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'उड़ता पंजाब से उड़ता मजाक तक...'

राजीव खन्ना | Updated on: 7 June 2016, 23:20 IST

पंजाब में रहने वाले एक शख्स ने हाल ही में सोशल मीडिया पर स्टेटस पोस्ट किया, 'उड़ता पंजाब से उड़ता मजाक तक...'

ये स्टेटस फिल्म पर हो रहे विवाद पर राज्य के आम लोगों की भावनाओं का सही प्रतिनिधित्व करता है.

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने निर्देशक अभिषेक चौबे की फिल्म 'उड़ता पंजाब' के कई दृश्य और संवाद हटाने के लिए कहा है. लगभग 89 कट सुझाए गए हैं.

'उड़ता पंजाब' की गाली से नहीं 'राजनीतिक संदेश' से डर है

मीडिया खबरों के अनुसार बोर्ड ने राज्य से जुड़े दूसरे संवादों के साथ फिल्म के शीर्षक से पंजाब शब्द भी हटाने के लिए कहा है.

पंजाब में आम लोगों को लग रहा है कि सीबीएफसी राज्य की शिरोमणी अकाली दल और बीजेपी गठबंधन सरकार को बचाने के लिए ऐसा कर रहा है. राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

माना जा रहा है कि राज्य में माहौल सत्ताधारी दलों के खिलाफ है.

आम जनता की राय

पिछले एक दशक में पंजाब में नशाखोरी की समस्या तेजी से बढ़ी है. ऐसे में आम लोगों का मानना है कि इस फिल्म को सेंसर करवाकर सरकार सच से मुंह छिपाना चाहती है.

अकादमिक डॉक्टर सुरजीत सिंह कहते हैं, "ये सूरज को देखकर आंखें मूंद लेने जैसा है. कला पर तानाशाही नहीं चल सकती. मैं मानता हूं कि कला को जिम्मेदार होना चाहिए लेकिन ऐसी तानाशाही स्वीकार नहीं की जा सकती. उन्हें ऐसा करने का अधिकार किसने दिया है? इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि पंजाब में नशाखोरी की समस्या काफी गंभीर हो चुकी है. इस समस्या का समाधान खोजने के बजाय उसके चित्रण पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है."

पंजाब में लोग उड़ता पंजाब की तुलना 'साड्डा हक़' और 'कौम दे हीरे' जैसी प्रतिबंधित की गई फिल्मों से कर रहे हैं.

अनुराग कश्यप: ‘उड़ता पंजाब’ पर कैंची कलात्मकता का कत्ल

रिसर्च स्कालर बेअंत सिंह कहते हैं, "सरकार सच से मुंह चुरा रही है. याद है जब राहुुल गांधी ने 70% पंजाब के नशे की चपेट में होने की बात कही थी तो सुखबीर बादल ने यह कहकर सफाई दी थी वो मजा कर रहे थे. जबकि नशे के प्रसार को लेकर कई रिपोर्टें आ चुकी हैं."

समाज का एक पहलू

'उड़ता पंजाब' फिल्म की तुलना 'साड्डा हक़' और 'कौम दे हीरे' जैसी प्रतिबंधित फिल्मों से कर रहे हैं

बेअंत सिंह कहते हैं कि पहली बार पंजाब में बनी किसी बॉलीवुड फिल्म पर प्रतिबंध लगा है. 

सिंह कहते हैं, "आखिरकार, ये फिल्म समाज के एक पहलू को दिखाती है. अगर आपको लगता है कि इसमें कुछ गलत है तो आप दूसरी फिल्म से जवाब दे सकते हैं. फिल्म निर्माताओं का किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं है. कला और साहित्य को प्रतिबंधित करने की ऐसी कोशिशों को स्वीकार नहीं किया जा सकता. मेरा मानना है कि हर तरह की कला को पूरी आजादी होनी चाहिए."

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एक अन्य अकादमिक केसर सिंह भंगू भी सीबीएफसी के रवैये से असहमत हैं. उन्होंने कैच से कहा, "एक ऑस्ट्रेलिया प्रोजेक्टे के लिए हम लुधियाना, अमृतसार और तरन तारन के चार गांवों के दौरे पर गए. गांव के लोगों से मैंने पूछा कि कितने प्रतिशत नौजवान नशे के गिरफ्त में हैं? उनका जवाब चौंका देने वाला था, उन्होंने मुझसे पलट के पूछा, आप बताइए कि कितने नौजवान नशे से बचे हुए हैं?"

केसर सिंह कहते हैं, "सभी जानते हुैं कि नशा माफिया को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है. ये सच है कि पहले भी लोग नशा करते थे लेकिन अभी की तरह कभी इसका एक मुकम्मल सप्लाई चेन नहीं था. ऐसे मेें एक फिल्म पर रोक क्यों लगाया जा रहा है जो कम से कम से लोगों को इस समस्या के प्रति जागरूक करती है. अगर आप किसी बुराई को फैलने दिया तो अब उससे होने वाली बदनामी से क्यों डर रहे हैं?"

फिल्म का गाने हुए हिट

माना जा रहा है कि बीजेपी अकाली दल के दबाव में आ गई है. इससे पार्टी के दो मकसद पूरे होंगे. एक, अकालियों की मदद से ग्रामीण पंजाब में शायद कुछ सीटें जीत सकेगी. दो, यूपी के चुनाव में उसे अकालियों की जरूरत पड़ेगी, खासकर तराई इलाके मं जहां सिखों की अच्छी खासी संख्या है.

स्थानीय पत्रकार शिव इंदर सिंह कहते हैं, "सीबीएफसी के रवैये को व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए. ये केवल एक फिल्म पर प्रतिबंध की बात नहीं है बल्कि ये एक तरह की सोच जाहिर करती है जिससे कई सवाल पैदा होते हैं. आज जो लोग सत्ता में वो अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी की बातें करते थे. अकाली और बीजेपी अक्सर कहते हैं कि उन्होंने इमरजेंसी के खिलाफ लड़ाई लड़ी है. अब वो ये नहीं बताते कि वो खुद इमरजेंसी के हथियार सेंसरशिप का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं?"

फिल्म की रिलीज को लेकर बनी अनिश्चितता के उलट पंजाब में उसके गाने लोकप्रिय हो रहे हैं. 'चिट्टा वे' गलियों-सड़कों पर आम तौर पर सुनने को मिल रहा है. 'चिट्टा' एक सिंथेटिक नशा है जिसका राज्य में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है.

जनभावनाओं से लगता है कि अगर ये फिल्म बगैर किसी कांटछांट के रिलीज हुई तो पंजाब में उसका हिट होना लगभग तय है.

First published: 7 June 2016, 23:20 IST
 
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