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तीन तलाक़: महिलाओं के लिए मिसाल बना इनका 'बेमिसाल संघर्ष'

हेमराज सिंह चौहान | Updated on: 22 August 2017, 13:00 IST

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है. कोर्ट ने तीन तलाक पर केंद्र सरकार से छह महीने के अंदर नया कानून बनाने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि जब तक नया कानून नहीं बनेगा, तब तक छह महीने के लिए तीन तलाक पर रोक लगी रहेगी. इसके साथ ही आज से तीन तलाक बंद हो गया है. 

तीन जजों जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार देते हुए 3-2 के बहुमत से अपना फैसला सुनाया है, जबकि चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर ने इससे अलग रुख ज़ाहिर किया. सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने केंद्र सरकार से तीन तलाक़ पर संसद से कानून बनाने को कहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे तीन मुस्लिम महिलाओं का भी बड़ा योगदान है. सुप्रीम कोर्ट में इन तीन महिलाओं ने तीन तलाक के खिलाफ याचिकाएं दायर की थी. इन तीनों को इनके पति द्वारा अलग-अलग तरीके से तीन तलाक  दिया गया था. 

1-सायरा बानो

उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली सायरो बानो ने सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी. शायरा ने कोर्ट में कहा कि ये तीन तलाक का ये तरीका पूरी तरह से असंवैधानिक है. 36 साल की सायरा को उनके पति ने 15 साल साथ रहने के बाद एक झटके में तीन तलाक दिया था. जब उनके पति ने उन्हें तीन तलाक दिया तब वो इलाज के लिए अपने मां-बाप के घर आई हुईं थीं. उनके पति ने अक्टूबर 2015 को स्पीड पोस्ट से उन्हें चिट्ठी भेजकर तीन तलाक दिया था. शायरा के दोनों बच्चे, तलाक के समय उसके पति के पास रह रहे थे.

2- इशरत जहां

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की रहने वाली इशरत जहां को दुबई से उनके पति ने फ़ोन कर तीन बार 'तलाक़' कहा और 15 साल की उनकी शादी ख़त्म कर दी. इतना ही नहीं उनका पति उनके चार बच्चों को उनकी इच्छा के खिलाफ अपने साथ ले गया. इशरत स्थानीय ग़ैर-सरकारी संस्था की मदद से अपना केस सुप्रीम कोर्ट तक ले जा पाईं. इशरत पर एक बार हमला होने के बाद उन्हें कोलकाता मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था.

3- BMMA( भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन)

सुप्रीम कोर्ट में तीसरी याचिका भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने दायर की थी. उन्होंने कहा कि अल्लाह के लिए पुरुष और महिला समान है. तीन तलाक समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है. इसके साथ ही संविधान में लैंगिक भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है. कुरान के मुताबिक 90 दिनों में तलाक देकर सुलह प्रस्तावित है, लेकिन इतने कम दिनों में ये कैसे संभव है? 

इन तीन याचिकाकर्ताओं के अलावा इन तीन महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. जयपुर की आफ़रीन रहमान, सहारनपुर की अतिया साबरी और रामपुर की गुलशन परवीन ने तीन तलाक पर पाबंदी लगाने की मांग थी, इन तीनों के पतियों ने इन्हें तीन तलाक देकर इनकी जिंदगियों को एक झटके में बर्बाद कर दिया था.

First published: 22 August 2017, 13:00 IST
 
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