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यूजीसी ने कदम पीछे खींचा फिर भी दुविधा बरकरार

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
(कैच न्यूज़)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से हाल में जारी किये गये दिशा-निर्देशों पर मचे हो हल्ले के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसे संशोधित करने की अधिसूचना जारी की है. यूजीसी ने अपने नए दिशा-निर्देशों में डायरेक्ट टीचिंग के घंटे बढ़ा दिए थे. इसे स्थायी शिक्षकों के लिए 16 घंटे से बढ़ा कर 24 घंटे प्रति सप्ताह कर दिया गया था, जबकि अस्थायी शिक्षकों के लिए इसे 14 घंटे से बढ़ा कर 22 घंटे प्रति सप्ताह कर दिया गया था.

डायरेक्ट टीचिंग के घंटों को फिर से उतना ही कर दिया गया है, यानि स्थायी शिक्षकों के लिए 24 घंटे से घटाकर 16 घंटे और अस्थायी शिक्षकों के लिए 22 घंटे से घटाकर 14 घंटे प्रति सप्ताह. यह 2010 की यूजीसी की अधिसूचना के अनुरूप है.

इसकी वजह से कुछ हद तक राहत जरूर मिल गई है, लेकिन दिल्ली यूनीवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) के कार्यकारी परिषद की सदस्या आभा देव हबीब का मानना है कि अधिसूचना में स्पष्टता का अभाव है. वह कहती हैं, "यूजीसी की अधिसूचना के मुताबिक पाठ्यक्रम का ढांचा नहीं बदला है. ट्यूटोरियल्स, जो पाठ्यचर्या (करिकुलम) का अहम हिस्सा होते हैं, को डायरेक्ट टीचिंग के घंटों के दायरे में शामिल नहीं किया गया है. इससे इसकी अहमियत कम होगी. मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) की अधिसूचना इस मसले को समझने में चूक गई है."

आभा इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि यूजीसी अधिसूचना के तहत प्रायोगिक कक्षाओं (प्रैक्टिकल क्लासेज) को भी कम महत्व दिया गया है, जो कई कोर्सेज के लिए नुकसानदेह हो सकता है. वह कहती हैं, “यूजीसी की अधिसूचना में दो प्रैक्टिकल क्लासेज को एक माना गया है. एमएचआरडी की अधिसूचना इस मसले का हल नहीं निकालती.”

आभा इस बात पर जोर देती हैं कि डायरेक्ट टीचिंग के घंटों से ही यह तय होता है कि कितने लोगों को नौकरी पर रखना है और यूनीवर्सिटी को कितने धन की जरूरत है. किसी शिक्षक के लिए प्रति सप्ताह कुल कामकाजी घंटे 40 होते हैं, जिसमें डायरेक्ट टीचिंग के घंटों के अलावा ट्यूटोरियल्स, रेमेडियल क्लासेज, सेमिनार आदि आते हैं.

आम बजट 2016-17 के लिए वित्त मंत्रालय ने यूजीसी के आवंटन में 55 फीसदी की भारी कटौती की घोषणा कर दी थी.

उच्च शिक्षा की नियामक संस्था यूजीसी ने मई महीने में ही मान्यता प्राप्त कॉलेजों और यूनीवर्सिटीज के शिक्षकों के लिए नये दिशा-निर्देश जारी किये थे. इनके जारी होने के बाद काफी हंगामा हुआ, खास तौर पर कामकाजी घंटे बढ़ाये जाने को लेकर. इसे स्थायी शिक्षकों के लिए 16 घंटे से बढ़ा कर 24 घंटे प्रति सप्ताह कर दिया गया था, जबकि अस्थायी शिक्षकों के लिए इसे 14 घंटे से बढ़ा कर 22 घंटे प्रति सप्ताह कर दिया गया था. इसमें वे घंटे शामिल नहीं थे जो कोई शिक्षक प्रशासनिक कार्यों में देता है, मसलन पेपर्स की ग्रेडिंग.

विभिन्न कॉलेज और यूनीवर्सिटीज इस आधार पर शिक्षकों को काम पर रखते हैं कि किसी खास कोर्स या डिपार्टमेंट को पढ़ाई के कितने घंटों की जरूरत होगी. ऐसे में अगर हर शिक्षक के कामकाजी घंटे बढ़ेंगे, तो जाहिर है कि शिक्षकों की जरूरत कम होगी. इस कदम के विरोध का नेतृत्व कर रही आभा कहती हैं, "दिल्ली यूनीवर्सिटी के कुल 10,000 शिक्षकों (स्थायी और अस्थायी मिलाकर) में से तकरीबन 4,000 अस्थायी शिक्षकों पर इसका बुरा असर पड़ेगा."

पूरे देश की बात करें तो इन दिशा-निर्देशों की वजह से लगभग दो लाख शिक्षकों पर प्रभाव पड़ेगा. आभा कहती हैं कि डूटा ने “इस मामले को गंभीरता से लिया है” और इसका सांकेतिक विरोध करने के लिए 24 मई को दूसरे, चौथे और छठे सेमेस्टर के अंडरग्रेजुएट के पेपर्स के मूल्यांकन का इसने बहिष्कार किया.

डूटा की एक अन्य सदस्य नंदिता नारायण कहती हैं, "शत-प्रतिशत शिक्षकों ने इस विरोध में हिस्सा लिया." नारायण ने दावा किया कि दिशा-निर्देशों की वजह से “शिक्षक बनने के इच्छुक छात्रों के प्रवेश पर असर पड़ेगा. इसके कारण छंटनी में बढ़ोतरी होगी, क्योंकि शिक्षकों की मांग में भारी कमी आएगी. छात्र-शिक्षक अनुपात प्रभावित होगा. शिक्षण क्षेत्र में नौकरी तलाशने वाले पीएचडी और एमफिल के छात्रों के अवसर कम होंगे."

एक अलग बयान में डूटा ने कहा, "ट्यूटोरियल्स को वैकल्पिक कर दिया गया है और दो प्रैक्टिकल क्लासेज को एक मान कर इनकी कीमत घटा दी गयी है. इससे छात्रों पर शिक्षक व्यक्तिगत रूप से कम ध्यान दे सकेंगे और इसकी वजह से मानकों में गिरावट आयेगी."

आभा कहती हैं, "कामकाजी घंटों में बढ़ोतरी का मतलब है शिक्षण की गुणवत्ता में गिरावट और शोध गतिविधियों को कम समय. इसके अलावा नयी नियुक्तियों और पदोन्नति में भी कमी आयेगी."

शिक्षकों से राय लिये बगैर इस तरह नये दिशा-निर्देश जारी कर देने पर यूजीसी की आलोचना करते हुए आभा कहती हैं, "मौजूदा सरकार बातचीत में यकीन नहीं करती." डूटा का कहना है कि शिक्षकों के कामकाज के घंटे बढ़ाने से शिक्षण और शोध की गुणवत्ता घटेगी.

यूजीसी ने 24 मई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि दिशा-निर्देशों को “चिंता का विषय नहीं मानना चाहिए” क्योंकि ये सुझाव थे, नियम नहीं. आभा कहती हैं, "विचित्र बात है. अगर ये सुझाव हैं, फिर भी यूजीसी की ओर से अनुदानित यूनीवर्सिटीज पर इनका असर पड़ेगा. ऐसे में डूटा कामकाजी घंटों से संबंधित दिशा-निर्देशों को हटाने की मांग करेगी."

अपने इस विरोध को विस्तार देने के लिए डूटा के प्रतिनिधि ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ यूनीवर्सिटी एंड कॉलेज टीचर्स ऑर्गेनाइजेशन और द फेडरेशन ऑफ सेंट्रल यूनीवर्सिटीज टीचर्स एसोसिएशन से मिलेंगे, ताकि “इन दिशा-निर्देशों को हटाने या संशोधित कराने की मांग के लिए आगे की रणनीति तय की जा सके.”

First published: 29 May 2016, 9:04 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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