Home » इंडिया » Triple Talak: all political parties are doing their own politics on this issue
 

ट्रिपल तलाक पर बीजेपी का अभियान, मगर बाकी दल चुप

कैच ब्यूरो | Updated on: 21 October 2016, 8:28 IST
QUICK PILL
  • जब से सुप्रीम कोर्ट ने निकाह, हलाला और बहुविवाह प्रथा की तहकीकात की कवायद शुरू की है, तब से कई विपक्षी दलों ने राजनीतिक नफ़ा-नुकसान को ध्यान में रखते हुए इसपर साध ली है.  
  • विपक्षी दल, कांग्रेस ने यह कहते हुए कुछ भी कहने से इस आधार पर मना कर दिया है कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है.

अगले साल कई राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों, खासकर उ.प्र. में कांग्रेस कठिन चुनौतियों का सामना कर रही है.  पार्टी ने इस मुद्दे पर कोई भी रुख नहीं अपनाया है कि कहीं बहुसंख्यक या अल्पसंख्यकों में कांग्रेस के प्रति गुस्सा न भड़क उठे. 

पार्टी क्या रुख अपनाएगी, इस बारे में जब पूछा गया तो कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता हैं, प्रतिवादी हैं, न्यायाधीश हैं और सबकुछ न्यायालय में है. इससे पहले भी पार्टी प्रवक्ता इस मुद्दे पर कोई भी टिप्पणी करने से बचते रहे हैं और मामला न्यायालय में होने का कार्ड खेलकर विवाद से दूर रहे हैं.

हालांकि कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता शोभा ओझा ने दावा किया था कि पार्टी महिला सशक्तिकरण के पक्ष में खड़ी है लेकिन पार्टी ने ट्रिपल तलाक को 'ट्रिकी मैटर' कहते हुए कहा था कि इसके निपटारे का काम सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया जाना चाहिए. 

इसी 16 अक्टूबर को, जब पूर्व सांसद ओबेदुल्लाह खान आजमी, जो हाल ही में, कांग्रेस में शामिल हुए हैं, ने ट्रिपल तलाक पर अपने विचार रखना चाहे तो गुलाम नबी आजाद ने उन्हें कुछ भी कहने से रोक दिया और कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए.

हालांकि इससे पहले आजमी ने कहा कि अगर सरकार इसका दुरुपयोग करने की कोशिश करती है या इस मुद्दे पर कोई गलत कदम आगे बढ़ाती है तो मैं इसके खिलाफ संघर्ष करूंगा. मैं अपनी पूर्ण व्यक्तिगत क्षमता के साथ इसका विरोध करूंगा. 

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के पदाधिकारी आजमी शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ जोरदार आवाज में जनता के बीच भाषण देते रहे हैं.

शाहबानो पर राजनीति

लगता है कि शाहबानो मामले में जो खेल कांग्रेस ने खेला था, उससे जो राजनीतिक गिरावट आई, वह पार्टी नेतृत्व के दिलो-दिमाग में घूम रही है जिसके चलते ट्रिपल तलाक पर पार्टी के लिए कोई भी रुख अपनाने में मुश्किल आ रही है. 

1985 में, शाहबानो ने गुजारा भत्ता न देने पर अपने पति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक मामला दायर किया था. पति ने 43 साल पुरानी शादी खत्म कर दी थी. शीर्ष न्यायालय ने उनके पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था जिससे अल्पसंख्यक समुदाय भड़क उठा था.

फिर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अवैध बताते हुए मुस्लिम वूमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑफ इवोर्स) एक्ट-1986 पारित कर दिया था जिसे व्यापक रूप से मुस्लिम समुदाय को खुश करने वाला कदम माना गया था. 

हालांकि, इस कदम का उल्टा असर हुआ. 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें घटकर 197 पर आ गईं जबकि 1984 में उसे 404 सीटें मिली थीं.

सुप्रीम कोर्ट

अब ठीक उसी तरह की परिस्थितियां हैं, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट-1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका को सुनने का निश्चय किया. याचिका शायरा बानो ने दाखिल की थी. शायरा बानो की याचिका ने पेन्डोरा बॉक्स खोल दिया जिसके कारण राजनीतिक दलों पर ट्रिपल तलाक पर टिप्पणी करने के लिए दबाव बना.

इसके बाद शीर्षस्थ न्यायालय ने केन्द्र सरकार से उसका पक्ष जानना चाहा. केन्द्र सरकार ने 07 अक्टूबर को पेश अपने हलफनामे में कहा कि ट्रिपल तलाक, निकाह, हलाला और बहु विवाह प्रथा इस्लाम का आंतरिक हिस्सा नहीं है और धार्मिक लिहाज से भी जरूरी नहीं है. 

अपने शपथपत्र में केन्द्र ने यह भी कहा है कि तथ्य तो यह है कि मुस्लिम देशों, जहां इस्लाम राज्य का धर्म है, ने भी  सुधारों की ओर कदम बढ़ाते हुए स्थापित किया है कि इस प्रथा को इस्लाम के आंतरिक हिस्से अलाव आवश्यक धार्मिक प्रथा के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. 

विधि आयोग

इसके बाद विधि आयोग की वेबसाइट पर सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार के वास्ते जनता की राय मांगने के लिए एक प्रश्नावली डाली गई. आयोग का कहना था कि इस कवायद का उद्देश्य यही है कि समूहों में समानता आ सके.

इससे भी मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक संगठनों में गुस्सा भड़क उठा और उन्होंने प्रश्नावाली को खारिज कर दिया. एआईएमपीएलबी ने कहा कि इससे सामाजिक अशांति बढ़ेगी. हालांकि, लगता है कि बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक समुदाय के अपने से दूर चले जाने की चिन्ता के डर से विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस की राह अपना ली और वे इस मुद्दे पर सरकार की राह पर चलने से बचते रहे.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी न्यायालय में मामला लम्बित होने का कार्ड खेला और इस विवादित मुद्दे पर वह कोई भी बयान देने से बची. तृणमूल कांग्रेस ने भी यूसीसी और ट्रिपल तलाक पर भाजपा सरकार का सीधे विरोध किए बिना कहा कि सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए. 

टीएमसी प्रवक्ता डेरेक ओ ने ट्वीट किया, 'हमारा संविधान हमारा निर्देशक है. हम सार्वभौमिक, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य हैं. ऐसे में सभी धर्मों के विश्वासों और परम्पराओं का इस महान राष्ट्र में सम्मान किया जाना चाहिए.

हालांकि, केवल वाम दलों ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) थोपे जाने की किसी भी योजना के खिलाफ अपने मुखर विचार व्यक्त किए हैं. जनता दल (य़ू) ने भी केन्द्र के इस कदम को 'मुद्दाहीन डिबेट' बताया है जबकि ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमान के नेता असाउद्दीन ओवैसी ने दावा किया कि समान नागरिक संहिता देश की विविधता और बहुलवाद को नष्ट कर देगी.

और, जैसी उम्मीद ही थी, एनडीए सरकार के सहयोगी दल जैसे शिव सेना ने सरकार के रुख का समर्थन किया है और समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की वकालत की है ताकि एक और सबके लिए न्याय सुनिश्चित हो सके.

First published: 21 October 2016, 8:28 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी