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उदित राज भाजपा में बिना शीर्षक वाला दलित फोटो हैं

अनिल चमड़िया | Updated on: 4 March 2016, 22:41 IST
QUICK PILL
  • कांशी राम की तरह उदित राज ने आयकर विभाग से इस्तीफा देने के बाद पहले \r\nदलित-आदिवासी अधिकारियों और कर्मचारियों का एक संगठन बनाया, बौद्ध धर्म \r\nग्रहण किया और बाद में अपनी राजनीतिक पार्टी \'जस्टिस पार्टी\' का गठन किया
  • वही उदित राज दिल्ली में भाजपा की टिकट पर लोकसभा के सांसद बनने के बाद किसी भी कार्यक्रम में दलितों पर अत्याचार के मामलों पर बोलने से \r\nबचते हैं

भारतीय जनता पार्टी के सांसद उदित राज अपने बीते हुए कल से छुटकारा पाने के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं. जब जेएनयू में 2013 में 'महिषासुर शहादत दिवस' मनाने का मामला मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा संसद में उठा, तब मीडिया ने उदित राज से उस कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति का उद्देश्य जानना चाहा. उन्होंने उस कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति तो स्वीकार की, लेकिन यह बताने से इनकार कर दिया कि उन्होंने वहां कहा क्या था.

तकनीक में हुई उन्नति ने किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी उपस्थिति का खंडन करने का कोई मौका ही नहीं छोड़ा है, लेकिन फिर भी तस्वीरों के शीर्षक (कैप्शन) मिटा देने का विकल्प तो उनके पास मौजूद है ही, क्योंकि वह तो उनका खुद का शिल्प होता है. उस कार्यक्रम में वक्ताओं ने खुलकर हिन्दू पुराणों और बहुजन संस्कृति के बारे में विचार-विमर्श किया था. उदित राज ने भी हिन्दू मान्यताओं और हिन्दुत्व पर एक महत्वपूर्ण विश्लेषण सबके सामने रखा था.

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वर्ष 2014 के चुनाव में दिल्ली के एक लोकसभा क्षेत्र से भाजपा की टिकट पर सांसद बनने के बाद उदित राज किसी भी कार्यक्रम में दलितों पर अत्याचार के ऐसे मामलों पर बोलने से बचते हैं, जो हिन्दुत्व और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व पर सवाल खड़ा करता हो.

विकीपीडिया पर उदित राज खुद को दलित समुदाय से संबद्ध खटिक जाति का सदस्य बताते हैं

वे कहते हैं एक बड़े मकसद के लिए इससे बचना ही बुद्धिमानी है. यही वह 'बुद्धिमत्ता' है जो उनको सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐसे सभी दस्तावेज और यादें मिटा देने के लिए उतावला बनाती है, जो हिन्दुत्व और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व की आलोचना और निंदा से भरे हुए हैं.

यहां यह गौर करना दिलचस्प होगा कि उन्होंने हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म की कड़ी निंदा करने के बाद, डॉ. आंबेडकर के नक्शे-कदम पर अपना धर्म परिवर्तन का निर्णय लिया था. उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था और अपना नाम राम राज से बदलकर उदित राज कर लिया था.

वे राम राज के तौर पर सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में बहुत सक्रिय थे. लेकिन ऐसा लगता है कि सही मायने में दलित राजनीति का नेता बनने के लिए हिन्दू धर्म की निंदा करना उनके लिए अनिवार्य था. कांशी राम की तरह उदित राज ने आयकर विभाग से इस्तीफा देने के बाद पहले दलित-आदिवासी अधिकारियों और कर्मचारियों का एक संगठन बनाया, बौद्ध धर्म ग्रहण किया और बाद में अपनी राजनीतिक पार्टी 'जस्टिस पार्टी' का गठन किया.

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परन्तु ये सब उन्हें उनके सपने तक पहुंचाने में असफल रहे. सपना, सांसद बनने का. उन्होंने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि जब अस्तित्व का सवाल उठने लगे तो नेतृत्व को अपनी सोच बदल लेनी चाहिए. लेकिन नेतृत्व जब तक अपने अस्तित्व का तर्क गढ़ता है तब तक पुल के नीचे से बहुत सा पानी गुजर चुका होता है.

उनकी राजनीतिक गतिविधियां जनता की यादों में भाषणों, दस्तावेजों और तस्वीरों के रूप में रिकॉर्ड हो चुकी होती हैं. दरअसल, जब एक सरकारी अधिकारी राजनीति में डुबकी लगाने का फैसला करता है तो यह साफ तौर पर उसकी महत्वाकांक्षा की ओर इशारा करता है.

सरकारी सेवा से इस्तीफा देने के बाद उदित राज ने अधिकारियों का एक संगठन बनाया और 'वॉइस ऑफ बुद्धा' के नाम से एक अखबार भी शुरू किया. उस समय की तस्वीरों में वे कांग्रेस के मंत्रियों, वामपंथी और समाजवादी नेताओं के साथ नजर आते हैं.

लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद उनकी तस्वीरों में नेताओं का नया समूह नजर आने लगा. अचानक, सीधे नागपुर से, नितिन गडकरी उनके कार्यक्रमों और समारोहों में दिखने लगे. राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि वे अपनी पुरानी तस्वीरों के शीर्षक मिटाने पर उतारू थे. उनकी वेबसाइट तस्वीरों से भरी पड़ी है, लेकिन उनसे शीर्षक (कैप्शन) गायब हैं.

यह वास्तव में हास्यास्पद है कि वे किसी भी कीमत पर अपना बीता हुआ कल छिपाना चाहते हैं. कोई भी उनकी वेबसाइट पर उनके फोटो के साथ लहराता भगवा झंडा देख सकता है. लेकिन सबसे अधिक हैरान करने वाला तथ्य है कि वे अपने परिचय में खुद का वर्णन उत्तर प्रदेश के दलित हिन्दू परिवार के सदस्य के रूप में करते हैं!

उदित राज अपना परिचय उत्तर प्रदेश के दलित हिन्दू परिवार के सदस्य के रूप में देते हैं

कोई भी अपना जन्म तो नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन यह पूरी तरह उसी पर निर्भर करता है कि वह खुद की पहचान कैसे बताता है.

वे अपने जन्म से लेकर सब जानकारी देते हैं, लेकिन वे खुद द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार करने की बात भूल जाते हैं. यह उनके बारे में लिखने वाली एकमात्र वेबसाइट नहीं है. जैसे-जैसे वेबसाइट बदलती हैं, उनका परिचय भी बदलता जाता है.

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एक और वेबसाइट पर वे अपनी दलित पहचान के बारे में बात नहीं करते. लेकिन विकीपीडिया पर वे खुद को दलित समुदाय से संबद्ध खटिक जाति का सदस्य बताते हैं. अपनी सक्रियता के बारे में बात करते समय उदित राज गर्व से जिक्र करते हैं कि भारतीय दलित नेता और संविधान निर्माता बीआर अम्बेडकर की परंपरा पर चलकर उन्होंने नवंबर 2001 में हजारों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था.

अपना परिचय लिखते हुए उदित राज उन नेताओं की परम्परा को फॉलो करते हैं जो उनकी खुद की जाति में पकड़ रखते हैं, अपनी राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के लिए वोट बैंक सुरक्षित करने हेतु. दलित वास्तव में अनुसूचित जातियों के एक समूह के अलावा कुछ नहीं है. संसदीय लोकतंत्र में, हर समूह का सिर्फ एक सांकेतिक महत्व होता है और वास्तव में जातियां अधिक महत्वपूर्ण हैं.

उत्तर प्रदेश में खटिकों की बड़ी आबादी है. इससे भी ज्यादा, भाजपा उन जातियों को अपनी पकड़ में लाना चाहती है जो दलित राजनीति के नेताओं की पकड़ में हैं. जाटवों में मायावती की पकड़ बिना किसी संदेह के जबर्दस्त है और यह जानी-समझी बात है कि उन्हें दूसरी पार्टियां ललचा नहीं सकती. भाजपा अगड़ी जातियों के अपने मुख्य आधार में कुछ दलित जातियों को निर्धारित प्रतिनिधित्व देकर अपने साथ जोड़ने में कामयाब हुई है.

जिस तरह से वेबसाइटों को मैनेज किया गया है, यह दरअसल दर्शाता है कि वे अपने बीते हुए कल को कालीन से ढकते हुए 'हिन्दुत्व' और अपनी पार्टी में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वे अपनी उपलब्धियों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के गठबंधन के भी कर्जदार हैं.

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ऐसा लगता है कि उन्होंने अक्टूबर 2013 में भाजपाई खेमे में कूदने का निर्णय लिया और उसी के अनुसार अपनी ट्यून बदल ली. इस राजनीतिक कलाबाजी से पहले वे धर्मनिरपेक्षता पर अलग तरह की भाषा बोलते थे. लेकिन बहुत जल्द स्यूडो धर्मनिरपेक्षता उनका आधिकारिक स्टैंड बन गया.

'वॉइस ऑफ बुद्धा' के पुराने अंक वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं. 1998 में आरएनआई के साथ रजिस्टर किए गए 'वॉइस ऑफ बुद्धा' के पाठक कहते हैं कि यह पाक्षिक समाचार पत्र हिन्दुत्व और भाजपा का कड़ा आलोचक था. इसमें महिषासुर पर विस्तार से आलेख छपते थे. लेकिन इसके 2013 के या उसके पहले के अंक वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं.

भगवा पार्टी में शामिल होने से पहले उदित राज की अन्यत्र उपस्थिति इस आशा के इर्द-गिर्द घूमती है कि दलितों को शासन में एक उचित हिस्सा दिया जाएगा. लेकिन यदि यह उचित हिस्सा सब दलितों के प्रतिनिधि के रूप में एक विशेष जाति में बांट दिया जाता है तो यह बहुत हास्यास्पद होगा.

इससे भी बड़ी बात, दलित राजनीति के भी कई आयाम हैं और वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. उदाहरण के तौर पर दलितों पर अत्याचार, रोहित वेमुला केस और जेएनयू विवाद पर क्या वे उन दलितों के लिए अपनी आवाज बुलंद कर पाएंगे जिन्होंने इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है? पहले वे अक्सर दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों के लिए आरक्षण की पैरवी करते थे, लेकिन भाजपा ऐसी मांगों की विरोधी है.

हिन्दुत्व आधारित भगवा राजनीति में समाने के लिए उदित राज को गंगा में कई डुबकी लगाकर पवित्र होना पड़ेगा. केवल तभी उनकी विचारधारा को 'पाप' की तरह देखने वाली भाजपा शायद उनको 'पवित्र' घोषित कर दे.

First published: 4 March 2016, 22:41 IST
 
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