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तीन तलाक़ पर टीवी मीडिया 'कौआ कान ले गया' वाली भूमिका में

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 9 December 2016, 8:05 IST

गुरुवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस सुनीत कुमार की एकल पीठ ने एक केस की सुनवाई के दौरान तीन तलाक़ की प्रथा पर टिप्पणी की. पीठ ने कहा, किसी भी समुदाय का पर्सनल लॉ संविधान में नागरिकों को दिए गए अधिकारों से ऊपर नहीं हैं.' पीठ ने यह टिप्पणी तीन तलाक़ की प्रथा के संदर्भ में कही. इस विषय पर कुछ और कहना इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसलिए मुनासिब नहीं समझा क्योंकि यह पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में है. 

इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी से पहले सुप्रीम कोर्ट और कुछ हाई कोर्ट के फ़ैसले देखते हैं. 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस में तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) को ग़ैरकानूनी क़रार दे दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी ज़ोर दिया था कि सिर्फ़ क़ुरआन में की गई तलाक़ की व्यवस्था मान्य है जिसे तलाक़-ए-अहसन कहते हैं और जिसमें एक बार में तीन बार तलाक़ बोलकर तलाक़ लेने की गुंजाइश नहीं है. 

शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

2002 में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को किसी भी मज़हबी तंज़ीम या व्यक्ति विशेष ने चुनौती नहीं दी थी. देश के किसी भी हिस्से में इसका कोई विरोध नहीं हुआ और तभी से सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला एक कानून की शक़्ल में हमारे सामने है. 

इस फ़ैसले का सीधा-सा मतलब यह है कि देश के किसी कोने में अगर कोई मुस्लिम औरत तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) की शिकार है तो वह इंसाफ़ के लिए फ़ैमिली कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकती है. शमीम आरा केस की रोशनी में उन्हें वहीं से इंसाफ़ मिल जाएगा. शायरा बानो भी यह कर सकती थीं मगर उनके वक़ील ने शायद नाम और शोहरत के चक्कर में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगा दी. 

शमीम आरा सिर्फ़ अकेली मिसाल नहीं है. 2002 में ही बांबे हाई कोर्ट की फुल बेंच ने दगड़ू पठान बनाम रहीमबी पठान केस की सुनवाई के दौरान कहा, 'मुस्लिम मर्द अपनी मर्ज़ी से तलाक़ नहीं दे सकते. बांबे हाई कोर्ट ने क़ुरआन का हवाला देकर भी मामले को साफ़ किया था. 

2004 में नजमुनबी बनाम सिकंदर रहमान के केस की सुनवाई में एक बार फिर बांबे हाई कोर्ट ने यही बात दोहराई. दिल्ली हाई कोर्ट ने भी तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) के एक मामले को सुनवाई के दौरान अमान्य कर दिया था. तमाम राज्यों की हाई कोर्ट में इस तरह की मिसालें हैं जहां अदालतों ने संविधान और क़ुरआन का हवाला देकर मर्दों की दलीलें मानने से इनकार किया है.

बावजूद इसके हाल के साल में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दाख़िल करने की अपील कर इस मुद्दे पर नए सिरे से सुनवाई शुरू कर दी, क्यों? क्या ज़रूरत थी इसकी? अब तमाम व्यक्ति विशेष, पीड़ित, वक़ील, मज़हबी तंज़ीमें भी इसमें कूद पड़ी हैं. राजनीतिक दल भी नए सिरे से इसका 'स्वागत' कर रहे हैं. 

इलाहाबाद हाई कोर्ट का अवलोकन

वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट पर आते हैं. हाई कोर्ट की एकल पीठ ने कोई फ़ैसला नहीं दिया बल्कि एक टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट की वकील शाहरुख़ आलम कहती हैं कि ऐसे अवलोकन को 'आबिटर डिक्टम' कहते हैं. यानी कि क़ानूनी तौर पर इस टिप्पणी की कोई अहमियत नहीं है. 

शाहरुख़ ने आगे कहा, 'इस टिप्पणी का ताल्लुक़ उस याचिका से भी नहीं है जिसे बुलंदशहर की 24 साल की मुस्लिम महिला हिना ने दाख़िल की थी. हिना ने अपनी याचिका में कहा था कि शादी के बाद से उन्हें उनके परिवार और पुलिसवाले परेशान कर रहे हैं. लिहाज़ा, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई जाए. मगर कोर्ट ने हिना की याचिका ख़ारिज कर दी. अगर कोर्ट कोई फ़ैसला देता और उपरोक्त अवलोकन उस फ़ैसले का हिस्सा होता तो उसकी लीगल वैल्यू हो जाती. तब इसे 'रेशियो' कहा जाता. हमें 'आबिटर डिक्टम' और 'रेशियो' का फ़र्क़ करना आना चाहिए. 

क्या है हिना का मामला?

23 साल की हिना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की रहने वाली हैं. उनकी शादी जिस व्यक्ति से हुई है, उनकी उम्र 53 साल है. हिना से शादी करने के लिए उन्होंने अपनी पहली पत्नी को तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) दे दिया. मगर हिना के घरवाले इस शादी के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि उनके शौहर की उम्र कमोबेश दोगुनी है. 

हिना के घरवाले कथिततौर पर उनका और उनके पति का उत्पीड़न करने की कोशिश कर रहे हैं. इसमें पुलिस भी शामिल है. उन्होंने पुलिसवालों से अपनी और अपने शौहर की सुरक्षा की मांग की थी मगर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मांग को ख़ारिज कर दिया. 

जस्टिस सुनीत कुमार ने हिना के पति की पहली पत्नी के बारे में टिप्पणी की. उन्होंने कहा, 'यहां परेशान करने वाला सवाल यह है कि क्या हमेशा मुस्लिम औरतों को ही इस तरह के उत्पीड़न झेलना चाहिए? क्या पर्सनल कानूनों को इन अभागी औरतों के प्रति क्रूर बने रहना चाहिए? इन औरतों के दुख कम करने के लिए क्या पर्सनल लॉ में संशोधन किया जा सकता है? 

यह भद्दापन न्यायालय की आत्मा को परेशान करता है. पहली पत्नी की कोई गलती नहीं है, बावजूद इसके उन्हें तलाक़ सिर्फ इसलिए दिया गया क्योंकि उनके पति किसी दूसरी महिला के प्यार में पड़ गए थे.'

कोर्ट ने आगे कहा, मुसलमान मर्द मनमाने तरीक़े से तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) लेते हैं जो कि क़ुरआन की हिदायतों के मुताबिक नहीं है. क़ुरआन में इस तरह के कपटीपन की मनाही है. जब तक बीवी ईमानदार और मानने वाली हो, तब तक क़ुरआन में तलाक़ की गुंजाइश नहीं है. अगर कोई गंभीर वजह नहीं है तो धार्मिक या क़ानून के हिसाब से कोई भी मर्द तलाक़ को सही नहीं ठहरा सकता. 

कोर्ट ने यह भी कहा, 'हालांकि यह प्रथा अनुचित मानी जाती है और मुसलमानों के कई समुदायों में इसका चलन नहीं है मगर बड़ी संख्या में यह प्रथा अभी भी चल रही है. पीठ ने कहा कि औरत मर्दवादी व्यवस्था के रहमोकरम पर नहीं रह सकती जिसकी स्थापना मज़हबी उलेमाओं ने कुरआन की अलग-अलग व्याख्या करके कर रखी है.'  

यहां यह ध्यान देना ज़रूरी है कि जस्टिस सुनीत कुमार का अवलोकन 'आबिटर डिक्टम' की कैटगरी में आता है. ऐसे अवलोकनों का समाज पर असर बेशक़ पड़ सकता है लेकिन लीगल वैल्यू ज़ीरो है. 

तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) पर क़ानून सुप्रीम कोर्ट 2002 में ही बना चुका है. तभी से इस क़ानून के आधार पर देश में तीन तलाक़ की पीड़ितों को अदालतों से इंसाफ़ मिल रहा है. 

सवाल अहम ये हैं कि ग़ैरक़ानूनी होने के बावजूद यह प्रथा कैसे और क्यों चल रही है? इसके लिए ज़िम्मेदार कौन हैं? कितनी संख्या में औरतें इसका शिकार हो रही हैं? और इस कुप्रथा की भुक्तभोगी कितनी फ़ीसदी औरतें अदालत तक पहुंच पा रही हैं जहां से उनके लिए इंसाफ़ का रास्ता खुलता है. 

मीडिया इन सवालों पर काम या शोध करके इस कुप्रथा की ज़मीनी पड़ताल कर सकता है. सिर्फ़ कोर्ट की टिप्पणी के आधार पर बार-बार एक ही बहस (जिसका कोई नतीजा नहीं निकलता) बोझिल और बासी मालूम पड़ती है. 

First published: 9 December 2016, 8:05 IST
 
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