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क्या उना के दलित आंदोलन से गुजरात कांग्रेस फायदा उठा सकेगी?

रथिन दास | Updated on: 7 February 2017, 8:20 IST

हाल में प्रधानमंत्री ने खुद को गोरक्षक बताने वालों को समाज-विरोधी तत्व कहा है. साफ जाहिर है कि उना में 11 जुलाई को दलितों की पिटाई के वायरल हुए वीडियो को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया हो रही है, उसने गुजरात और केंद्र, दोनों जगह बीजेपी सरकार को परेशान कर दिया है. 

लेकिन बीजेपी से ज्यादा इस घटना ने कांग्रेस की प्रतिक्रिया को तेजी दी है. प्रदेश कांग्रेस सहसा एक दशक लंबी नींद से जाग उठा है.

दलितों की पिटाई के विरोध में उठे स्वाभाविक आंदोलन से बाहर रखी गई प्रदेश कांग्रेस आंदोलन में शामिल होना चाहती थी और वह इस संबंध में अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ याचिका लेकर राष्ट्रपति के पास गई. कांग्रेस को और अपमानित करनेे के लिए सत्तासीन बीजेपी की साइबर सेना ने सोशल मीडिया पर उनके इस कदम का उपहास उड़ाया कि वह एक 'स्थानीय' मुद्दे के लिए राष्ट्रपति के पास गई है.

यह सच है कि कांग्रेसी उना प्रकरण से अचानक से सक्रिय हुए हैं, पर यह कहना बहुत जल्दी होगा कि दलितों के कटु अनुभवों से पार्टी को गुजरात में अपनी दो दशक लंबी निष्क्रियता से बाहर निकलने में मदद मिलेगी.

गुजरात में कांग्रेस दलित अत्याचार के मुद्दे को भुनाने में व्यावहारिक रूप से विफल रही. इसी तरह पिछले साल सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षण संस्थाओं में कोटे की मांग को लेकर पटेल के आंदोलन से भी उन्हें कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला. यहां तक कि पटेलों के मुद्दे को कांग्रेस द्वारा समर्थन देने के मसले को भी पटेल समुदाय ने ठुकरा दिया जिसके बीते तीन दशकों से सत्तासीन बीजेपी के साथ संबंध रहे हैं.

तीन दशक से भाजपा के साथ जुड़े रहे पटेल वोटबैंक का फिलहाल बीजेपी से बढ़ते टकराव के बावजूद अनुमान लगाया जा रहा है कि वह कांग्रेस की झोली में नहीं जाएगा. चुनावी अखाड़े में आम आदमी पार्टी के आगमन से कांग्रेस के समीकरण प्रभावित हुए हैं. क्योंकि त्रिकोणीय चुनाव से अंतत: बीजेपी को ही लाभ मिलेगा.

हालांकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बहुप्रचारित उना के मोटा समढियाला गांव के दौरे को मीडिया में बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया, पर गुजरात की प्रमुख विपक्ष पार्टी इससे कोई भी राजनीतिक लाभ नहीं उठाती दिख रही है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उसके पास कोई भी दलित नेता नहीं है, जिसे दमित समुदाय के उद्धारक के रूप में प्रस्तुत किया जा सके.

कांग्रेस नेताओं में से कोई भी संतोषजनक दलित चेहरा नहीं होने से, खाली जगह पर अपेक्षाकृत एक नया चेहरा 35 वर्षीय जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में उना दलित अत्याचार लड़ात समिति के सहज उदय ने तुरंत कब्जा कर लिया.

दलित मुद्दे पर कांग्रेस का दिवालियापन भी सामने आ गया क्योंकि पार्टी को उन लोगों को भोजन के पैकेट और रैन बसेरे देकर संतोष करना पड़ा जो 31जुलाई को अहमदाबाद में अपने 'महासम्मेलन' के बाद दस दिन तक 350 किमी की यात्रा करके उना गए थे. मूलत: एक ऐसा सामाजिक कार्य जिसे गांव के लोग या स्वैच्छिक संगठन भी दलित के मुद्दे को सहयोग करने के लिए कर सकते हैं.

एक सदी से भी ज्यादा पुरानी पार्टी को मार्च करने वालों में शामिल होने से हाल में बनी विरोध समिति के आयोजकों ने रोक दिया था. वे अपनी निजी क्षमताओं और सामर्थ्य के साथ, बिना कांग्रेस के झंडे, के ही वहां खड़े हो गए थे. 

वातानुकूलित कारों और दूसरी एसयूवी कारों में यात्रा करने के आदी कांग्रेसी नेताओं में से किसी की भी उना तक अपनी पहचान के बिना दलितों और आमतौर पर लेफ्ट-ऑफ-सेंटर सक्रियतावादियों के साथ कंधा मिलाकर जाने में दिलचस्पी नहीं थी.

उना मार्च के रास्ते में कांग्रेस को झिड़की मिलने के बावजूद उनके कुछ दलित नेता स्वतंत्रता दिवस पर झंडारोहण के स्थान पर पहुंचे. सूत्रों के मुताबिक मार्च करने वालों में कम से कम एक कांग्रेसी नेता ने जबरदस्ती मंच पर चढ़ने की कोशिश की और मोटा समढियाला गांव के दलितों की पिटाई के विरोध में इकट्ठा हुई भीड़ को संबोधित करना चाहा.

दलितों की पिटाई से भड़के आंदोलन से किसी भी तरह का राजनीतिक लाभ उठाने से कांग्रेस वंचित रह गई क्योंकि लोगों ने उसे इसमें हिस्सा लेने का कड़ा विरोध किया. इस आंदोलन का हिस्सा बनकर कांग्रेस अगले साल विधानसभा चुनावों में बीजेपी के मुकाबले मजबूत स्थिति में आ सकती थी.

गुजरात में 1995 से सत्ता से बाहर प्रदेश कांग्रेस ने हमेशा के लिए विपक्ष में बैठने की अपनी तकदीर से लगभग समझौता कर लिया है, खासकर जब से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी लगातार तीन बार 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में जीती है.

इसके अलावा, 2014 में राष्ट्रव्यापी मोदी लहर के साथ गुजरात कांग्रेस ने सत्ता में लौटने की लगभग सारी उम्मीदें छोड़ दीं. पर उना दलितों पर हुए अत्याचार के मुद्दे से पैदा हुई राष्ट्रव्यापी नाराजगी से कांग्रेस की गुजरात ईकाई में उम्मीद की नन्हीं किरण नजर आई है.

यह आवश्यक नहीं कि उम्मीद की यह नन्हीं किरण 2017 के चुनावों में कांग्रेस की जीत में बदल जाय. इसके पहले पार्टी को विरोध, दलबंदी, टिकट वितरण को लेकर कशमकश और अंतत: मतदान से मात्र तीन दिन पहले उम्मीदवारों की एकमुश्त खरीद जैसी कई बाधाएं पार करनी हैं. 

ऐसा भी हो सकता है कि कांग्रेस हाथ मलती रह जाए और उसे एक बार फिर अपने घाव सहलाने पड़ जाएं. 

First published: 25 August 2016, 7:51 IST
 
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