Home » इंडिया » Catch Hindi: two years of narendra modi government and its u turn on famers issues
 

दो साल भगवाराजः किसानों को किए वादे पर भी सरकार ने लिया यू-टर्न

निहार गोखले | Updated on: 23 May 2016, 7:48 IST
(कैच न्यूज़)

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले अपने घोषणा पत्र में कहा था कि अगर पार्टी सत्ता में आ जाती है तो वो किसानों को "उनकी लागत का कम से कम 50% मुनाफा दिलाएगी." यानी अगर किसान ने किसी फसल को उपजाने में 100 रुपये खर्च किए हैं तो उसे बेचकर उसे कम से कम 150 रुपये मिल सकेंगे.

फ़रवरी 2015 में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करके अदालत से बीजेपी को इस वादे पर अमल के लिए आदेश देने की अपील की गई. बीजेपी सरकार ने अदालत में माना कि ये वादा पूरा करना संभव नहीं है. सरकार ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने से बाजार पर बुरा असर पड़ेगा.

नरेंद्र मोदी सरकार को विपक्षी दल पहले ही यू-टर्न सरकार कहने लगे हैं. किसानों का मुद्दा सरकार के इन यू-टर्न की लिस्ट में एक और नाम है.

पढ़ेंः सूखाग्रस्त महाराष्ट्र में सिर्फ 15 फीसदी पीने का पानी बाकी

अपने दो साल के कार्यकाल में केंद्र सरकार के किसानों से जुड़े कई फैसलों की आलोचना हुई है. नया खूंखार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश (जिसे बाद में दबाव में सरकार को वापस लेना पड़ा), खाद आपूर्ति में अचानक आई कमी, जीएम सरसों को मंजूरी देने का प्रस्ताव इत्यादि के लिए बीजेपी सरकार को कृषि विशेषज्ञ और विपक्ष दोनों घेरते रहे हैं. जीएम सरसों के मुद्दे पर भी बीजेपी सरकार तब यू-टर्न लेना पड़ा जब उसी के किसान संगठन ने इसका विरोध कर दिया.

नरेंद्र मोदी सरकार ने अब तक तीन बज़ट पेश किए हैं. पहले दो बज़ट में कृषि बज़ट की राशि कम कर दी गई. तीसरे बज़ट में ठोस सुधार के बजाय आंकड़ों की बाजीगरी ज्यादा नज़र आई.

बीजेपी सरकार द्वारा कृषि सुधार के तौर पर पेश की जा रही कई योजनाओं को लेकर किसानों में आशंका है क्योंकि अभी तक इनमें से किसी पर अमल शुरू नहीं हुआ है.

बज़ट

केंद्र सरकार ने 2016-17 के बज़ट को किसानों के बजट के रूप में प्रचारित किया था. ये बज़ट सरकार ने 2015 में पड़े सूखे के बाद पेश किया था. सूखे की स्थिति आज पहले से भी भयावह हो गई है. देश की एक तिहाई आबादी (करीब 33 करोड़ लोग) इसकी चपेट में है.

इसके बावजूद केंद्र सरकार ने साल 2014-15 के बज़ट में 11% की कमी करते हुए 35,983 करोड रुपये आवंटित किए. वहीं 15 हजार करोड़ रुपये इसमें इसलिए जुड़े गए क्योंकि ये राशि (ब्याज सब्सिडी के तौर पर) वित्त मंत्रालय ने कृषि मंत्रालय को दी.

पढ़ेंः सूखा, अकाल और सरकारी उपेक्षा के चलते दम तोड़ता बुंदेलखंड

दरअसल, कृषि मंत्रालय की ज्यादातर योजनाओं का बज़ट पहले से कम किया गया. केवल फसल बीमा और सिंचाई योजनाओं में बढ़ोतरी हुई. लेकिन इनमें पुरानी ढांचागत जटिलताओं को दूर नहीं किया गया.

राष्ट्रीय कृषि बाजार जैसी योजनाओं से किसानों में कोई ज्यादा उत्साह नहीं जगा. भारतीय कृषक समाज के अजय जाखड़ कहते हैं, "फसल बीमा और राष्ट्रीय बाजार जैसी योजनाएं अच्छी हैं लेकिन सवाल ये है कि क्या इनपर अमल होगा?"

यूरिया

अजय जाखड़ 2014-15 में सरकार द्वारा यूरिया आयात में भारी कटौती पर ध्यान दिलाते हैं. 2014 के आखिर में सरकार ने सामान्य मात्रा से एक तिहाई यूरिया ही आयात किया. जिसकी वजह से किसानों को यूरिया की भारी किल्लत का सामना करना पड़ा. कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर भारतीय यूरिया निर्माताओं को 30 हजार करोड़ रुपये सब्सिडी का भुगतान न करने का भी आरोप लगाया.

जाखड़ कहते हैं, "यूरिया के मामले में सरकार ने जो किया वो पिछले 10 सालों में नहीं हुआ था. ये सरकार की बड़ी विफलता है क्योंकि यूरिया की आपूर्ति सुनिश्चित करना उसी की जिम्मेदारी है."

किसानों की आय

पिछले बज़ट में सरकार ने वादा किया कि 2022 तक वो किसानों की आमदनी दोगुना करवा देगी. किसानों में इसको लेकर ज्यादा उत्साह नहीं पैदा हुआ. इसका एक कारण ये है कि मुद्रास्फीति को दरकिनार करते हुए भी ये केवल 16% सालाना की बढ़ोतरी होगी.

दूूसरा कारण है कि इस साल गेहं, चावल, कपास और दूसरे कृषि उत्पादों का बाजार भाव गिरा है. प्याज की कीमत बहुत ज्यादा कम हो गई है. सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली बढ़ोतरी की भी तो उसके अनुसार पर्याप्त खरीद नहीं हुई.

पढ़ेंः सूखा: मराठवाड़ा से बुंदेलखंड तक एक ही कहानी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंद्ध भाारतीय किसान संघ के उपाध्यक्ष प्रभाकर केलकर कहते हैं, "प्याज ही की तरह कृषि उत्पाद की कीमत कभी भी गिर जाती है. ऐसे में सरकार उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का कोई उपाय नहीं करती. मैं अभी मध्य प्रदेश में हूं. किसान प्याज की कीमत गिरने के कारण उसे फेंक तक दे रहे हैं. भारत में करीब 125 फसलें होती हैं. इनमें से कई के दाम बहुत तेजी से गिरे हैं. सरकार ऐसे समय में न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करे तो किसानों को राहत मिलेगी."

केलकर कहते हैं, "किसानों में मोदी की नकारात्मक छवि थी लेकिन पिछले बजट के बाद ये बदली है. फसल बीमा जैसी योजनाओं से पता चलता है कि सरकार किसानों को लेकर गंभीर है."

सूखा

कई लोगों का मानना है कि नरेंद्र मोदी सरकार की खेती से जुड़ी योजनाएं अभूतपूर्व सूखे की भेंट चढ़ जा रही हैं. जबकि सूखा पिछली सरकारों की अनदेखी से इतना विकराल हुआ है.

सूखा मोदी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है. शायद सरकार को भी इस बात का अंदाजा है. पिछले कुछ हफ्तों में प्रधानमंत्री कार्यालय ने सूखा प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कई बैठकें की हैं. आलोचकों का मानना है कि सरकारों ने जागने में देर कर दी. इनमें से ज्यादातर राज्यों ने अक्टूबर 2015 तक सूखे की घोषणा कर दी थी.

पढ़ेंः सुप्रीम कोर्ट ने 9 राज्यों में सूखे पर केंद्र को लताड़ा

स्वराज अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव कहते हैं, "पिछले दो-तीन महीने में हम देख रहे हैं कि किसानों के मुद्दे पर आंखें मूंदे रहने वाली सरकारें अपनी छवि बचाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन उन्हें अपनी छवि के अलावा अन्य कुछ बदलाव करने की जरूरत नहीं महसूस होती."

स्वराज अभियान ने सूखे राहत के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने जोर देकर कहा कि सूखा से निपटना राज्य सरकारों का काम है. 11 मई को अपने फैसले में अदालत ने मोदी सरकार को आपदा राहत तंत्र को क्रियान्वित न करने के लिए लताड़ लगाते हुए कहा कि इससे सूखा पीड़ितों को थोड़ी राहत मिल सकती थी.

यादव मानते हैं कि कृषि संकट की अनदेखी मोदी की गलती है. वो कहते हैं, "लोगों की सोच के उलट मोदी की अग्निपरीक्षा राष्ट्रवाद या जेएनयू इत्यादि नहीं साबित होंगे बल्कि ग्रामीण इलाकों और खेती का संकट ही उनकी सबसे बड़ी परीक्षा साबित होंगे. जिनका मोदी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है, न ही वो जवाब देना चाहती है."

First published: 23 May 2016, 7:48 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

पिछली कहानी
अगली कहानी