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'ट्रिपल तलाक अमानवीय, क़ुरआन विरोधी और संविधान विरोधी है'

सादिक़ नक़वी | Updated on: 19 April 2017, 9:49 IST

 


ट्रिपल तलाक का मुद्दा देशभर में छाया हुआ है और एक प्रमुख मुद्दे के रूप में अधिक महत्वपूर्ण बनता जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओडिशा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में रविवार के अपने सम्बोधन में इस मुद्दे को बेबाक तरीके से उठाया है.


प्रधानमंत्री के भाषण का उद्धरण देते हुए सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने जहां मुस्लिम महिलाओं को इस मामले में न्याय दिलाने की वकालत की है, वहीं यह भी कहा है कि हमारी बहनों को इस सामाजिक अन्याय से बचाना चाहिए. मुस्लिम महिलाओं को भी न्याय मिलना चाहिए.


सोमवार को उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि जो लोग तीन तलाक जैसे गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं, वे भी उतने ही बड़े दोषी हैं, जितने इस रिवाज को मानने वाले. मुख्यमंत्री ने इसकी तुलना महाभारत के एक प्रकरण द्रौपदी के चीरहरण से कर दी है.


लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टी के इस मुद्दे को बढ़ावा देने से ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड भी सरकार के सामने आ गया. नदवातुल उलेमा में आयोजित अपनी दो दिवसीय बैठक में बोर्ड ने दावा किया कि यह संवैधानिक बाध्यता है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ का लागू किया जाए. बोर्ड ने इस मुद्दे पर एक आचार संहिता भी जारी की और उल्लंघनकर्ताओं को उनके सामाजिक बहिष्कार की धमकी भी दी.

यह भी कहा कि पर्सनल लॉ में दखल बर्दाश्त नहीं है. तीन तलाक शारिया कानूनों के तहत वैध है. इसके एक दिन पहले ही शिया विद्वानों ने इस बात का समर्थन किया था कि बोर्ड तीन तलाक पर रोक लगाए जाने के पक्ष में है और वह अपने ही एक वर्ग सुन्नी समुदाय से विरोध का सामना कर रह है. ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास ने कथित रूप से बोर्ड की तरफ से एक अपील में कहा था कि यह किसी भी हालत में जायज नहीं है. यह इस्लाम की छवि के खिलाफ है.

 

इस मुद्दे पर जारी गरमागरम बहस के बीच कैच ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान से बात की. आरिफ इस तरह की प्रथा के मुखर आलोचक हैं और कई मुद्दों पर अपनी आवाज बुलन्द करते रहते हैं जिनका भारतीय मुसलमान सामना करते हैं. यह वही आरिफ खान हैं जो शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में संसद में उठ खड़े हुए थे.

अपने इस इंटरव्यू में खान ने ट्रिपल तलाक, मुस्लिम पर्सनल लॉ की भूमिका और मुसलमानों को शाहबानो मामले से क्या सीखना चाहिए जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की.

 

इंटरव्यू


आप प्रधानमंत्री मोदी के मुस्लिमों को न्याय सम्बंधी बयान विशेषकर कि तीन तलाक को लेकर दिए बयान को किस नज़रिए से देखते हैं? उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि पिछड़े मुसलमानों को किस तरह लाभ मिले, इस पर भी सकारात्मक कदम उठाना चाहिए.

सरकार का संवैधानिक दायित्व लोगों को प्रभावी रूप से सुरक्षित और संरक्षित रखते हुए उनके कल्याण को बढ़ावा देना है. यह एक सामाजिक व्यवस्था हो सकती है जिसमें न्यायिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टकोण शामिल है. इसमें राष्ट्रीय जीवन के सभी तथ्य समाहित हैं. तथ्य तो यह है कि प्रधानमंत्री ने भारतीयों के पिछड़ेपन के प्रति अपने कर्तव्य को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है, जिसमें मुस्लिम भी शामिल हैं. इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

तीन तलाक एक अत्याचार और नृशंसता है. यह न केवल पवित्र कुरान में निर्धारित तलाक की प्रक्रिया को कम करता है बल्कि महिलाओं की गरिमा और समानता के स्टेटस को अपमानित करने के साथ ही देश के कानून का भी उल्लंघन करता है. बड़ी संख्या में मुस्लिम विशेषकर मुस्लिम महिलाएं लगातार इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं और विरोध में लेख लिख रही हैं. प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य है कि वह धार्मिक जुड़ाव की परवाह किए बिना सभी नागरिकों की चिंताओं को दूर करें और उस पर ध्यान दें.


दूसरी बात तो यह है कि शरियत एप्लीकेशन एक्ट, जिसके तहत इस घृणित और कुटिल चलन को वैधानिकता मिली है, वह भारतीय संसद की देन है. कानूनी रूप से इसे केवल एक नया कानून बनाकर या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के माध्यम से बदला जा सकता है. प्रधानमंत्री जी ने तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं के प्रति जो संवेदनशीलता दिखाई है, मैं व्यक्तिगत रूप से उसका स्वागत करता हूं. मुझे उम्मीद है कि यह पुरानी कष्टदायी प्रथा कानूनी रूप से जल्द ही बंद हो जाएगी जिसमें शादी को तोड़ने के लिए पुनर्विचार करने या फैसले को बदलने का कोई मौका ही नहीं मिलता. जैसा कि अधिकांश देशों में किया गया है जहां मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू हैं.

 

मुस्लिम नेतृत्व इस सरकार के साथ इतना असंतुष्ट क्यों है?

आपको यह सवाल उन लोगों से पूछना चाहिए जिनके बारे में आपका सोचना है कि वे इस सरकार के साथ मेलजोल रखने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं. मुझे अखबारों के जरिए जितना मालुम हुआ है, वह यह है कि वे लोग अधिकारियों के साथ बैठकें करते हैं. इन बैठकों के दौरान उन्हें सरकार के सामने अपने विचार रखने चाहिए.

 

क्या आप सोचते हैं कि सिर्फ तीन तलाक जैसे चुनिन्दा मुद्दों पर सरकार ने अल्पसंख्यकों वर्गों के भीतर इस संदेह को और बढ़ाया है?

आपका सवाल मुझे मौलाना आजाद के उस बयान की याद दिलाता है जो उन्होंने पाकिस्तान की मांग पर मुस्लिम लीग को सम्बोधित करते हुए कहे थे. उन्होंने कहा था, - आपके पास अपनी असाधारण आसक्ति और निश्चय है, पूर्वाग्रह हैं जिन्हें आप अपने अच्छे विचारों के रूप में मानते हैं. आपके पास आपकी आशंकाएं हैं, जिन्हें आप अपना समाधान मानते हैं. ख़ुदा के लिए मुझे बताओ कि मैं आपके साथ क्या करूं?

मौलाना के बयान का श्रोताओं पर जादुई असर पड़ता था. मैं उनके बयान को अपने शब्दों में उद्धृत करना चाहता हूं- वासवस हैं जिनको तुम अफकार समझते हो, खतरत हैं जिनको तुम अजैम कहते हो, खुदारा बतलाओ मैं तुम्हारे साथ क्या करूं.

 

उर्दू में इस मुहावरे का मतलब है शक्की आदमी का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है. आपके सवाल के जवाब में मैं केवल एक ही बात कहना चाहता हूं कि तीन तलाक के मुद्दे पर संवेदनशीलता के अभाव के साथ ही गलत बातें फैलाई गई हैं. मेरे लिए तलाक का वास्तविक उदाहरण महत्वपूर्ण नहीं है. मुझे जो सबसे खराब बात जो लगती है, वह यह है कि एक मुस्लिम लड़की इस जानकारी के साथ बड़ी होती है कि शादी के बाद ससुराल में अपनी तरफ से बिना किसी गलती के उसे अपने मां-बाप के घर लौटना है.

निकाह की रस्म तभी पूरी होती है जब वह अपनी रजामंदी दे देती है लेकिन तलाक तो उसे बिना किसी नोटिस के ही मिल जाता है. यह अमानवीय है, कुरान विरोधी है और संविधान विरोधी भी. इस अत्याचार को खत्म करने के लिए हर किसी को सभी तरफ से आगे आना चाहिए.


ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खुद को मुस्लिम हितों का संरक्षक होने का दावा करता है. क्या इसे कोई कानूनी मान्यता मिली हुई है?

यह संस्था मदरसा के विद्वानों की संस्था है और मुझे शक़ है कि क्या यह पंजीकृत संस्था है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को अपने संदस्यों के जरिए प्रतिनिधित्व करने का हर अधिकार है लेकिन उसे यह दावा करने का कोई अधिकार नहीं है कि वही इस समुदाय या धर्म का एकमात्र प्रवक्ता है.

शाहबानो मामला पूरी तरह से किसी भी कानूनी या संवैधानिक मुद्दों की समझ की कमी के बारे में व्याख्या करता है. आपने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष अली मियां की बायोग्राफी पढ़ी होगी. वॉल्यूम 4 में वह दावा करते हैं कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने वाले विधेयक का प्रारूप तैयार करने में व्यक्तिगत रूप से भूमिका निभाई थी. वह इस तथ्य को अंडरलाइन करते हैं कि प्रधानमंत्री ने इस विधेयक को अप्रवूल तभी दिया जब अली मियां और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उनके सहयोगियों ने प्रारूप विधयेक को प्रावधानों का समर्थन कर दिया.

लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने यह बताया कि नया कानून मुस्लिम पुरुष की इद्दत की अवधि के दायित्व को सीमित नहीं करता है, वरन इद्दत की अवधि के भीतर भुगतान करने के लिए उसे बाध्यकारी बनाता है. और यह भुगतान उचित और न्यायसंगत होना चाहिए, इसलिए इसे महिला की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए. इस फैसले के बाद अली मियां ने कहा था कि शाहबानो के केस में ऐतिहासिक आन्दोलन के बाद फैसले से यही साबित हुआ, 'खोदा पहाड़ और निकली चुहिया.'

उन्होंने शाहबानो को 174 रुपए का भुगतान किए जाने का भी विरोध किया था. लेकिन अब एक ऐसा ही मामला जिसमें वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है, उसमें 10 लाख रुपए से ज्यादा का भुगतान करने का आदेश दिया गया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सीआरपीसी की धारा 125 मुस्लिम पतियों पर लागू नहीं होती जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नया कानून तलाकशुदा मुस्लिम महिला को धारा 125 के तहत राहत राशि मांगने से नहीं रोकता. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उसके नेतृत्व को श्रेय देना होगा कि इतने तुच्छ और दयनीय प्रदर्शन के बाद भी वे अभी भी समुदाय के हितों का संरक्षक होने का दावा करते हैं.

 

भारतीय मुसलमानों के पास ट्रिपल तालक जैसे मुद्दों से निपटने के लिए सबसे अच्छा रास्ता क्या है?

क़ुरआन विरोधी, गैर-मानवीय और संविधान विरोधी इस चलन को जल्द से जल्द खत्म करना ही रास्ता है.

 

क्या कोई पर्सनल कानून को पीछे की ओर देख रहे समुदायों के लिए छोड़ सकता है और जो सुधार के लिए अनिच्छुक हैं?

कोई भी समुदाय पूरी तरह ऐसा नहीं है जो पीछे की ओर देख रहा हो लेकिन मौलवियों और मौलवियों के द्वारा, मेरा मतलब है कि जिनके लिए धर्म पेशे का मामला है, पूर्ण विश्वास का नहीं, उनकी पीछे की ओर देखने में स्वार्थपूर्ण रुचि हो सकती है. वे इसे बनाए रखना चाहते हैं जिससे वे विवादों को हवा दे सकें ताकि लोग उनसे फतवा मांग सकें. आप तीन तलाक खत्म कीजिए और आप देखेंगे कि फतवे के बिजनेस का भी अंत हो जाएगा. सामान्य लोगों के जीवन पर मौलवी फतवे के ताकतवर उपकरण के माध्यम से हावी होते हैं और उन्हें डर है कि अगर ट्रिपल तालक को खत्म कर दिया गया तो वे इस उपकरण को खो देंगे.


ट्रिपल तलाक पर बहस को लेकर कुछ लोग कहते हैं कि यह समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में एक कदम है. समान नागरिक संहिता लागू करने में हर्ज क्या है?

विश्वासयुक्त तरीके से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता के लिए प्रयास करना सरकार का एक संवैधानिक दायित्व है लेकिन अभी सरकार को निर्णय लेना है, प्रारूप के साथ आगे आना है, इसलिए उस पर टिप्पणी करना संभव नहीं है. हालांकि ट्रिपल तलाक को खत्म करना और समान नागरिक संहिता को लागू करना पानी को मटमैला करने की कोशिश है और लोगों को भ्रमित करना है. ये दोनों मुद्दे अलग-अलग हैं और इन्हें आपस में जोड़ना नहीं चाहिए.

 

First published: 19 April 2017, 9:49 IST
 
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