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उनाकांड के दलित: तब गौरक्षकों ने पीटा था, अब यूपी में आरएसएस के प्रचारक हैं

सुहास मुंशी | Updated on: 15 October 2016, 4:36 IST
(सजाद मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL

  • गुजरात के उना में गौरक्षकों की पिटाई के शिकार दलित शुक्रवार से उत्तर प्रदेश में रथ यात्रा पर हैं. इन दलितों को आरएसएस से जुड़ा \'भारतीय बौद्ध संघ\' उत्तर प्रदेश के सभी 75 ज़िलों में घुमाएगा.
  • उनाकांड में कुल चार दलितों के साथ हिंसा हुई थी लेकिन एक पीड़ित वेशराम अभी चोट से उबर नहीं पाए हैं, इसलिए वह इस रथ यात्रा में शामिल नहीं हुए हैं। 

गुजरात के उना में 11 जुलाई को कुछ गौरक्षकों ने चार दलितों को बुरी तरह पीटा था. गौरक्षक और तमाशबीनों ने पिटते हुए दलितों की फिल्म बनाई थी. कैच न्यूज़ से बातचीत में इन दलितों ने कहा है कि अभी ना तो उनके ज़ख्म भरे हैं और ना ही वे उस डरावने हमले को भूल पाए हैं. 

कैच अपनी रिपोर्ट में पहले ही बता चुका था कि उनाकांड के पीड़ितों के साथ आरएसएस समर्थित संगठन उत्तर प्रदेश में रथ यात्रा निकालने वाला है. 'दलित चेतना धम्म वाहन यात्रा' के नाम से उत्तर प्रदेश में इसकी शुरुआत हो गई है. 

आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ख़ुद इसपर नज़र बनाए हुए हैं. रथ यात्रा को हरी झंडी शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान, कृष्ण राज, रामदास अठावले, राज्य मंत्री अर्जुन मेघवाल और वरिष्ठ भाजपा नेता सत्यनारायण ने दिल्ली में दिखाई. 

11 जुलाई को दलितों के साथ हुई हिंसा पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. इसी कांड से दलितों के युवा नेता जिग्नेश मेवानी राष्ट्रीय फलक़ पर उभर कर आए. मेवानी ने राज्यभर में दौराकर दलितों और पिछड़ों से अपील की कि वे मरे हुए जानवरों को नहीं उठाएं. 

मगर आरएसएस और बीजेपी ने अब उन्हीं दलितों को अपने पाले में कर लिया है. इनके साथ निकली रथयात्रा गाज़ियाबाद, मेरठ, बाग़पत, सहारनपुर और हापुड़ जैसे ज़िलों से होते हुए आगे बढ़ेगी. 

उनाकांड के शिकार अशोक सरवाया, बेचर सरवाया और रमेश सरवाया भारतीय बौद्ध संघ की इस यात्रा पर क्या सोचते हैं? उनकी आगे की योजना क्या है? कैच ने उनसे एक्सक्लूसिव बातचीत कर इसे समझने की कोशिश की है.

एक पहलू यह भी है कि उनाकांड के पीड़ित भारतीय बौद्ध संघ की भाषा में अपनी बातचीत रख रहे हैं. मुमकिन है कि संघ ने पीड़ितों को अपने  कब्ज़े में कर रखा हो जिसे वे ज़ाहिर नहीं कर पा रहे हैं. चोटिल होने के नाते वेशराम सरवाया की जगह उनके भाई कांति इस यात्रा में शामिल हैं. 

हमारे गुरु जहां कहेंगे, हम वहां जाएंगे

सुहास मुंशी: आपकी पिटाई गौरक्षकों ने की. फिर भी आप उस संगठन के साथ हैं जिन्होंने गौरक्षकों को संरक्षण दे रखा है?

कांति सरवाया: हम किसी पार्टी या संगठन से नहीं हैं. हम उनाकांड और दलितों पर होने वाले लगातार उत्पीड़न के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं. यह एक बड़ा मुद्दा है. हमें पीटने वाले बीजेपी नहीं, शिवसेना के कार्यकर्ता थे. 

सुहास मुंशी: आपको कैसे पता?

कांति सरवाया: उनकी कारों और मोटरसाइकल पर शेर के निशान थे.

सुहास मुंशी: मगर क्या भारतीय बौद्ध संघ आरएसएस से जुड़ा संगठन नहीं है?

कांति सरवाया: मैं फ़िर दोहरा रहा हूं कि हम यहां एक बड़े सवाल के लिए एकजुट हैं. इस बारे में हम और बात नहीं करना चाहते. 

सुहास मुंशी: आप दिल्ली क्यों आए हैं. किसने कहा यहां आने को?

कांति सरवाया: हमारे गुरु राहुल संघप्रिय भारतीय बौद्ध संघ चलाते हैं. उन्होंने ही यहां आने के लिए कहा. वो जहां कहेंगे, हम वहां जाएंगे.

ज़ख़्म के निशान अभी भी ताज़े

सुहास मुंशी: क्या आपने उनाकांड हिंसा का वीडियो देखा है?

कांति सरवाया: नहीं. उसे देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हम. कुछ फोटो ज़रूर देखी हैं लेकिन उन्हें हम दोबारा नहीं देख सकते. उन तस्वीरों को देखकर हमारी हालत रोने जैसी हो जाती है. घर में कुछ लोगों के पास उना के वीडियो हैं. उन्हें देखकर घरवाले हर दिन रोते हैं.  

सुहास मुंशी: आपके ज़ख्म भर गए?

अशोक सरवाया: नहीं. अभी हम काम करने की हालत में नहीं हैं. उठने, बैठने या किसी तरह का भार उठाने में मुश्किल होती है. उन्होंने हमारे सीने और सिर पर बहुत बुरी तरह मारा था. दर्द अभी भी होता है. हम कोई काम नहीं कर पाते. ज़ख्म के निशान नहीं मिटे हैं, तीन महीना गुज़र जाने के बावजूद. 

अब हम चमड़ा नहीं उतारेंगे

सुहास मुंशी: क्या मानसिक तौर पर उबर गए हैं? उस वारदात की यादें अभी भी डराती हैं?

अशोक सरवाया: आज भी सभी रात में उठकर हम 'बचाओ बचाओ' चिल्लाते हैं. बहुत मुश्किल है रात काट पाना. आंख बंद करते ही उस दिन की डरावनी यादें ताज़ा हो जाती हैं. हम ढंग से सो नहीं पाते. 

सुहास मुंशी: उनाकांड के बाद गुजरात में एक आंदोलन हुआ था. जिग्नेश जैसे युवा नेता ने दलितों-पिछड़ों को एकजुट कर मरे जानवरों का चमड़ा नहीं उतारने की अपील की थी. क्या आपने ये सब सुना है?

रमेश सरवाया: सुना ज़रूर है लेकिन जिग्नेश से मिले नहीं हैं. उनके आंदोलन को हमारा समर्थन है. हमने भी अब मरे जानवरों का चमड़ा नहीं उतारने का फ़ैसला किया है. मैं और मेरा परिवार इस पेशे को छोड़ चुके हैं. 

सुहास मुंशी: क्या आपके दोस्तों ने भी जानवरों का चमड़ा नहीं उतारने का फ़ैसला किया है? वैसे अब आप क्या करेंगे?

रमेश सरवाया: फ़िलहाल हमारे पास कोई काम नहीं है. सरकार को काम मुहैया करवाना चाहिए. अब हम ये सब नहीं करना चाहते और ना ही हमारे दोस्त इसे अपनाना चाहते हैं. 

गुजरात में दलितों के हालात बदतर

सुहास मुंशी: मरे जानवरों की खाल उतारना एक अपमानजनक काम है जिसे ख़ासतौर पर दलितों को करना पड़ता है. आपको लगता है कि आप या आपकी आने वाली पीढ़ी को निजात मिल जाएगी? 

बेचर सरवाया: इतना आसान नहीं है ऐसा हो पाना. पूरी व्यवस्था दलितों के ख़िलाफ़ रची गई है. हम ज़मीनें अपनी पसंद के मुताबिक नहीं ख़रीद सकते. हर गांव में दलित हमेशा किनारे पर रहते हैं. हमारे खाने और मिलने-जुलने पर पाबंदी है. 

अगर कोई आज़ादी के साथ काम करना चाहता है तो इन पाबंदियों के साथ संभव नहीं है. इसी व्यवस्था का नतीजा है कि ज़मीनों और खेतों से खदेड़कर हमें बंजर ज़मीन की तरफ़ धकेल दिया गया है. 

गुजरात में हालात अन्य राज्यों से अलग हैं. पाटीदारों को हमारे दिख जाने या छू जाने से कोई समस्या नहीं है लेकिन वे बिल्कुल नहीं चाहते कि हम आर्थिक रूप से मज़बूत बनें. फिर राजपूत हैं जो हमारी सूरत भी नहीं देखना चाहते. 

गुजरात में यह हमारी हर दिन की ज़िंदगी है. जड़ें इतनी मज़बूत हैं कि व्यवस्था इसी तरह चलती रहेगी. हो सकता है कि हममें से कुछ लोग ये काम नहीं करें लेकिन ज़्यादातर की जिंदगी इसी पेशे पर टिकी है. वो मरे जानवरों का चमड़ा उतारते रहेंगे.

11 जुलाई 2016, उना

सुहास मुंशी: 11 जुलाई को क्या हुआ था?

रमेश सरवाया: हमारा गांव गिर के जंगलों से घिरा हुआ है. यहां अक्सर शेर और दूसरे जानवर जंगलों से आकर गांव के फार्म पर हमला कर देते हैं. मरे जानवरों से बदबू आने के नाते हर कोई उन्हें हटाना चाहता है. ऐसे में हमें फ़ोन करके जानवरों की लोकेशन बताई जाती है. उस दिन भी हमें बेदिया गांव से फोन आया था. इसके बाद एक बैल और फिर एक गाय की खाल उतारने की सूचना दी गई. 

11 जुलाई को अशोक और वशराम गाय की खाल उतार रहे थे. मैं बेचर के साथ दूसरी मरी गाय खींचने चला गया था. तभी 10-12 बाइक सवार वहां आए. उन्होंने सीधे यही पूछा कि हमने गाय को क्यों मारा? वे गौरक्षक थे. 

हम सभी ने बार-बार कहा कि हमने गाय नहीं मारी है. हमारा काम मरी गायों की खाल उतारना है. मगर उन्हें हमारी बात नहीं समझ आई. उन्होंने कहा कि तुम सब गायों को मारकर मुसलमानों को खिलाते हो. इसके बाद गौरक्षकों ने फ़ोन कर अपने कुछ और साथियों को बुलाया, और हमारी पिटाई शुरू हो गई. 

क्या मुसलमान पैदा किए हैं?

उन्होंने कपड़े उतारने को कहा. हम गिड़गिड़ाते रहे कि हमारी पैंट मत उतारो. अंदर हमने कुछ नहीं पहना है. तब तक मशराम की मां और पिता भी आ गए थे. गौरक्षकों ने उन्हें भी मारा. उन्होंने हमारी मां-पिता पर तंज़ कसते हुए कहा, 'तुमने मुसलमान पैदा किए हैं'.

फिर बेदिया गांव के उप सरपंच भी वहां पहुंचे. उन्होंने भी कहा, 'ये लोग ज़िंदा गाय मारते हैं. इनके हाथ-पैर काट दो. यह सुनकर लगा कि आज हम ज़िंदा नहीं बचेंगे.'

इसके बाद गौरक्षकों ने हमें कार के पीछे बांधा और उना की तरफ़ चल दिए. रास्ते में पुलिस की एक जिप्सी देखकर उन्होंने कार रोकी. फिर पुलिस और गौरक्षक हाथ मिलाकर आगे बढ़ गए. हम पुलिसवालों से मदद के लिए गिड़गिड़ाते रहे. लेकिन उन्होंने जवाब में गौरक्षकों से कहा, 'आप इन्हें उना लेकर जाओ, हम मौक़े की तरफ जा रहे हैं.'

उना पहुंचने से पहले एक बस स्टैंड के पास हमारे कपड़े उतारे गए. फिर हाथ बांधकर कार के पीछे खड़ा कर दिया गया और पिटाई शुरू हो गई. उना में घुसते ही हम वाडला पुलिस पोस्ट से भी गुज़रे थे लेकिन पुलिस ने हमारी तरफ़ से मुंह फ़ेर लिया. हां, गौरक्षकों को देखकर उनका अभिवादन ज़रूर किया था. 

उना पहुंचने तक वशराम की हालत ख़राब हो गई थी. लगातार पिटाई और अपमान ने उसे तोड़ दिया था. हम पिट रहे थे और भीड़ हंसते हुए फिल्म बना रही थी. गौरक्षक हमें हर चौक पर रोकते, पीटते और घसीटते हुए आगे बढ़ जाते. हमारे हाथ बंधे हुए थे और कार से बंधी एक रस्सी हम सभी को खींच रही थी. 

उन्होंने हमें बाबा साहेब की एक बड़ी मूर्ति के पास ले जाकर भी ख़ूब पीटा. अपनी ताक़त का एहसास कराने के लिए वे हम चारों को नज़दीक के पुलिस स्टेशन ले गए और वहां ज़मीन पर गिराकर मारा.

एक महिला कांस्टेबल ने मेरी मां को बताया कि पुलिस ने बेदिया गांव में भी कई दलितों की पिटाई की है. उसने कहा, 'तुम लोग क्यों तूफ़ान खड़ा करते हो?'

हमलावर अभी भी तलवार रखते हैं

सुहास मुंशी: आप हमलावरों को पहचानते हैं?

बेचर सरवाया: जी हां. बिल्कुल इसी तरह की घटना हमारे गांव के करीब राजलौना और मंडोनो में भी हो चुकी है. अहमदाबाद में इन्होंने एक मुसलमान को गोहत्या के आरोप में मार डाला है.

सुहास मुंशी: कभी आपने हमलावरों या उनके परिवार से मिलने की कोशिश की?

रमेश सरवाया: हम उनसे मिले नहीं लेकिन उनके परिवार के सदस्यों को रोज़ देखते हैं. वे हमेशा गर्व से रैलियां निकालते हैं और तलवार साथ रखते हैं. हमने पुलिस से भी शिकायत की लेकिन वे हमारी तरफ़ ध्यान नहीं देते. हम लगातार डर के माहौल में जीते हैं. उन सड़कों पर नहीं जाते जिनसे एक बार गुज़र चुके होते हैं. 

First published: 15 October 2016, 4:36 IST
 
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