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दो साल भगवाराज: जहां चित्त में भय और सिर झुके हैं

भारत भूषण | Updated on: 16 May 2016, 9:17 IST
QUICK PILL
  • 26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. लोकसभा चुनाव में जनता ने उन्हें निर्णायक जनादेश दिया था. आज दो साल बाद क्या मोदी उन वादों और उम्मीदों पर खरा उतर पा रहे हैं जिनपर भरोसा कर देश की जनता ने सर्वोच्च पद तक पहुंचाया था?

अधिकतर भारतीय प्रधानमंत्री स्वयं को एक निष्पक्ष, दयालु और सहृदय राजनेता के रूप में खुद को पेश करने का प्रयास करते हैं और यह उम्मीद रखते हैं कि देश उन्हें प्रेम करने के साथ इसी रूप में उन्हें याद रखेगा.

लेकिन नरेंद्र दामोदरदास मोदी इनसे जुदा लगते हैं. उनके शासन के बीते दो वर्ष इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि वे सिर्फ डर का भाव फैलाना चाहते हैं.

उनके प्रशासन ने भारतीय समाज के मुसलमानों, दलितों, इसाईयों जैसे वर्गों के साथ लेखकों, कलाकारों, उदार बुद्धिजीवियों से लेकर मीडिया तक के मन में भय का भाव जगाने का काम किया है.

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वे हर संभव तरीके से ऐसा चाहते हैं कि विपक्षी दल उनसे डरें. वे विपक्षियों को कभी भी उसके द्वारा किये गए भ्रष्टाचार की पोल खोलने की धमकी देते हुए जेल भेजने की बात कहते हैं. शायद उनका मकसद वास्तव में भ्रष्ट राजनेताओं को सजा दिलवाना नहीं है. वे सिर्फ यह चाहते हैं कि वे हरदम सिर्फ उनके अगले कदम से डरकर रहें.

यहां तक कि पार्टी के उनके सहयोगी भी उनसे उतना ही डरते हैं जितना कि नौकरशाह. उनके साथ मिलकर काम करने वाले मानते हैं कि उन्हें असहमति बिल्कुल नापसंद है और वे अपने फैसलों की मुखालफत करने वालों को कभी नहीं भूलते हैं.

प्रतिभा की कमी से जूझ रहे मोदी के प्रशासन को यह बात समझनी होगी कि डर राष्ट्र निर्माण के लिये आवश्यक मेधा को बढ़ावा नहीं दे सकता

वे अपने साथ असहमति जताने वालों को राजनीतिक रूप से खत्म कर देते हैं और गुजरात और दिल्ली के कई राजनीतिज्ञ इसी वजह से हाशिये पर पहुंच चुके हैं. ऐसा लगता है कि उन्हें सिर्फ कुछ उन चुनिंदा पुलिसकर्मियों और गुजरात के नौकराशाहों पर भरोसा है जिन्होंने उनके कदमों में सिर झुकाना सीख लिया है.

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शायद मोदी को लगता है कि लोगों के बीच भय का भाव उन्हें शासन पर बेहतर नियंत्रण प्रदान करेगा. लेकिन कोई भी आसानी से यह कह सकता है कि सहयोगियों, नौकरशाही के अलावा अल्पसंख्यकों, असंतुष्टों और आम जनजीवन में बुद्धिजीवियों को प्रताड़ित करने जैसे कदम उठाकर इस देश के लोगों को बड़ा काम करने के लिये प्रेरित करना संभव नहीं है. प्रतिभा की कमी से जूझ रहे मोदी के प्रशासन को यह बात समझनी होगी कि डर राष्ट्र निर्माण के लिये आवश्यक मेधा को बढ़ावा नहीं दे सकता.

एकाधिकारवादी शासन का तर्क उपरोक्त संकेतो से एकदम स्पष्ट हो जाता है. जरा देखिये कि किस प्रकार मशहूर अर्थशास्त्री और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को लगभग रोजाना अपमानजनक तरीके से अनुशासन में रहने की हिदायतें दी जा रही हैं.

हो सकता है कि मोदी रेडियो के माध्यम से छोटे-मोटे मुद्दों पर लोगों से सीधे बात करके खुद को एक परिपक्व और लोकप्रिय राजनेता के रूप में देख रहे हों. लेकिन क्या लोग भी उन्हें इसी रूप में देखते हैं? वे इन सबके बावजूद लोगों में  भरोसा और आत्मविश्वास पैदा करने में असफल ही रहे हैं.

विभाजनकारी व्यक्तित्व

इन सबके अलावा मोदी के शासन के इन दो वर्षों ने साफ किया है कि वे लोगों को जोड़ने वाले नेता न होकर एक विभाजनकारी व्यक्तित्व के स्वामी हैं. भारत को एकजुट करने का दावा करने वाले मोदी वास्तव में विचारधारा, के स्तर  पर फूट और असंतोष पैदा करने वाले सिद्ध हुए हैं.

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हिंदुओं को मुसलमानों और इसाईयों के खिलाफ, ऊंची जातियों को दलितों के विरुद्ध, विश्वविद्यालयों को छात्रों, राष्ट्रीय कला, संस्कृति और बौद्धिक संस्थानों को उन्हें पहचान दिलवाने वाली शख्सियतों के खिलाफ, ‘‘देशभक्तों’’ को ‘‘देशद्रोहियों’’ के खिलाफ, झंडा उठाने वालों को न उठाने वालों के खिलाफ और ‘भारत माता की जय’ बोलने वालों को ऐसा न करने वालों के खिलाफ खड़ा करने का काम इन दो सालों में किया है.

और बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती

जनता को भी गौमांस खाने वालों और गौभक्तों के बीच, महात्मा गांधी को पूजने वालों और उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘‘देशभक्त’’ की तरह प्रचारित करने वालों के बीच, भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने का समर्थन और विरोध करने वालों के बीच, ऐसे लोगों के बीच जिनका यह मानना है कि हिंदु महिलाओं को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करने के लिये अधिक बच्चे पैदा करना चाहिये और दूसरी तरफ ऐसे लोग जिन्हें यह पित्रसत्ता और समाज को साप्रदायिक आधार पर बांटने वाला लगता है के बीच बांटने के अलावा देश को प्रेम के आधार पर भी बांट दिया गया है.

विभाजनकारी विचार, जिनका अब तक समाज में दबे छुपे जिक्र आता था वह मौजूदा समय की सच्चाई बनते जा रहे हैं

अपने दो वर्षों के शासनकाल में मोदी सरकार और उसके सहायकों ने लगभग प्रतिदिन किसी न किसी नए विवाद को जन्म देने का काम किया है. हर बार वे अपने विरोध में उठने वाली आवाज को राष्ट्रविरोधी कहते हैं और इसके अलावा सरकार और उसकी नीतियां के विरोध में आवाज उठाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को, फिर चाहे वह छात्र, किसान, मजदूर नेता, पत्रकार या फिर सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ता हों, को अपराधी साबित करने में लग जाते हैं.

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गरीबों, आदिवासियों और हाशिए के समाजों के खिलाफ सरकारी मशीनरी का जितना दमनकारी इस्तेमाल मोदी सरकार ने किया है वह अब तक किसी ने नहीं किया था. ये समाज सिर्फ खनन माफिया और बिल्डरों का ही शिकार नहीं है बल्कि पर्यावरण की तबाही से पैदा हुए खतरों से भी जूझ रहा है.

एक तरफ मोदी और उनका वैचारिक कुनबा ‘अखंड भारत’ का राग छेड़ते थक नहीं रहा हैं लेकिन दूसरी तरफ उनके तमाम कृत्य साफ दर्शा रहे हैं कि उन्होंने देश में पहले से ही चौड़ी हो चुकी विभाजनकारी नीतियों को ही मजबूत करने का काम किया है. विभाजनकारी विचार, जिनका अब तक समाज में दबे छुपे जिक्र आता था वह मौजूदा समय की सच्चाई बनते जा रहे हैं.

सरोकारों का अभाव

कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा है कि भारत के गरीब और वंचित लोग प्रधानमंत्री मोदी की सबसे पहली चिंता हैं. वे वैश्विक नेताओं और काफी समय पूर्व अपनी मातृभूमि को छोड़कर विदेशों में बस चुके भारतीय मूल के लोगों से अपना स्वागत और जय जयकार करवाकर ही खुश हो रहे हैं.

वे जून के महीने की अपनी प्रस्तावित अमेरिका यात्रा के दौरान स्पेलिंग बी के विजेताओं से मुलाकात का कार्यक्रम बना रहे हैं जबकि उन्हें अभी तक देश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने का समय नहीं मिला है. देश इस समय भयंकर सूखे से जूझ रहा है. 256 जिलों में रहने वाले 33 करोड़ लोग इसकी चपेट में हैं. 

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सरकार के अपने अनुमानों के अनुसार पूरे देश में पानी का भयंकर संकट है और किसान लगातार तीसरे वर्ष फसल के बेहद गंभीर नुकसान का सामना कर रहे हैं.

ऐसे समय में जब कृषि विकास की सालाना दर गिरकर दो प्रतिशत से नीचे आ गई है लोग सोच रहे हैं कि क्या खाद्यान्न का संकट उनकी नजरों में कोई मायने भी रखता है या नहीं. या फिर उन्हें इस बात का अंदाजा भी है कि सूखे के इस भयंकर समय में भी ग्रामीण रोजगार गारंटी प्रदान करने वाली सामाजिक सुरक्षा की योजना उनके राज में सिमट कर रह गई है.

मोदी से नाराज जनता का एक बड़ा लेकिन चुप रहने वाला वर्ग अब लगातार बढ़ता जा रहा है

सरकार ने अबतक इस योजना में आवश्यक धन का वितरण नहीं किया है. सूखे के मुद्दे पर मोदी सरकार की संवेदनशीलता को इस बात से ही समझा जा सकता है कि राहत कार्यों में तेजी लाने के लिये एक एजनीओ को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा.

मोदी से नाराज जनता का एक बड़ा लेकिन चुप रहने वाला वर्ग अब लगातार बढ़ता जा रहा है. अभी इन लोगों के पास किसी भी तरह का नेतृत्व नहीं है क्योंकि मुख्यधारा के राजनीतिक दल अबतक उनकी नब्ज को पकड़ने में नाकाम रहे हैं. कन्हैया कुमार जैसे एक मामूली छात्रनेता का उदय और उसके प्रति जनता द्वारा दिखाया गया समर्थन और भावना दिखाती है कि देश की संसदीय राजनीति और दल किस प्रकार की नेतृत्व शून्यता के दौर से गुजर रहे हैं.

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लेकिन सिर्फ डर ही भारत को मजबूत नहीं करेगा और उनके ‘‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’’ जैसे नारे भी ऐसा करने में नाकामयाब ही साबित ही हो रहे हैं. गौरतलब है कि आम चुनाव प्रचार के दौरान मोदी की छवि सुधारने के लिये जिम्मेदार कंपनी एप्को वर्ल्डवाइड ने ‘‘एक इजराइल’’ और ‘‘एक मलेशिया’’ नारों की तर्ज पर इन नारों का निर्माण किया था.

डर न केवल उन लोगों के लिये ही भयावह साबित होता है जिन्होंने उसे भुगता है बल्कि यह इसे लागू करने वाले के लिये भी हमेशा नुकसानदेह ही साबित होता है. अगर मोदी दूसरों पर प्रभाव डालने लायक आत्मविश्वास पैदा कर पाने मे नाकामयाब रहते हैं तो उनका उनपर नियंत्रण समाप्त हो जाएगा. 

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अगले आम चुनावों का इंतजार कीजिये और जिन लोगों को हाशिये पर डाल दिया गया है या फिर जिनका अपमान किया जा रहा है वे बड़ी तादाद में अपने मताधिकार की ताकत से आपका गुरूर तोड़ेंगे मोदी जी.

First published: 16 May 2016, 9:17 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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