकी पत्नी को आखिरी बार देख लें. मगर यह भी संभव नहीं हो पाया.

हुर्रे की दर्दनाक मौत किसी इतिहास का हिस्सा शायद न बन पाए मगर हमारी सड़ी-गली व्यवस्था पर करारा सवाल जरूर है? छत्तीसगढ़ में सरकार माओवाद के नाम पर जिस तरह की डंडाशाही चला रही है वह आने वाले बुरे समय का संकेत है. पुलिसराज और क्या होता है? हुर्रे की मौत इसका नमूना है.

First published: 16 May 2016, 7:45 IST
 
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