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संयुक्त राष्ट्र: भारत में 5.86 करोड़ परिवारों के पास घर नहीं है

चारू कार्तिकेय | Updated on: 5 March 2017, 21:34 IST

संयुक्त राष्ट्र ने अपने एक अध्ययन में बताया है कि भारत में आवास की काफी गंभीर समस्या है. सरकारें भी मानती रही हैं कि यहां लाखों लोग बेघर हैं, फिर भी उनके लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए. यूएन की रिपोर्ट ने इस संबंध में राष्ट्रीय कानून लाने की सख्ती से सिफारिश की है, ‘जिसमें किसी भी आधार पर भेदभाव किए बिना पर्याप्त आवास के अधिकार को स्पष्ट मान्यता दी जाए.’

यूएन के खास प्रतिवेदक ने कहा कि देश में 5.86 करोड़ परिवारों के पास पर्याप्त आवास नहीं है और उसके लिए दीर्घावधि योजना आवश्यक है. उन्होंने इस बात पर खासतौर से जोर दिया कि अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, बेघर, मुसलमान और मैला ढोने वालों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है क्योंकि उनके पास घर नहीं है.

यूएन की रिपोर्ट

प्रतिवेदक लीलानी फरहा केंद्र सरकार के आमंत्रण पर अप्रेल 2016 में भारत आई थीं. फरहा ने नई दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू, और इन शहरों से सटे परिनगरीय और ग्रामीण इलाकों का दौरा किया. नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट ने कहा कि इस संख्या (58.6 मिलियन परिवार) के मायने यह है कि घर की आवश्यकता दोगुनी बढ़ गई है. 1991 में यह संख्या 23.90 मिलियन थी.

यह तो तब है जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 में (चमेली सिंह बनाम यूपी मामला) इस बात पर जोर दिया था कि आवास के अधिकार को सभी अधिकारों से ज्यादा अहमियत दी जाए.

अन्य चिंताएं

गौरतलब है कि फरहा ने एनडीए सरकार की ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ का भी मूल्यांकन किया और पाया कि इससे कई समस्याएं पैदा हुई हैं. उनमें संभवत: सबसे अहम समस्या यह है कि इससे केवल एक सामाजिक-आर्थिक वर्ग की जरूरतें पूरी होंगी और अन्य लाखों लोगों की दशा अनदेखी रहेगी. इसके अलावा इससे लाखों बेघर लोगों की समस्या का समाधान नहीं होगा. और उन लाखों लोगों की भी, जो ‘अनौपचारिक बस्तियों’ में रहते हैं. देश में लगभग 13.75 मिलियन परिवार शहरी ‘अनौपचारिक बस्तियों’ में रहते हैं.

दरअसल चैन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई जैसे शहरों में 50 फीसदी परिवार अनौपचारिक बस्तियों में रहते हैं. बेघर लोगों के परिवारों की संख्या 1.8 मिलियन है, हालांकि कई लोगों का मानना है कि यह संख्या 3 मिलियन के करीब है. ग्रामीण क्षेत्रों में 13 फीसदी परिवार ‘एक कमरे के अस्थाई घरों में रहते हैं, जो बहुत ही हल्के सामान से बने होते हैं, जिसमें वेंटिलेशन या साफ-सफाई नहीं है, और जो हवा, धूल, बरसात से सुरक्षा नहीं करते.’

योजना में मकान के स्वामित्व पर जोर दिया गया है. समस्या यह है कि गांवों में घर के स्वामित्व और किराए के मकान या जमीन पर सीमित अधिकार जैसे स्वामित्व के अन्य विकल्पों को खारिज कर दिया गया है. अनौपचारिक बस्तियों में रहने वालों की योजना तक पहुंच नहीं है. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे उधार सब्सिडी ले सकते हैं.

अन्य सिफारिशें

  • आवासहीनता को प्राथमिक मानवाधिकार माना जाए और समस्या को 2030 तक खत्म किया जाए. इसके लिए सतत विकास लक्ष्यों के लिए 11.1 का लक्ष्य रखा जाए.
  • जबरर्दस्ती निकालने और घरों को ढहाने पर राष्ट्रीय रोक लगाई जाए.
  • सभी मौजूदा अनौपचारिक बस्तियों का सर्वे किया जाए और उन्हें कानूनी मान्यता दी जाए.
  • प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों के लिए उचित क्षतिपूर्ति या पुनर्वास और /या वैकल्पिक आवास समय पर सुनिश्चित किए जाएं.
  • किसी भी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ होने वाले भेदभाव पर रोक के लिए कानून बनाए जाएं.
  • अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले सभी लोगों के लिए .‘सभी के लिए आवास’ योजना तक पहुंच सुनिश्चित की जाए. जिनकी योजना तक पहुंच नहीं है, उन्हें अग्रिम भुगतान देकर सहयोग किया जाए.
  • पर्याप्त आवास का अधिकार सुनिश्चित किया जाए और रियल एस्टेट बाजार में दाम बढऩे की आशंका हो, तो उस पर नियंत्रण किया जाए, यह सुनिश्चित करते हुए कि घरों के निर्माण के लिए जमीन उसी मकसद से तुरंत इस्तेमाल की जाएगी, जिसके लिए अधिगृहीत की गई है.
  • 2013 के भूमि अधिगृहण अधिनियम के राष्ट्रीय अधिकार को संसद में लाया जाए ताकि गरीब, बेघर और शहरी इलाकों में जिनके पास जमीन नहीं है, उन्हें जमीन दी जा सके.
  • निजी संस्थाओं को विनियमित किया जाए और यह सुनिश्चित करने के उपाय किए जाएं कि उन्हें मॉनिटर किया गया है और जिम्मेदार ठहराया गया है.
  • जिस तरह से रोटी के अधिकार के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त नियुक्त किए गए हैं, आवास के अधिकार के लिए भी नियुक्त किए जाएं, ताकि आवास के अधिकार को मॉनिटर करना, उसमें सुधार करना और लागू करना सुनिश्चित किया जा सके.
First published: 6 March 2017, 8:26 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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