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तीन तलाक: मुस्लिम पर्सनल लॉ पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

कैच ब्यूरो | Updated on: 30 June 2016, 7:47 IST

'तीन तलाक' के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा है कि कोर्ट यह तय करेगा कि अदालत किस हद तक मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल दे सकती है और क्या उसके कुछ प्रावधानों से नागरिकों को संविधान द्वारा मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है.

कोर्ट ने केंद्र समेत सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए 12 हफ्तों का समय दिया है. कोर्ट ने संकेत दिया है कि अगर जरूरी लगा तो मामले को बड़ी बेंच को भेजा जा सकता है.

'तीन तलाक' के मुद्दे पर  चार अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर टीवी पर हो रही बहस पर रोक लगाने से इंकार कर दिया. याचिककर्ता फरहा फैज ने अदालत में दलील दी थी कि रमजान के पवित्र महीने में मुस्लिम उलेमा, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन मुस्लिम समाज को भ्रम में डालने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 'तीन तलाक' की वकालत की है. बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह संसद का बनाया कानून नहीं है.

क्या है अर्जी

मार्च महीने में शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी.

बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है. कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है. वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है.

इसके अलावा जयपुर की आफरीन रहमान ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. मैरिज पोर्टल से शादी करने वाली रहमान को उसके पति ने स्पीड पोस्ट से तलाक का पत्र भेजा था. उन्होंने भी 'तीन तलाक' को खत्म करने की मांग की है.

बहुचर्चित शाह बानो केस

शाह बानो का मामला भारतीय इतिहास में एक नजीर बन चुका है. इंदौर की रहने वाली शाह बानो ने तलाक के बाद अपने शौहर से गुजारे-भत्ते की मांग की थी. भारत की सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में 62 वर्षीय शाह बानो के हक में फैसला दिया था.

उस समय आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसका विरोध किया था. बाद में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में कानून को बदल कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था.

First published: 30 June 2016, 7:47 IST
 
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