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खुल रहे हैं सरकार आहिस्ता-आहिस्ता!

अतुल चौरसिया | Updated on: 8 July 2016, 14:03 IST

दो साल पहले जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी थी तब और हाल में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बीच काफी अंतर आ चुका है. उस समय सरकार को इतिहास की सबसे गोपनीय, पर्देवाली सरकार का दर्जा दिया गया था. पीएमओ समेत तमाम मंत्रालयों में पत्रकारों की आवाजाही को सीमित कर दिया गया था.

दबी जुबान में चारो तरफ खबरें थी कि सरकार में नंबर दो माना जाने वाले गृह मंत्रालय में गृहमंत्री की ही बहुत कम चलती है. मंत्रालय के सबसे बड़े अधिकारी गृहसचिव को दो बार बदल दिया गया और सुनने में आया कि गृहमंत्री को इसके लिए भरोसे में भी नहीं लिया गया. एक खबर चली कि एक मंत्री को किसी उद्योगपति के साथ शहर के एक फाइव स्टार होटल में बीच मीटिंग से ही प्रधानमंंत्री ने बुलवा लिया.

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प्रधानमंत्री मोदी ने पिछली कई सरकारों के मुकाबले काफी छोटा मंत्रिमंडल रखा था. इसका भी यही संदेश था कि ज्यादा से ज्यादा ताकत प्रधानमंत्री के हाथों में केंद्रित हो. दो साल पहले प्रधानमंत्री दिल्ली के लिए नए थे. अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत नरेंद्र मोदी एक दशक से ज्यादा समय से क्षेत्रीय राजनीति में रमे हुए थे. वे गुजरात से सीधे दिल्ली पहुंचे थे. दिल्ली की सत्ता के गलियारों में एक हद तक नए थे, उसके चाल-चलन से अनजान और असहज भी थे. अर्णब गोस्वामी के शब्दों में कहें तो वे "लुटियन ज़ोन कोजी क्लब" के लिए बाहरी व्यक्ति थे.

मीडिया से उनका असहज रिश्ता जगजाहिर है, लिहाजा उनके हर कदम में एक संशय का भाव था, एक हिचक थी, भरोसा या कहें कि आत्मविश्वास भी थोड़ा डगमग था, जिसके नतीजे में शायद इतनी सारी बंदिशें बीते दो सालों के दौरान देखने को मिली.

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लेकिन मौजूदा मंत्रिमंडल विस्तार और हाल की कुछ गतिविधियों का मुआयना करें तो कुछ नई चीजें सरकार में देखने को मिल रही हैं. एक बदलाव का इशारा है. सरकार के दैनंदिन कामकाज से जुड़े बाहरी लोगों का मानना है कि दो साल पहले की अपेक्षा सरकार के कामकाज में खुलापन बढ़ा है, पर्देदारी कम हो रही है, या कहें कि दो साल पहले की तुलना में सरकार का आत्मविश्वास बढ़ा है, फिर से अर्णब गोस्वामी के शब्द उधार लें तो प्रधानमंत्री का "लुटियन कोजी क्लब" से रिश्ता शायद सुधर रहा है, भले ही कुछ चुनिंदा लोगों के साथ ऐसा हो रहा हो.

मंत्रिमंडल विस्तार यानी सत्ता का विकेंद्रीकरण

दो साल तक प्रधानमंत्री 59 सदस्यों के मंत्रिमंडल के साथ काम करते रहे. इसका सीधा अर्थ था कि अधिकतम सत्ता खुद उनके हाथों में केंद्रित थी. इसके मुकाबले 78 सदस्यों के मंत्री बनने से सत्ता और कार्यों का विकेंद्रीकरण हुआ है. जाहिर है अब प्रधानमंत्री दो साल पहले की तुलना में लोगों पर ज्यादा भरोसा कर पा रहे हैं.

इसके अलावा जिन लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है उन्हें बेहद जमीनी और लो प्रोफाइल वाला नेता माना जाता है. नए शामिल हुए मंत्रियों में दो ऐसे हैं जो शपथ लेने के लिए भी साइकिल से राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे. इनके नाम है अर्जुन मेघवाल और मनसुख मांडविया.

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एक वरिष्ठ पत्रकार जो लंबे अरसे से विभिन्न मंत्रालयों को कवर कर रहे हैं, के शब्दों में मंत्रालय में हुए फेरबदल की खुशी साफ झलकती है. वो कहते हैं, “मेघवाल या मांडविया हमेशा से बेहद सुलभ रहे हैं. सरकार के मीडिया से तमाम कटु अनुभवों को बावजूद उन्होंने हमेशा मीडिया के लोगों को बहुत अच्छे से तवज्जो दी है. ऐसे लोगों के मंत्री बनने के बाद जाहिर तौर पर सरकार का मीडिया से संवाद सुधरेगा.”

हाल के कुछ महीनों में मंत्रालयों के कामकाज में भी परिवर्तन के सूत्र दिखने लगे हैं. वही पत्रकार बताते हैं, “दो सालों के दौरान निगरानी के डर से अधिकारियों ने लोगों से बातचीत करना, मिलना-जुलना तक बंद कर दिया था. लेकिन अब एक बार फिर से मंत्रालय के अधिकारियों ने बुलाना और नीतियों पर बातचीत करना शुरू कर दिया है.”

मंत्रिमंडल फेरबदल के परिणाम

पीएमओ के बाद जिस एक मंत्रालय ने बीते दो सालों के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा-कुचर्चा बटोरी वह है एचआरडी मंत्रालय. मंत्रालय कवर करने वाले ज्यादातर पत्रकारों का कहना था कि पीएमओ के बाद एचआरडी ही ऐसा मंत्रालय था जिसे स्मृति ईरानी ने लगभग अभेद्य दुर्ग में बदल दिया था. इसके अलावा उनका रूखा और अहंकारी व्यवहार भी किंवदंति का रूप ले चुका था.

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आम तो आम संघ के लोग भी उनके व्यवहार की आलोचना करते थे.इसके विपरीत नए एचआरडी मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की छवि एकदम विपरीत है. वे एक सुलभ और मीडिया से सहज रिश्ते रखने वाले नेता हैं. पर्यावरण मंत्रालय में उनका दो साल लंबा कार्यकाल किसी बड़े विवाद से बचा रहा. हालांकि उड़ीसा के वन विभाग के नाम पर एसयूवी कार खरीदकर दिल्ली में अपने लिए इस्तेमाल करना और अडानी के मुंद्रा पोर्ट पर लगाए गए 200 करोड़ का जुर्माना माफी जैसे विवाद उनसे इस दौरान जुड़े. लेकिन मीडिया में उनकी सुलभता हमेशा बनी रही.

प्रधानमंत्री की मीडिया में उपस्थिति

प्रधानमंत्री के मीडिया से असहज रिश्ते एक खुला सच हैं. उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद पीएमओ में जिस तरह से पत्रकारों की आवाजाही को नियंत्रित किया गया वह काफी विवादित रहा. उन्होंने आज तक अपना कोई मीडिया सलाहकार भी नियुक्त नहीं किया है. यह अपने आप में सारी कहानी कहने के लिए पर्याप्त है.

सरकार का एक साल पूरा होने के मौके पर भी प्रधानमंत्री ने गिने-चुने मीडिया समूहों से बात की थी. लेकिन दूसरा साल इसके मुकाबले बदला-बदला सा नजर आता है. प्रधानमंत्री ने सबसे वॉल स्ट्रीट जरनल को अपने कामकाज का लेखाजोखा दिया. इसके बाद उन्होंने टाइम्स नाउ चैनल को साक्षात्कार दिया. इसके बाद उन्होंने कई संपादकों से भी मुलाकात की, और कई अखबारों में उनका साक्षात्कार प्रकाशित हुआ. हालांकि इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह सही दिशा में की गई शुरुआत कही जाएगी.

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प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा.

मोदी का तीसरा साल पहले के मुकाबले ज्यादा स्थिर, खुला और उदार दिखता है. लेकिन क्या इसे स्थायी बदलाव कहा जा सकता है? क्या यह पर्याप्त है? इन सवालों के जवाब फिलहाल ढूंढ़ना शायद थोड़ा जल्दबाजी होगी. प्रधानमंत्री की तीसरी सालगिरह पर हम शायद इन गिरहों को ज्यादा अच्छे से सुलझाने की स्थिति में होंगे.

First published: 8 July 2016, 14:03 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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