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एनडीए सरकार में 12 साल बाद एक बार फिर कांग्रेस के साथ वही हो रहा है...

राजीव भट्टाचार्य | Updated on: 19 December 2015, 23:36 IST
QUICK PILL
  • अरुणाचाल का संकट केंद्र की ताकतवर सरकारों के इशारे पर होने वाली उठापटक का एक और नमूना भर है. इस तरह की स्थिति 1998 में उत्तर प्रदेश में भी देखी जा चुकी है.
  • 2003 में जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी उस समय भी कांग्रेस की सरकार को इसी तरह की तोड़फोड़ और षडयंत्र करके बीजेपी ने अपदस्थ कर दिया गया था.
12 साल बाद अरुणाचल प्रदेश में सरकार गिराए जाने का इतिहास दोहराया जा रहा है. 2003 में जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी उस समय भी कांग्रेस की सरकार को बीजेपी द्वारा अपदस्थ कर दिया गया था.

2003 में गेगांग अपांग के नेतृत्ववाले गठबंधन ने राज्य में कांग्रेस और मुख्यमंत्री मुकुट मिथी की सरकार गिरा दी थी. हालांकि, कुछ सालों बाद वह अपने विश्वास पात्रों के साथ फिर से कांग्रेस में वापस चले गए थे. उसके बाद पिछले साल लोकसभा चुनाव से पहले अपांग ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और बीजेपी का दामन थाम लिया.

इस पहाड़ी राज्य में 26 प्रमुख जनजातियां है जबकि करीब एक सौ उप जनजातियां है. उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों की तुलना में आदिवासी जनजातियां पार्टी से ज्यादा अपने समुदाय के प्रति वफादार हैं.

वर्तमान मुख्य मंत्री नबाम तकी निशी जनजाति से आते हैं जिनकी संख्या राज्य में सर्वाधिक है

हर विधानसभा चुनाव के बाद सत्ताधारी पार्टी को सभी जनजातियों से अच्छे संबंध रखने वाले मिलनसार प्रतिनिधियों को खोजने का बेहद कठिन कार्य करना पड़ता है.

गेगांग अपांग आदि जनजाति से आते हैं. दो दशकों से ज्यादा समय तक उनके मुख्यमंत्री रहने के कारण निशी जैसी बड़ी जनजातियों के बीच अंसतोष उभरा है. वर्तमान मुख्य मंत्री नबाम तकी निशी जनजाति से आते हैं जिनकी संख्या राज्य में सर्वाधिक है. तकी पर आरोप है कि उन्होंने अंजॉ और लोहित जैसे पूर्वी जिलों की जनजातियों को नजरअंदाज किया है.

अरुणाचल प्रदेश में पिछले साल मई में नुबाम तकी की सरकार को हटाने का प्रयास विधानसभा चुनाव के बाद से ही शुरू हो गया था लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उनके पीछे मजबूती से खड़ा रहा. सरकार बनाने का मौका देख बीजेपी ने कांग्रेस के अंदर उभरे असंतोष का फायदा उठाना शुरू किया और असंतुष्ट विधायकों को समर्थन देना शुरू कर दिया.

इस मामले में राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. उन्होंने जितनी सक्रियता निभाई उसके फलस्वरूप ही अरुणाचल में सरकार का संकट बढ़ा और मामला गुवाहाटी हाईकोर्ट पहुंच गया.

राजखोवा पिछले साल जून में अरुणाचल के राज्यपाल बने. पदभार संभालने के साथ ही उनका टकराव राज्य सरकार से शुरू हो गया था. उन्होंने सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और ईटानगर की कानून-व्यवस्था को लेकर टिप्पणी की.

राजखोवा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर असम स्थित लीलाबरी एयरपोर्ट के आधुनिकीकरण की मांग की. तकी सरकार ने राजधानी ईटानगर के पास एक नए ग्रीनफील्ड परियोजना की मांग की थी. राज्यपाल के एयरपोर्ट आधुनिकीकरण की मांग राज्य सरकार की मांग के खिलाफ चली गई. इस मसले ने सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव बढ़ा दिया. अरुणाचल प्रदेश देश के उन कुछेक राज्यों में है जहां की राजधानी में एयरपोर्ट की सुविधा नहीं है.

प्रदेश में चल रहे संवैधानिक संकट को देखते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट की अरुणाचल प्रदेश बेंच ने विधानसभा के सत्र पर दो फरवरी तक के लिए रोक लगा दी है. साथ ही, बागी विधायकों और बीजेपी विधायकों द्वारा की गई कार्रवाइयों पर स्थगन आदेश जारी किया है.

कांग्रेस के विधायकोंं समेत कुल 33 विधायक ने कलिखो पुल को राज्य का नया मुख्यमंत्री चुन लिया

यहां विधानसभा की 60 सीटें है. इनमें कांग्रेस के 47 विधायक है. स्पीकर राबिया 14 विधायकों को अयोग्य ठहरा चुकी हैं. लेकिन बुधवार को सदन के बाहर एक स्थानीय होटल में हुई बैठक में कांग्रेस के 20 विधायक, बीजेपी के 11 विधायक और दो निर्दलीयों ने स्पीकर को ही 'अयोग्य' ठहरा दिया. बागी विधायक राज्यपाल द्वारा समय से एक महीने पहले बुलाए गए विधानसभा सत्र का समर्थन कर रहे थे. अरुणाचल में यह सत्र पहले 14 जनवरी से प्रस्तावित था.

इसके ठीक अगले दिन अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों ने कलिखो पुल को राज्य का नया मुख्यमंत्री चुन लिया है. नहारा लगुन में एक होटल के कराटे ट्रेनिंग सेंटर में हुई बैठक में विधानसभा के कुल 60 में से 33 सदस्यों ने कलिखो पुल के पक्ष में वोट कर उन्हें अपना नेता चुना.

पुल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण कैबिनेट मंत्री के पद से हटा दिया गया था. उनके साथ 13 विधायकों को पिछले सोमवार स्पीकर ने अयोग्य ठहराया है.

राज्यपाल जेपी राजखोवा से नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने राज्य विधानसभा द्वारा लिए गए सभी फैसलों पर रोक लगा दी

पिछले महीने सीएम तकी के 16 विश्वासपात्र विधायकों ने डिप्टी स्पीकर टी नोरबू थोंगडेक को हटाने के लिए महाभियोग लाया था. वहीं कांग्रेस के भी बागी 11 विधायकों ने स्पीकर राबिया के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया. संयोग से राज्यपाल की सूची में बागी विधायकों लाया महाभियोग प्रस्ताव राज्यपाल की सूची में पहले नंबर पर था.

इस मामले ने संवैधानिक संकट को और बढ़ा दिया. पूर्व केंद्रीय मंत्री व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने विधानसभा स्पीकर नबाम राबिया की रिट याचिका पर बहस करने के लिए गुरुवार को गुवाहाटी पहुंचे.

सिब्बल ने कोर्ट में तर्क दिया कि राज्यपाल द्वारा सत्र एक महीने पहले बुलाने का निर्णय़ संविधान की धारा 174 और 175 का उल्लंघन है. इस मामले की अगली सुनवाई अब एक फरवरी को होगी.
First published: 19 December 2015, 23:36 IST
 
राजीव भट्टाचार्य @catchhindi

गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार. 'रांदेवू विथ रिबेल्सः जर्नी टू मीट इंडियाज़ मोस्ट वांटेड मेन' किताब के लेखक.

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