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Tripura Election 2018: त्रिपुरा में वामयुग का अंत, ऐसे शून्य से शिखर तक पहुंची भाजपा

आदित्य साहू | Updated on: 3 March 2018, 11:43 IST

लेफ्ट के गढ़ त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी बड़ी जीत की ओर दिख रही है. त्रिपुरा की राजधानी अगरतल्ला में भाजपा कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाना शुरू कर दिया. लोग ढोल-ताशा और भांगड़ा की धुन पर नाच रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि त्रिपुरा में कल नहीं आज होली है. बीजेेपी मुख्यालयों में अबीर-गुलाल और रंग उड़ने शुरू हो गए हैं. फिलहाल बीजेपी दो तिहाई सीटों पर जीत हासिल करती दिख रही है.

आखिर क्या कारण है कि जो पार्टी पिछले चुनाव में जीरो सीट पर थी, पिछले चुनाव में जिसके बारे में कोई बात तक नहीं कर रहा था वह अचानक से दो तिहाई सीटों पर जीतते दिख रही है? इस बाबत अगर स्थानीय लोगों से बात करें तो वह कई चीजें बताते हैं.

लोगों का कहना है कि सीपीएम के 25 सालों के शासन से हम ऊब गए हैं. अब माणिक सरकार के शासन में घोटाले शुरू हो गए हैं. लोगों का माणिक सरकार से मोहभंग हो चुका है. फिलहाल अब सत्ता परिवर्तन होना चाहिए और बीजेपी को मौका मिलना चाहिए.

लेफ्ट से लोगों का क्यों हुआ मोहभंग?
दरअसल पिछले 25 सालों से लोग एक ही सरकार के कामकाज को देखते देखते ऊब गए थे. इसके अलावा माणिक सरकार में अब धीरे-धीरे भ्रष्टाचार की सुगबुगाहट दिखाई दे रही थी. सीपीएम के ख़िलाफ़ सत्ताविरोधी रुझान देखा जा रहा है क्योंकि विकास के एजेंडे पर सीपीएम कमज़ोर रही है.

बुनियादी ढांचे के मामले में त्रिपुरा में काम हुआ है, लेकिन जॉब क्रिएट नहीं हो पाई है. चेन्नई और बंबई के बाद त्रिपुरा आईटी गेटवे तो बन गया, लेकिन इसके बावजूद वहां आईटी इंडस्ट्री खड़ी नहीं हो पाईं. माणिक सरकार वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं कर पाए.

इसके अलावा त्रिपुरा की नौजवान पीढ़ी को लगता है कि माणिक सरकार को स्मार्टफोन तक इस्तेमाल करना नहीं आता और उन्होंने राज्य की आईटी की संभावनाओं को महत्व ही नहीं दिया.

सिफर से शिखर तक कैसे पहुंची भाजपा
त्रिपुरा में पिछले तीन सालों में काफी कुछ बदल गया है. तीन सालों में भाजपा ने राज्य में सरकार बनाने के लिए हर वो रणनीति अपनाई जिससे सत्ता हासिल की जा सके. तीन साल से भी कम समय में बीजेपी ने यहां तेजी से अपनी जड़ें मजबूत की हैं. मुख्यमंत्री माणिक सरकार के प्रशासन से लोगों के मोहभंग होने का फायदा बीजेपी ने बखूबी उठाया है.

असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को त्रिपुरा का चुनाव प्रभारी बनाकर भाजपा ने उनके अनुभव का बखूबी फायदा लिया. भाजपा ने उन्हें अगस्त 2015 में पार्टी में शामिल किया इसके बाद पूरे नॉर्थ ईस्ट में पार्टी का चेहरा बना दिया. उन्हें नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रैटिक अलायंस (बीजेपी के नेतृत्व वाला गैर-कांग्रेसी पार्टियों का गठबंधन) के संयोजक बनाया गया.

राज्य के एक वरिष्ठ पत्रकार बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहते हैं- बीजेपी प्रदेश में इतनी ताकतवार कभी नहीं थी. पिछले चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर एक फ़ीसदी से भी कम था लेकिन बीजेपी ने उन तमाम चीजों पर काम किया जो उनको सत्ता तक ले जा सकती हैं.

उन्होंने कहा ज़मीनी स्तर पर बीजेपी के थिंक टैंक आरएसएस ने खूब काम किया है, खासकर आदिवासी इलाकों में. कांग्रेस से 6 विधायकों को तोड़कर पार्टी में शामिल कर लिया. ऐसे में सीपीएम के भी काफी समर्थक बीजेपी की तरफ सरक गए. माणिक सरकार को सत्ता में दो दशक से भी अधिक समय हो चुका है लिहाजा एंटी इंकम्बेंसी फ़ैक्टर भी हैं.

उन्होंने कहा कि माणिक सरकार ने निचले स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार को गंभीरता से नहीं लिया और वाम मोर्चे की सरकार से ऐसी कई ग़लतियां हुई हैं.

इसके अलावा बीजेपी के वादों ने भी जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने में मदद की. चुनाव प्रचार के समय बीजेपी ने वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो मजदूरों को केंद्र के रेट पर न्यूनतम मजदूरी दी जाएगी और राज्य के कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर सैलरी दी जाएगी.

इसके अलावा पीएम मोदी ने भी चुनाव प्रचार के दौरान लोगों को खूब लुभाया था. उन्होंने हाईवे, इंटरनेट, रोडवेज, एयरवेज सबकी बात की थी. जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा.

First published: 3 March 2018, 11:43 IST
 
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