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सोशल मीडिया इस बार बना दलितों का हथियार

राजीव खन्ना | Updated on: 15 August 2016, 9:32 IST

अब तक केवल भाजपा, संघ परिवार और आम आदमी पार्टी ही मुख्य रूप से सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल कर रहे थे. संघ और इसके संगठनों ने सोशल मीडिया के जरिये राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की छवि गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई. 

लेकिन अब मोदी के अपने राज्य के दबे पिछड़े दलित इसी सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में लोगों का समर्थन जुटाने में कर रहे हैं. गुजरात के दलित अहमदाबाद से गिर सोमनाथ जिले के उना तक निकाले जा रहे दलित अस्मिता मार्च के लिए न केवल गुजरात बल्कि विदेशों से भी लोगों का समर्थन जुटाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं.

उना दलित आंदोलन के नेता जिग्नेश मेवानी कहते हैं, 'मोबाइल, व्हाट्सएप और फेसबुक ने निश्चित रूप से हमारे लिए बूस्टर का काम किया है. दलितों के मन में सदा से अन्याय के खिलाफ आक्रोष व्याप्त था लेकिन सोशल मीडिया जैसे हथियार ने उन्हें एक मंच प्रदान किया है. वे अब परंपरागत मीडिया के एक बड़े वर्ग जिस पर ब्राह्मणवादी मानसिकता का भारी असर है, के सामने मुखर हो कर अपनी बात रख रहे हैं.'

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हाथ में मोबाइल लिए हुए दलित स्वयं को सशक्त मानते हैं और तुरंत ही इस पर वीडियो और फोटो अपलोाड कर देते हैं, जो दूर-दूर तक लोगों के पास पहुंच जाती है. अपनी वाॅल पर लोग धड़ाधड़ मार्च से जुड़ी खबरें पोस्ट करते हैं और घंटे भर के भीतर उस पर हजारों लाइक्स आ जाते हैं. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.

मेवानी कैच को बताते हैं, 'उना में गौरक्षकों द्वारा दलितों की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर हाथों-हाथ वायरल हो गया. इसी का नतीजा है कि आज दलित और मुस्लिम एक साथ खड़े हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. इसी तरह अहमदाबाद में दलित रैली की फोटो वायरल होने से न केवल गुजरात बल्कि बाहर के लोगों को पता चला कि गुजरात में कुछ बड़ा आन्दोलन होे रहा है.'

मेवानी बताते हैं, 'दलितों ने हमेशा ही मुख्यधारा के मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाया है कि उनके मुद्दों और घटनाक्रम को मीडिया में उचित कवरेज नहीं मिलता. हमने देखा है कि निर्भया मामले में सारे अखबार कैसे पीड़िता के समर्थन में उतर आए थे लेकिन बहुत कम इस बात पर चिंता जताते हैं कि देश भर में रोजाना 4.3 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार होती हैं. ये चीजें ऐसी हैं, जिन पर वे बहस करते हैं.'

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मेहुल मंगुबाहेन ने बताया कि दलित क्षेत्रों में आयोजित होने वाले कार्यक्रम मुश्किल से अखबारों में छपते हैं

पत्रकार रहे थिएटर कलाकार और प्रशिक्षक मेहुल मंगुबाहेन ने बताया कि दलित क्षेत्रों में आयोजित होने वाले कार्यक्रम मुश्किल से अखबारों में छपते हैं, भले ही वे कितने ही स्तरीय हों. अहमदाबाद में अखबारों के लिए कवरेज का मतलब है सिर्फ मणिनगर. कोई भी अमरायवडी, ओधव और नारोल तक जाना पसंद नहीं करता. उन्हें बस अपने लक्षित पाठकों या दर्शकों से मतलब होता है. वे पूछते हैं क्या यह जातिवाद नहीं है?

मेवानी ने बताया कि दलित उना घटना एवं अहमदाबाद में चल रहे आंदोलन से संबंधित पोस्ट तुरंत और व्यापक तौर पर सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं, जबकि उनमें से कई अर्ध शिक्षित हैं. वे सोशल मीडिया पर मिली ‘अपनी जगह’ पा कर खुश हैं.

गौरतलब है कि गुजरात भाजपा ने अपने राजनीतिक हित साधने के लिए सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया था. पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करते हुए भाजपा ने ट्विटर और फेसबुक का जम कर इस्तेमाल किया था. ऐसी भी रिपार्टें थीं कि ट्विटर पर मोदी के एक करोड़ अनुयायी दिखाने के लिए फर्जी अकाउंट तक बनाए गए.

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यद्यपि हिन्दू इसे अपनी एक उपलब्धि मान कर जश्न मना रहे थे लेकिन रिपोर्ट कुछ और ही कहती है. देश के एक अग्रणी अखबार के 27 अक्टूबर 2016 के अंक में छपी रिपोर्ट के अनुसार, लंदन के इंजीनियरों द्वारा बनाए गए एक इंटरनेट टूल स्टेटस पीपुल ने बताया कि मोदी के अकाउंट में 46 प्रतिशत फर्जी और 41 प्रतिशत यूजर निष्क्रिय हैं.

मोदी की छवि लोकप्रिय बनाने के लिए जिस प्रकार से सोशल मीडिया पर उनकी फोटोशॉप से तैयार तस्वीरें चलाई गई, उससे कोई अनभिज्ञ नहीं है.

अगर दक्षिणपंथियों ने इंटरनेट को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है तो दलित क्यों नहीं कर सकते?

भाजपा पर यह भी आरोप लगे कि उसने इंटरनेट के शौकीन लोगों की एक फौज तैयार कर रखी है, जो केवल इसी बात पर निगाहें गड़ाए रहते थे कि वेब पर कब किसने मोदी की ओर पाॅइंटर या कर्सर रखा.पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा के बाद गुजरात में अपना आधार तलाश रही आम आदमी पार्टी भी उसी की राह पर चल पड़ी और इंटरनेट को ही सशक्त माध्यम के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.

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वरिष्ठ राजनीतिक और सामाजिक पर्यवेक्षक संजय भावे कहते हैं, 'अगर दक्षिणपंथियों ने इंटरनेट को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है तो दलित क्यों नहीं कर सकते?'

पूर्व आईपीएस राहुल शर्मा और उनके साथी प्रतीक सिन्हा ने साबित किया कि सोशल मीडिया कितना आसान है. राहुल से ज्यादा इंटरनेट और गैजेट्स का बेहतर इस्तेमाल कौन जान सकता है, जिन्होंने 2002 में जब दंगे चरम पर थे, उस वक्त हिन्दुत्ववादी नेताओं के फोन काॅल्स की रिकाॅर्डिंग वाली सीडी प्रस्तुत कर दी थी. इसी प्रकार प्रतीक एक वेबसाइट चलाते हैं- ‘ट्रुथ आॅफ गुजरात’, जिस पर नियमित रूप से राज्य की चरमपंथी ताकतों को लेकर नित नए खुलासे करने का दावा किया जाता है.

उन्होंने कहा ऐसे में मीडिया के लिए व्यावसायिक रूप से यह आवश्यक हो जाता है कि वह चल रहे आंदोलन को कवर करें. आखिरकार पाठक भी यह सवाल कर सकते हैं कि जो चीज सोशल मीडिया पर इस कदर वायरल है वह अखबार में क्यों नहीं छपी?

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भावे कहते हैं, जहां तक दलित मसलों का सवाल है, गुजरात का मीडिया अब तक नकारात्मक भूमिका में ही दिखाई दिया है. वे कहते हैं ऐसे अकादमिक दस्तावेज भी हैं, जिनमें यह उल्लेख मिल जाएगा कि गुजरात में माधव सिंह सोलंकी के शासनकाल में आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान कैसे दलितों के मुंह पर कालिख पोत दी जाती थी.

इसके अलावा कवि, नाटककार और फिल्मकार परेश व्यास कहते हैं अहमदाबाद दलित आंदोलन की तस्वीरें वायरल होने का अत्यधिक असर पड़ा है. दलितों ने जब अपने साथियों की तस्वीरें व्हाट्स एप पर देखी तो उनका आत्म विश्वास बढ़ा और आंदोलन में शामिल होने की प्रेरणा भी मिली. अब बड़ी संख्या में ग्रामीण राहुल और मेवानी का भाषण सुनने घरों से बाहर आ रहे हैं. उनके लिए वे इस आंदोलन के सच्चे प्रणेता हैं और इसका चेहरा भी.

यह आंदोलन मीडिया की पहुंच से दूर गांवों में फैला है. इसलिए इसकी ज्यादा चिंता या परवाह नहीं की जा रही

भावे और व्यास दोनों ही कुछ समय के लिए आंदोलनकारियों के साथ चलने के लिए गधाडा गए थे. उन्होंने बताया, ‘यह बहुत अच्छा अनुभव रहा. धंसा गांव में जिस बात ने मुझे हैरान किया वह यह थी कि दलितों ने मृत पशुओं को न उठाने की शपथ लेने की घोषणा पटेलवाड़ी (पटेलों के सामुदायिक केंद्र) में की.'

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व्यास ने एक और बात का जिक्र किया जिसने धसा गांव में कई लोगों को चौंका दिया, वह यह कि पंजाब से आए दलितों ने एक लंगर का आयोजन किया था. वे लोग वहां मौजूद सभी लोगों को केले भी बांट रहे थे. उसी समय दो गायें भी वहां आ गई और सभी ने गौ सेवा के रूप में गायों को वे केले खिला दिए.

पर्यवेक्षकों ने इस बात की ओर भी इशारा किया कि पटेल आंदोलन की तरह इस बार सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद नहीं की. अहमदाबाद के एक राजनीतिक पर्यवेक्षक ने कहा, उस वक्त सरकार पटेलोें से डर गई थी लेकिन यह आंदोलन ऐसा नहीं है. यह आंदोलन मीडिया की पहुंच से दूर गांवों में फैला है. इसलिए इसकी ज्यादा चिंता या परवाह नहीं की जा रही.

First published: 15 August 2016, 9:32 IST
 
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