Home » इंडिया » Two years of saffron govt: BJP is also included in Modi Government
 

दो साल की सरकार: मोदी की सरकार में भाजपा भी शामिल है

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • भाजपा का जन्म दो सूत्रों पर आधारित है. पहला संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप के तौर पर है जिसका लक्ष्य सत्ता को हासिल करना है और उसके ज़रिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच वाले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लागू करना और उसके लिए रास्ता बनाना है. 
  • भाजपा ने हमेशा कांग्रेस की राज्यों के प्रति तानाशाही नीतियों का विरोध किया. कोऑपरेटिव फेडरेलिज्म की दुहाई देकर संसद में कांग्रेस को घेरा. लेकिन अरुणाचल में खुद पार्टी इसमें फंस गई. रही सही कसर उत्तराखंड में पूरी हो गई.

नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं और देश के प्रधानमंत्री भी. सत्ता उनके हाथ में है और सत्ता में निहित शक्ति भी. लेकिन मोदी की ताकत के चरमकाल में भाजपा आज भी अच्छे दिन का इंतज़ार कर रही है. कार्यकर्ता जोश में हैं लेकिन दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व कमज़ोर पड़ता जा रहा है और पार्टी के संसद में बहुमत चेहरे दुखी हैं. मोदी के दो वर्ष के सफर में पार्टी का न तो स्वस्थ विकास हो रहा है और न ही वो अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध रह पा रही है.

भाजपा का जन्म दो सूत्रों पर आधारित है. पहला संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप के तौर पर है जिसका लक्ष्य सत्ता को हासिल करना है और उसके ज़रिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच वाले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लागू करना और उसके लिए रास्ता बनाना है. दूसरा सूत्र है देश की राजनीति में कांग्रेस के चाल चरित्र के समानान्तर एक राजनीतिक विकल्प खड़ा करना.

पार्टी दोनों ही सूत्रों को साधने में लगी रही. उसने कांग्रेस के राष्ट्रवाद के सापेक्ष हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपना झंडा बनाया और दूसरी ओर खुद को पार्टी विद डिफ़रेंस बताया. यानी परिवारवाद से मुक्त, सिद्धांतों की राजनीति करने वाली पार्टी. 

सत्ता के शीर्ष पर 2014 की उपलब्धि भाजपा के लिए ऐतिहासिक थी. लेकिन यह भाजपा से ज्यादा मोदी की जीत थी. मोदी की जीत में भाजपा शामिल थी. इसीलिए सत्ता भी मोदी की है. भाजपा उसमें शामिल है.

भाजपा के पास कुछ उपलब्धियां ज़रूर हैं लेकिन जीत से भरे सीनों में हताशा और निराशा का उबाल भी आ रहा है

दरअसल, विकास के जिस मॉडल की बात करके मोदी सरकार में आए, वो भाजपा का नहीं, उनका है. जिस ताने-बाने के सहारे उन्होंने अपने प्रचार को साधा, वो भी भाजपा का नहीं, मोदी का था. भाजपा के चेहरों के प्रति विश्वास से ज्यादा संदेह बना रहा. सबको साथ लेकर चलने के बजाय एकला चलो रे वाले मंत्र पर मोदी चले.

मोदी जीते. भाजपा सत्ता तक पहुंची. इसके बाद की कहानी में भाजपा के पास कुछ उपलब्धियां ज़रूर हैं लेकिन जीत से भरे सीनों में हताशा और निराशा का उबाल भी आ रहा है.

उपलब्धियां हैं ऐसे राज्यों में जीत जहां पार्टी का खाता नहीं खुलता था. असम और जम्मू कश्मीर में सरकार बनी. हरियाणा में भाजपा सत्ता में आई. महाराष्ट्र में अप्रत्याशित बहुमत मिला. केरल और बंगाल में खाता खुला, बढ़त मिली.

दूसरी बड़ी उपलब्धि है संघ के एजेंडे का सधना. संघ जैसे जैसे अपनी जड़ें मज़बूत कर रहा है और प्रभावी हो रहा है, भाजपा के लिए भविष्य का रास्ता साफ हो रहा है. लेकिन रास्ते पर चलते हुए पार्टी जिन सिद्दांतों की दुहाई देती थी, उनसे पथभ्रष्ट नज़र आ रही है.

भाजपा ने हमेशा कांग्रेस की राज्यों के प्रति तानाशाही नीतियों का विरोध किया. कोऑपरेटिव फेडरेलिज्म की दुहाई देकर संसद में कांग्रेस को घेरा. लेकिन अरुणाचल में खुद पार्टी इसमें फंस गई. रही सही कसर उत्तराखंड में पूरी हो गई.

राज्यों को अस्थिर करने के चलते ही भाजपा ने छवि भी खोई है और संसद के अंदर दलों के बीच अपनी साख भी

भाजपा के पास अब इस मुद्दे पर दूसरे दलों को कुछ कहने का नैतिक बल खत्म हो गया है. पार्टी को अभी कर्नाटक, हिमाचल, दिल्ली जैसे राज्यों में जोड़तोड़ की कोशिशों का भी जवाब देना है. राज्यों को अस्थिर करने के चलते ही भाजपा ने छवि भी खोई है और संसद के अंदर दलों के बीच अपनी साख भी.

बिहार चुनाव से पहले एक के बाद एक भाजपा विरोधी दलों पर किए गए स्टिंग आते रहे. ऐसा ही उत्तरखंड में दोहराया गया. इससे पार्टी को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ. 

भाजपा पर इसके आरोप लगे और स्टिंग के निशानों को जनता की सहानुभूति मिली. भाजपा दरअसल जिस शॉर्टकट राजनीति का शिकार बनती जा रही है, वो उसके लिए आत्मघाती साबित होगी.

पार्टी में नेतृत्व और नियंत्रण का अति केंद्रीकरण भी नुकसानदेह रहा है. इसी अति केंद्रीकरण ने पार्टी के सभी फैसलों को एक ही नल से सींचना शुरू कर दिया है. राज्यों की इकाई से लेकर केंद्रीय स्तर तक उनका बोलबाला है जो अध्यक्ष और मोदी को प्रिय हैं, उनके प्रति वफादार हैं.

इसमें पार्टी और कार्यकर्ता के प्रति निष्ठा गौड़ हो गई है. पार्टी अब शतरंज की बिसात है. अपनी पसंद के मोहरे अपनी पसंद के खानों में तैनात कर दिए गए हैं. एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और आगे बढ़ने की गुंजाइश अब पार्टी में न के बराबर है. जो राजा को प्रिय है, वही मंत्री है, यह पार्टी का नया मंत्र है.

ऐसी ही स्थितियां पार्टी में भीतरघात और अविश्वास को बढ़ावा देती हैं

पार्टी ने अपने वरिष्ठों को वनवास दे दिया है. समकक्षों के पंख सिल दिए गए हैं. और दूसरी तीसरी पंक्ति में शार्टकट और आत्मकेंद्रित प्रयासों का उदाहरण स्थापित कर दिया गया है. 

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "आज भले ही जीत का बुखार कुछ न देखने दे लेकिन आने वाले वर्षों में ये चीज़ें पार्टी को और भटकाएंगी और पार्टी की एक पूरी पीढ़ी इससे प्रभावित हो रही है. यह किसी भी तरह से स्वस्थ नहीं है."

केंद्रीकरण का दूसरा असर संसद में है. भाजपा के अधिकतर सांसद अपने को उपेक्षित और प्रभावहीन पाते हैं. उन्हें इशारा है कि आपसे मोदी नहीं आए, आप मोदी लहर की बदौलत आए हैं.

मंत्रालयों से लेकर मोदी तक भाजपा के अपने सांसदों की ही आवाज़ सुनी नहीं जा रही है. बीच बीच में कुछ असंतोष के सुर सुनने को मिलते रहे हैं लेकिन सत्ता और पार्टी की डोर एक ही जगह होने की वजह से विद्रोह का साहस कोई नहीं कर पा रहा है.

शत्रुघ्न सिंहा और आरके सिंह जैसे लोगों को कीर्ति आज़ाद के मामले में सख्त कार्रवाई से चेतावनी दे दी गई है.

लेकिन सांसदों को दोबारा चुनाव लड़ना है. लोगों के बीच और सत्ता के गलियारों में खुद को असहाय पाकर वे कितने दिनों तक सरकार और नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्ध बने रहेंगे, इसकी चिंता भी भाजपा को करनी होगी. 

ऐसी ही स्थितियां पार्टी में भीतरघात और अविश्वास को बढ़ावा देती हैं. भाजपा के लिए ये चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.

भाजपा केवल मोदी के सहारे ही अपना आगे का रास्ता नहीं तय कर सकती. मोदी जीत की गारंटी नहीं हैं. दिल्ली और बिहार में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है. दक्षिण में जो बोहनी हुई है, वो भविष्य में जीत की कहानी से कोसों दूर है. 

मोदी को खुद भी भाजपा से ज़्यादा संघ पर भरोसा है और पार्टी नेतृत्व को संगठन से ज्यादा प्रबंधन पर

पंजाब और उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पार्टी के लिए अस्तित्व की लड़ाई चुनौती बनकर खड़ी है. लेकिन पार्टी अभी भी स्थानीय और क्षेत्रीय नेतृत्व को खुला हाथ नहीं दे रही है. अगर पार्टी बिहार और दिल्ली की भूल दोहराएगी तो इन राज्यों से अच्छी खबर सुनने को नहीं मिलने वाली.

मोदी को खुद भी भाजपा से ज़्यादा संघ पर भरोसा है और पार्टी नेतृत्व को संगठन से ज्यादा प्रबंधन पर. इसलिए भी भाजपा उपेक्षित है. पार्टी के एक और वरिष्ठ कहते हैं, "जो चेहरे आज भाजपा की कमान लोगों के बीच संभालते नज़र आ रहे हैं, वो नेता कम प्रबंधक ज़्यादा लगते हैं. प्रबंधकों को केवल नेतृत्व के हित से मतलब होता है. पार्टी कहां जाएगी, इससे नहीं. इसीलिए बार-बार ऐसे फैसले लिए गए हैं जिनसे पार्टी की छवि को नुकसान हुआ है".

जनता के बीच पार्टी की छवि सरकार के कामों से निर्धारित हो रही है. सरकार अतिकेंद्रीकरण की शिकार है. पीएफ़ से लेकर फार्म 16 तक सरकार को अपनी नीतियों की वजह से किरकिरी झेलनी पड़ी है. 

निर्णँय लेने में पार्टी के सांसदों और कार्यकर्ताओं से ज़्यादा नौकरशाहों पर भरोसा किया जा रहा है. पार्टी अपने काम करा नहीं पा रही और लोगों के बीच सरकार के कामकाज से असंतोष को भी झेल रही है. कार्यकर्ता उपेक्षित और असहाय महसूस कर रहा है.

पार्टी की सबसे बड़ी चुनौतियां दो हैं. पहली है अपने पारंपरिक मुद्दों पर जनता के बीच कुछ करके दिखाना. राम मंदिर हो, स्वदेशी हो, कांग्रेस के कथित भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करना, भ्रष्टाचारियों को जेल भेजना, विदेशी निवेश को रोकना, अगड़ों की चिंता करना, हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद को स्थापित करना, नर नारायण के नारे को चरितार्थ करना, ऐसे कितने ही मोर्चों पर पार्टी के समर्थक और वोटर उत्साहित हैं. हालांकि इनपर पार्टी कुछ अर्जित करती नज़र नहीं आ रही है.

लोग अब दो साल बाद बातों को टालते नज़र आते हैं या फिर रक्षात्मक मुद्रा में बचाव करते

दूसरा है मोदी के स्वप्नलोक के प्रति जनता के बीच पार्टी की जवाबदेही. कालाधन से लेकर कांग्रेसियों को जेल भेजने तक का वादा, पाकिस्तान से कड़ाई से निपटने का वादा, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का वादा, रोज़गार के करोड़ों अवसर पैदा करने का वादा, किसानों, भूमिहीनों से लेकर महिलाओं और कामगारों तक के लिए सुरक्षित और अच्छी व्यवस्था देने का वादा, ऐसे कितने ही इंद्रधनुषी रंगों से मोदी ने अपने प्रचार को रंगा था. 

अबतक इनपर सरकार कुछ सार्थक कर पाने में असमर्थ रही है. सरकार की विफलताएं भाजपा के सिर पर पड़ रही हैं.

यह अनायास ही नहीं है कि रेलगाड़ियों से लेकर बैठकों, चौराहों तक मोदी के नाम पर लड़ने मरने को आमादा हो जाने वाले लोग अब दो साल बाद बातों को टालते नज़र आते हैं या फिर रक्षात्मक मुद्रा में बचाव करते. 

मोदी के प्रशंसकों और पार्टी के कार्यकर्ताओं का ये गिरता मनोबल पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. कार्यकर्ता का दुख यह है कि जिन फैसलों में न तो वह शामिल है और न ही वो सहमत, उनके प्रति उसे ही जमीन पर सुनना पड़ रहा है और पार्टी का बचाव करना पड़ रहा है.

मोदी पार्टी के लिए सत्ता का रास्ता बने. लेकिन पार्टी के लिए अगर मोदी बोझ बनने लगेंगे तो यह मोदी के लिए भी नकारात्मक साबित होगा और पार्टी के लिए भी. भाजपा मुनाफ़े के खेल को राजनीति मानकर चल रही है. 

संकट यह है कि मुनाफे की यह भूख जुमलों और झूठ पर आधारित है. पार्टी न तो भीतर से शांत है और बाहर स्वस्थ रह पा रही है. मोदी के प्यादे थक रहे हैं और निरुत्साहित हो रहे हैं. यह निःसंदेह अच्छे दिन तो नहीं.

उत्तर प्रदेश के एक भाजपा सांसद चुटकी लेकर कहते हैं, "इससे तो हम किसी और पार्टी के सांसद होते तो भले होते". यह चुटकी पार्टी के अंदर चुटकुला बनती जा रही है. भाजपा के उर्मिला वियोग का वनवास न जाने कब पूरा होगा.

First published: 26 May 2016, 11:00 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी