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ब्रिटेन करेगा जाति पर चर्चा, भारतीय संसद अभी भी आंख मूंदे हुए है

दिलीप मंडल | Updated on: 5 September 2016, 7:45 IST

यह चर्चा कायदे से दक्षिण एशिया में होनी चाहिए. जाति की जन्मभूमि यही तो है. लेकिन यह चर्चा ब्रिटेन में होगी. ब्रिटेन सरकार के गवर्नमेंट इक्वलिटीज ऑफिस ने शुक्रवार यानी दो सितंबर को एक अधिसूचना जारी की है कि जाति और इक्वलिटीज एक्ट- 2010 पर जनता के बीच विचार-विमर्श चलाया जाएगा. ब्रिटेन की संसद पहले ही इस विषय पर चर्चा कर चुकी है.

इस चर्चा का मकसद यह जानना है कि ब्रिटेन के इक्वलिटीज एक्ट 2010 में क्या इस बात के समुचित प्रावधान हैं जिससे जाति उत्पीड़न के शिकार लोगों को न्याय मिल सके. साथ ही यह जानने की कोशिश होगी कि जाति से पीड़ित लोगों को न्यायिक संरक्षण देने के लिए और कौन से उपाय करने की जरूरत है.

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यह चर्चा पूरे 12 हफ्ते चलेगी और और सरकार इससे उभरे मुद्दों पर विचार करने के बाद ही कोई फैसला करेगी. इस चर्चा में व्यापक लोगों की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाएगी.

भारत में जाति पर ऐसी कोई भी आधिकारिक चर्चा आखिरी बार संविधान सभा की बैठक में हुई थी. वह भी इस सोच के तहत कि आधुनिक लोकतंत्र में जाति की समस्या शायद अपने आप खत्म हो जाएगी.

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भारत की संसद को जाति की समस्या पर चर्चा करनी चाहिए. यह देश की सबसे बड़ी पंचायत है

हालांकि संविधान सभा की आखिरी बैठक में दिए गए भाषण में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने आगाह किया था कि जाति की समस्या के रहते भारत कभी एक राष्ट्र नहीं बन पाएगा. इसलिए अपने भाषण में वे भारत को बनता हुआ राष्ट्र कहते हैं. उनके मुताबिक जाति व्यवस्था की बनावट ऐसी है कि हर जाति को दूसरी जाति से नफरत है. इसके होते हुए बंधुत्व की भावना का विकास नहीं हो सकता है और बंधुत्व के बिना राष्ट्र कैसे बन सकता है.

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भारत 26 जनवरी, 1950 को गणराज्य तो बन गया, लेकिन जाति की समस्या का अंत नहीं हुआ. संविधान ने छुआछूत पर पाबंदी लगा दी, लेकिन यह पूरी तरह कभी खत्म नहीं हुई. जातिवाद और जातिभेद कायम रहा. वैसे भी कोई कानून या दुनिया का श्रेष्ठ संविधान दो लोगों को भाईचारे के साथ रहने को मजबूर नहीं कर सकता. जाति को धार्मिक मान्यता होने के कारण ज्यादातर लोगों को यह अपराधबोध भी नहीं है कि जातिभेद करके वे कोई गलत काम कर रहे हैं.

भारत की संसद को जाति की समस्या पर चर्चा करनी चाहिए. यह देश की सबसे बड़ी पंचायत है. यहां हुई चर्चा से कोई रास्ता निकल सकता है. यहां चर्चा होने से लोग इस समस्या को गंभीरता से लेंगे.

यह चिंताजनक है कि जाति को लेकर भारतीय संसद में कभी कोई समेकित चर्चा नहीं हुई. आरक्षण पर बहस हुई है. जाति उत्पीड़न पर चर्चा हुई है. लेकिन जाति को एक समस्या मानकर उसके उन्मूलन पर कभी कोई बात नहीं हुई है. सांसद शरद यादव इसकी मांग कर रहे हैं. मोदी सरकार को उनकी यह मांग मान लेनी चाहिए. संसद का एक विशेष सत्र बुलाकर इस बारे में बात होनी चाहिए कि जाति की समस्या से मुक्ति का रास्ता क्या हो.

ब्रिटेन ने जाति पर सार्वजनिक देशव्यापी चर्चा की शुरुआत करके रास्ता दिखाया है. आंख बंद करके यह मान लेने से कि जाति अपने आप खत्म हो जाएगी, कोई फायदा नहीं है. जाति को जाना होता तो चली जाती. जाति जा नहीं रही है. उसे खत्म करने की कार्ययोजना बनानी होगी.

देखें ब्रिटिश सरकार का नोटिफिकेशन.

First published: 5 September 2016, 7:45 IST
 
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