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यूपी में कानून व्यवस्था की नाकामी और पुलिस विभाग का राजनीतिकरण

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 August 2016, 13:47 IST

कुछ ही दिन पहले उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी समाजवादी पार्टी में कौमी एकता दल के विलय के साथ एक बड़ा बवाल खड़ा हुआ था. विलय बाद में रद्द घोषित कर दिया गया. हालांकि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से मेलजोल मौजूदा राजनीति में सभी दलों का सच है लेकिन उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी इसके लिए कुछ ज्यादा ही बदनाम रही है.

उत्तर प्रदेश को लेकर कोई भी बहस कानून व्यवस्था की स्थिति और अपराध नियंत्रण पर आकर अटक जाती है. पुलिस की नाकामयाबी और उसका राजनीतिकरण हावी हो जाता है. बुलंदशहर में एनएच 91 पर हुई गैंगरेप की घटना ने एक बार फिर से उस बहस को नए सिरे से शुरू कर दिया है.

बुलंदशहर में रात के एक बजे एक परिवार नोएडा से शाहजहांपुर जा रहा था. पांच-छह लोगों के समूह ने उनकी गाड़ी को रोका. गाड़ी में मौजूद पुरुषों को कब्जे में लेकर बंधक बना लिया. इसके बाद उन्होंने एक महिला और एक नाबालिग बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया. ढाई घंटे तक हाइवे के किनारे यह वहशियाना हरकत होती रही.

प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस घटना पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए बुलंदशहर के एसएसपी वैभव कृष्ण सहित मामले की जांच से संबंधित सभी अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है. मुख्यमंत्री ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक को आदेश देकर जांच की प्रगति पर सीधा निगरानी करने को कहा है.

राज्य के पुलिस महानिदेशक जाविद अहमद ने घटना को बेहद शर्मनाक बताते हुए कहा कि दोषियों को हर हालत में एक-दो दिन के भीतर जेल में डाल दिया जाएगा.

बेकाबू अपराध

सूबे में बेकाबू अपराध के मुद्दे पर राज्य सरकार और सत्तारूढ़ सपा हमेशा एक अलग सुर पकड़ लेते हैं. वे अपनी उपलब्धियां गिनाने में लग जाते हैं. उनकी जुबान पर अपराध नियंत्रण के लिए बनी 1090 वुमेन हेल्पलाइन, आधुनिक पुलिस कंट्रोल रूम, डायल 100 जैसे सरकारी कार्यक्रम टेपरिकॉर्डर की तरह बजने लगते हैं.  इन सरकारी सुविधाओं से अलग जो असल मर्ज है वह प्रदेश की पुलिस तंत्र से जुड़ी है. उसका इस हद तक राजनीतिकरण हो चुका है कि वह किसी भी मामले में ईमानदारी से फैसला कर ही नहीं पाती.

उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का सच क्या है? वर्ष 2012 में जब अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी तभी यह दिखने लगा था कि सपा के कार्यकर्ता अपनी सरकार बनने के बाद जोश में हैं. इस जोश में उन्होंने तमाम वाजिब-गैरवाजिब उम्मीदें भी पाल ली थी. शुरुआत में तो अखिलेश के कड़े रुख के कारण उनकी उम्मीदों पर लगाम लगी रही, लेकिन समय बीता, मुख्यमंत्री की प्राथमिकताएं बदली कानून व्यवस्था का मसला उनके हाथ से निकलता गया.

स्थानीय सपा नेताओं की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती रहीं. जल्द ही पुलिस में ट्रांसफर, प्रमोशन और मनचाही नियुक्तियों का धंधा फिर से शुरू हो गया. गौरतलब है कि अखिलेश यादव के शुरुआती कार्यकाल में इस पर काफी हद तक रोक लगी रही थी. शास्त्री भवन स्थित पंचम तल जहां मुख्यमंत्री का दफ्तर है उसके आस-पास के दफ्तरों में बाकायदा पर्चे चिपका दिए गए थे कि ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए संपर्क न करें.

दरअसल सपा के नेता ट्रांसफर पोस्टिंग को वैकल्पिक धंधे के रूप में इस्तेमाल करते थे. लेकिन बाद के दौर में यह सिलसिला फिर से शुरू हो गया. सरकार के आखिरी समय में हर कार्यकर्ता कुछ न कुछ कर लेना चाहता है. ऐसे में पुलिस विभाग भी अछूता नहीं रहा.

पुलिस में ट्रांसफर, प्रमोशन और मनचाही नियुक्तियों का धंधा फिर से शुरू हो गया है, सपा नेता इसमें आगे हैं

सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोगों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने पर तबादला करना, जातीय आधार पर अधिकारियों के तबादले आदि इस दौरान हमेशा सुर्खियां बटोरते रहे. इसी दौरान प्रदेश के लगभग हर हिस्से में कई आपराधिक वारदातें हुईं. प्रदेश के नेताओं, विधायकों और मंत्रियों पर जातीय और धार्मिक आधार पर नियुक्ति देने के आरोप लगता ही रहा.

मुख्यमंत्री की तमाम योजनाएं जो आधुनिकीकरण से जुड़ीं थी वे अब तक औंधे मुंह गिर चुकी हैं. सीसीटीवी कैमरे खराब पड़े हैं, अधिकतर थानों पर पुलिस वाले रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करते हैं या शिकायत करने वालों को ही प्रताड़ित करते नजर आते हैं. जब तक ऐसा रवैया नहीं बदलता, पुलिस बल के आधुनिकीकरण का कोई अर्थ नहीं है.

मुख्यमंत्री बनने से पहले अखिलेश यादव ने बाहुबली डीपी यादव को सपा में शामिल होने रोक कर जो प्रतिष्ठा बटोरी थी वह हाल ही में मुख्तार अंसारी और उनके दो भाइयों की पार्टी कौमी एकता दल को सपा में विलय करवाने के निर्णय से तार-तार हो गया. हालांकि पार्टी ने इसे बाद में रद्द कर अपनी प्रतिष्ठा को बचाने की कोशिश की.

मुख्तार अंसारी का आपराधिक इतिहास किसी से छिपा नहीं है और स्वयं मुख्तार जेल में हैं. इससे सपा की अपराधियों के प्रति हमदर्दी वाली छवि और पुख्ता हुई.

बढ़ते अपराध पर प्रदेश की दोनों प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी और बसपा उस पर हमलावर रुख अपना रहे हैं. मायावती सपा के शासन में कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहीं हैं, लेकिन अभी भी उनका उद्देश्य भाजपा को ही निशाना बनाना है. उनका विरोध राजनीतिक ज्यादा है. लिहाजा लोगों में भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा.

जाति, धर्म और क्षेत्र के मुद्दों पर बुरी तरह बंटे इस प्रदेश की पुलिस भी इन्ही आधारों पर बंटी हुई है. युवा सोच, युवा नेतृत्व और प्रदेश को संवारने के दावों के साथ पुलिस को रवैया बदलने का संदेश देना भी जरूरी है.

अखिलेश फिर से कठोर

शनिवार को बुलंदशहर के पास बंधक बनाकर मां-बेटी से गैंगरेप के मामले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सख्ती बरतते हुए दोषियों को गिरफ्तार करने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है. उन्होंने कहा कि गुनाहगारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए.

इस मामले के खुलासे के लिए अब सरकार ने एसटीएफ की एक टीम लगा दी है. अब तक 15 संदिग्ध व्यक्तियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है. एसएसपी स्वयं पूछताछ कर रहे हैं. मेरठ और पड़ोसी जिलों में पुलिस टीमें लगा दी गई हैं.

कैसे हुई घटना

शाहजहांपुर के मूल निवासी दो सगे भाई नोएडा के सैक्टर 68 में रहते हैं. शुक्रवार देर रात ये दोनों अपनी पत्नियों, बेटी और बेटे के साथ नोएडा से शाहजहांपुर के लिए चले थे.

करीब 12 बजे एनएच-91 पर बुलंदशहर कोतवाली देहात क्षेत्र में दोस्तपुर गांव के निकट कार में किसी चीज के टकराने की आवाज आई. इन्होंने कार रोकी. कार के रुकते ही इनकी गाड़ी के आगे कार रुकी जिसमें से करीब 6-7 बदमाशों ने उतरकर हथियारों के बल पर पूरे परिवार को बंधक बना लिया.

बदमाश कार को हाईवे पर बने एक कट से दूसरी तरफ दोस्तपुर गांव के कच्चे रास्ते पर ले गए. दोनों भाई, एक भाई की पत्नी और एक भाई के जवान पुत्र को एक खेत में बंधक बना लिया जबकि दूसरे भाई की पत्नी और उसकी 15 वर्षीय पुत्री से गैंगरेप किया गया. सुबह करीब चार बजे बदमाश इन सभी से नगदी और जेवरात लूटकर मौके से फरार हो गए.

पीड़ितों ने ही कंट्रोल रूम पर घटना की सूचना पुलिस को दी. आनन-फानन में एसएसपी वैभव कृष्ण मौके पर पहुंचे. पीड़ित मां-बेटी को मेडिकल परीक्षण के लिए जिला महिला अस्पताल भेजा गया. बदमाशों की तलाश में कांबिंग भी कराई गई. हाईवे पर गैंगरेप की सूचना पर मेरठ रेंज की डीजाईजी लक्ष्मी सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गई.

First published: 1 August 2016, 13:47 IST
 
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