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बस्तर का सच: जो बोलेगा, वो जाएगा...

राजकुमार सोनी | Updated on: 24 March 2016, 8:56 IST

सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराध होना,

जो अपराधी नहीं होंगे मारे जाएंगे.

चर्चित कवि राजेश जोशी की यह कविता हमारे समय का कड़वा सच है, लेकिन बस्तर में जो कुछ घट रहा है उसके बाद यह लगता है कि जैसे यह कविता इसी आदिवासी इलाके के सच को उजागर करने के लिए लिखी गई थी.

बस्तर में कलमकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर पुलिसिया दमन थमने का नाम नहीं ले रहा है. इसकी एकमात्र वजह माओवादी उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों की प्रताडना और उस प्रताड़ना के खिलाफ लगातार बन रही असहमति ही दिखाई देती है.

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कभी सरगुजा जैसे इलाके में माओवादियों का खात्मा करने वाले पुलिस अफसर एसआरपी कल्लूरी चार साल पहले जब पहली बार बस्तर में पदस्थ हुए थे तब उन पर स्वामी अग्निवेश सहित अन्य कई सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमले का आरोप लगा था.

पुलिस मुख्यालय में बैठे शीर्ष अफसरों से टकराव और हिंसक कार्यशैली से उठे विवाद के बाद जब वे बस्तर से रुखसत हुए तो एक सोची-समझी योजना के तहत यह कहानी चली कि माओवाद के खात्मे के लिए कल्लूरी को कमान सौंपना बेहद अनिवार्य है.

बस्तर में छह महीनों में पत्रकार सोमारू नाग, संतोष यादव, अनिमेष पाल, यज्ञदत्त कश्यप गिरफ्तार हो चुके हैं

प्रशासनिक और राजनीति के गलियारों में यह भी कहा-सुना जाता रहा कि बंदूक की नली से सत्ता हासिल करने का ख्वाब देखने वाले माओवादियों को केवल कल्लूरी ही ठिकाने लगा सकते हैं.

माओवादियों की ओर से की गई कुछ हिंसक घटनाओं के बाद जब वे दोबारा बस्तर पहुंचे तो सबसे पहले उन्होंने पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को ही शिकार बनाया. बस्तर में गत छह महीनों में पत्रकार सोमारू नाग, संतोष यादव, अनिमेष पाल, यज्ञदत्त कश्यप गिरफ्तार हो चुके हैं.

पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम के घर पर हमला हो चुका है. अभी दो रोज पहले ही बारसूर के एक पत्रकार प्रभात सिंह को भी पुलिस ने आईटी एक्ट की धाराओं में हिरासत में लिया है. प्रभात सिंह को जानने वालों का कहना है कि उनकी गिरफ्तारी महज इसलिए की गई क्योंकि वे आईजी कल्लूरी के किलाफ व्हाट्स एप पर कोई संदेश लिख दिया था.

छत्तीसगढ़ पुलिस का दमन जारी, एक और पत्रकार को किया गिरफ्तार

प्रभात आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी के गांव रेहाली और नहाड़ी नामक गांव गए थे और वहां हुई कथित मुठभेड़ों की पोल खोली थी. संतोष और सोमारू नाग पर तो आपराधिक साजिश, हिंसा भड़काने के अलावा प्रतिबंधित माओवादी संगठन के साथ मिलकर काम करने का आरोप है.

दरभा के पूर्व सरपंच रामनाथ नाग का कहना है कि संतोष यादव को पुलिस ने सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वे आदिवासियों की मदद करते थे. नाग ने बताया कि पुलिस उनका भी एनकांउटर करना चाहती थी. एक रोज पुलिस उन्हें मारने के लिए जंगल ले गई तभी चश्मदीद के तौर पर संतोष आ धमके और वे बच गए. ऐसा एक नहीं दो बार हुआ.

संतोष यादव को पुलिस ने सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वे आदिवासियों की मदद करते थे

एक पत्रकार होने के नाते संतोष का हस्तक्षेप पुलिस को रास नहीं आया और उन्हें माओवादी ठहरा दिया गया. नाग का कहना है कि बस्तर के अन्य पत्रकारों को भी महज इसलिए सजा भुगतनी पड़ रही है क्योंकि वे मानवाधिकार हनन के खिलाफ रिपोर्टिंग करते हैं. हालांकि पत्रकारों की रिहाई के लिए पत्रकार सुरक्षा समिति ने एक सख्त कानून बनाने की वकालत की है लेकिन पत्रकारों को कोई राहत नहीं मिल पाई है.

अधिवक्ता महेंद्र दुबे के मुताबिक सरकार ने पत्रकारों की मांग पर थोड़े समय के लिए ध्यान देने की बात इसलिए कही थी कि क्योंकि बस्तर में पत्रकारों की रिहाई देशव्यापी मसला बन चुकी थी, लेकिन एक बार फिर स्थिति ढाक के तीन पात जैसी हो गई. प्रदेश में सोमारू और संतोष यादव की गिरफ्तारी को लेकर पत्रकार राजधानी रायपुर और बस्तर में प्रदर्शन भी कर चुके हैं बावजूद इसके पत्रकारों पर हमला जारी है.

पत्रकारों और मानवाधिकार कर्मियों के लिए छत्तीसगढ़ खतरनाक जगह है

बस्तर के जगदलपुर में रहकर स्क्रोल डॉट इन के लिए लिखने वाली पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम भी पुलिस का शिकार हो चुकी है. इसी साल 10 जनवरी को कुछ लोगों ने उन्हें माओवादी बताकर धमकाया था और फिर कुछ दिनों बाद उनके घर पर पथराव किया था.

मालिनी का आरोप है कि इस मामले में सामाजिक एकता मंच से जुड़े हुए कुछ लोग सक्रिय थे, लेकिन पुलिस ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की.

बस्तर के जगदलपुर में पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम भी पुलिस का शिकार हो चुकी है

सोमारू, संतोष के बाद मालिनी पर हमला और प्रभात सिंह की गिरफ्तारी यह दर्शाती है कि प्रदेश में लिखने-पढ़ने और गलत नीतियों पर हस्तक्षेप करने वाले पत्रकारों की स्थिति बेहद खराब है. यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि प्रतिरोध की कोई ताकत सिर न उठा सकें.

लेखकों का एक तबका भी इससे सहमत है. छत्तीसगढ़ में रहते हुए कथा और उपन्यास के क्षेत्र में अपनी देशव्यापी पहचान बनाने वाले लेखक मनोज रूपड़ा कहते हैं, 'राजसत्ता असहमतियां पंसद नहीं करती है, लेकिन वाजिब असहमतियों को कुचलकर उन्हें पूरी तरह से खत्म करने की कोई स्कीम किसी राज्य में लागू है तो इसका मतलब साफ है कि लूट का एक बड़ा तंत्र बेहद हड़बड़ी में है.'

पुलिस और माओवादियों के बीच पिस रही बस्तर की पत्रकारिता

बस्तर और उसके आसपास खनिजों का भंडार है. सरकार का इरादा किसी समस्या के खात्मे से ज्यादा कार्पोरेट को लाभ पहुंचाने है. ऐसे में जो भी यह कहेगा कि खनिज क्यों लूटा जा रहा है? गांववालों की जमीन क्यों हड़पी जा रही है तो प्रशासन उसे माओवादी बताने में देर नहीं करेगा.

सोनी सोरी पर केमिकल हमला

पत्रकारों के अलावा पुलिस सामाजिक कार्यकर्ताओं और आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए काम कर रहे लीगल एड ग्रुप के सदस्यों को भी प्रताड़ित करने में लगी हुई है. आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी केमिकल हमले का शिकार हो चुकी है.

पुलिस के एक रिटायर्ड अधिकारी कहते हैं सामाजिक कार्यकर्ता मंच सलवा जूडम का पॉकेट संस्करण है

उन पर यह हमला तब किया गया जब वह बास्तानार से अपने घर गीदम जा रही थी. हमलावरों ने उन्हें साफ तौर पर चेतावनी दी गई कि यदि उन्होंने मरकागुड़ा की घटना और आईजी कल्लूरी के खिलाफ बोलना बंद नहीं किया तो उसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ेगा.

तेजी से बढ़ रहा है पत्रकारों पर हमला

बस्तर में पीड़ित आदिवासियों की मदद के लिए लीगल एड के जरिए कार्यरत महिला अधिवक्ताओं को भी पुलिस ने प्रताड़ित किया है. महिला अधिवक्ता शालिनी गेरा कहती हैं, 'जगदलपुर के जिस मकान में हम लोग किराए पर रहते थे सबसे पहले पुलिस ने मकान मालिक को प्रताड़ित किया उसके बाद कल्लूरी के लिए खुले तौर पर काम कर रहे सामाजिक एकता मंच के लोगों को हमारे पीछे लगा दिया.'

क्या है सामाजिक कार्यकर्ता मंच?

पुलिस के एक रिटायर्ड अधिकारी कहते हैं सामाजिक कार्यकर्ता मंच सलवा जूडम का पॉकेट संस्करण है. मंच के क्रिया कलाप इस बात की पुष्टि करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ला बताते हैं, 'जैसे माओवादियों के खात्मे के लिए सरकारी संरक्षण में सलवा-जुडूम प्रारंभ हुआ था कुछ वैसे ही सामाजिक एकता मंच का उभार सामने आया है. यह मंच माओवादियों की शादी करवाता है. गोष्ष्ठियां और रैलियां करवाता है और इससे जुड़े लोग जगह-जगह यह प्रचारित करते हैं कि हम सब बस्तर में अमन और शांति चाहते हैं. अमन और शांति के लिए हम कल्लूरी साहब के साथ है.'

मानवाधिकारों के हनन को लेकर सरकार का नजरिया भी चिन्तित करता है. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह स्वयं कई मंचों पर यह कह चुके हैं कि मानवाधिकार कार्यकर्ता सिर्फ पुलिस की खामियां देखते हैं. उन्हें माओवादियों की ओर से मारे जा रहे लोगों को लेकर भी मुखर होना चाहिए.

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सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम कहते हैं, 'मुख्यमंत्री की मंशा माओवादियों के खात्मे की तो है, लेकिन वे पुलिस के व्यवहार को लेकर मौन रहते हैं. उनका यह मौन बस्तर में पुलिस की बढ़ती निरंकुशता का समर्थन है.'

फिलहाल माओवादियों के सफाए की इस कथित जंग में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सच को साहस के साथ लिखने वाले पत्रकारों के लिए कोई जगह नहीं दिखाई देती है. बस्तर की बारुदी हवाओं में में खौफ है, दहशत है और डर है, यह मंजर कौन सी दिशा तय करेगा, साफ नहीं है.

First published: 24 March 2016, 8:56 IST
 
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