Home » इंडिया » Unified pro-Azaadi camp passes 10-point resolution to fight PDP-BJP coalition
 

जम्मू कश्मीर: आजादी समर्थक गठबंधन का पीडीपी-भाजपा गठबंधन के खिलाफ जंग का ऐलान

गौहर गिलानी | Updated on: 7 July 2016, 7:45 IST

जम्मू-कश्मीर में आजादी समर्थक कैम्प ने पीडीपी-भाजपा गठबंधन के खिलाफ दस सूत्री प्रस्ताव पारित किया है. इसे आॅल पार्टी हुर्रियत काॅन्फ्रेंस (एपीएचसी) और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएपफ) समेत राज्य में हजारों लोगों का समर्थन मिला है.

कश्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार द्वारा मार्च 2015 से कुछ नेताओं की गतिविधियों और आंदोलनों पर अनपेक्षित रोक लगाए जाने के बाद आजादी समर्थक समूह को आखिरकार रमजान माह में एक मुद्दा मिल ही गया.

रमजान के बावजूद

अभी हाल ही की बात है सैयद अली गिलानी के नेतृत्व वाले एएचपीसी के पाक समर्थक गुट ने हैदरपुरा मुख्यालय पर एक सेमिनार का आयोजन किया था. रमजान के दौरान कई हुर्रियत नेताओं और उनके प्रतिनिधियों ने जुम्मे की मजलिसों को संबोधित किया. आजादी की वकालत करने वाली जेकेएलएफ ने हाल ही दो जुलाई को एक बड़ी इफ्तार पार्टी का आयोजन किया, जिसमें बहुत से अल्पसंख्यकोें को भी आमंत्रित कर साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया. मोटे अनुमान के मुताबिक इस इफ्तार पार्टी में करीब 4,000 लोग शामिल हुए.

पढ़ें: 'पीने की आजादी' के पक्षधर हसीब द्राबू पर 'शराब प्रतिबंध' के समर्थक पड़े भारी

इसके अलावा श्रीनगर में जामा मस्जिद में मीर वाईज उमर फारूख द्वारा आयोजित धार्मिक सभा शब-ए-कद्र का दो और तीन जुलाई की मध्य रात्रि को कश्मीरी जनता के लिए इंटरनेट पर सीधा प्रसारण किया गया.

हुर्रियत के फेसबुक पेज पर यह प्रसारण 10,000 लोगों ने देखा. साथ ही मिडिल ईस्ट, यूरोप, यूके और अमेरिका में रह रहे अप्रवासी कश्मीरियों ने इस पर भावुक कमेंट्स की बौछार कर दी. मीरवाइज उमर की पार्टी हुर्रियत ने दावा किया कि उनकी पार्टी की आईटी टीम ने शब-ए-कद्र और रात भर चलने वाली इबादत के सीधे प्रसारण के लिए अच्छे खासे इंतजाम किए थे.

25 सालों बाद भी कश्मीर की बलात्कार पीड़ितों को नहीं मिला न्याय

रमजान के पवित्र माह का अंतिम शुक्रवार जिसे अलविदा-ए-जुमा भी कहा जाता है और अल-अक्सा मस्जिद की याद में यौम-ए-कुद के रूप में भी मनाया जाता है, बहुत से आजादी के पक्षकार नेताओं ने जुम्मे की मजलिसों को संबोधित किया. उनका मकसद अपने इस दस सूत्री प्रस्ताव के पक्ष में लोगों का समर्थन जुटाना था.

क्या यह दस सूत्री प्रस्ताव

अंतरराष्ट्रीय समुदाय और इस्लामिक संघ संगठन का ध्यान आकर्षित करने के अलावा इस प्रस्ताव में लोगों की उम्मीद के मुताबिक कश्मीर समस्या के हल पर जोर दिया गया है. यूनाइटेड हुर्रियत कैम्प का कहना है कि यह प्रस्ताव सारी मस्जिदों में पेश किया गया था. जामा मस्जिद, खानकहस, इमामबाड़ा और कश्मीर की सारी मजारों में भी इसे भेजा गया.

प्रस्ताव के पहले बिन्दु में साफ शब्दों मे कहा गया है, ‘जम्मू कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है, जो कि सच्चाई है और इसका हल लोगों के बलिदान को ध्यान में रखते हुए, उनकी उम्मीदों के अनुरूप होना चाहिए. एक शांतिपूर्ण, दूरगाामी और सर्वमान्य हल.’

जम्मू बनाम कश्मीर: एक और जमीन का हस्तांतरण बना विवाद की जड़

इसके तीसरे बिंदु के रूप में विस्थापित कश्मीरी पंडितों का मुद्दा उठाया गया है. उनके लिए अलग शहर बसाने और सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए काॅलोनियां बनाने का कड़े शब्दों में विरोध किया गया है.

इसके अलावा प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि कश्मीर के राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक अधिकारों को कमजोर करने और इनका हनन करने वालों के खिलाफ सिरे से लड़ाई लड़ी जाएगी.

प्रस्ताव में ‘कश्मीर विरोधी नीतियों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और इसकी स्थानीय इकाइयों द्वारा जम्मू कश्मीर के मुस्लिम बहुल इलाकों में जन सांख्यिकी स्वरूप को बदलने की योजना’ का खुला विरोध करने की बात कही गई है.

इसके अलावा यूनाइटेड प्रो आजादी कैम्प जम्मू कश्मीर में शराब और मादक पदार्थ के सेवन पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग कर रहा है और इस मुद्दे पर पीडीपी-भाजपा सरकार के रुख की आलोचना की है.

कश्मीर के राजनीतिक मुद्दे के अलावा प्रस्ताव में इससे जुड़े विभिन्न सामाजिक आर्थिक पक्षों का भी जिक्र किया गया है ताकि विभिन्न मोर्चों पर पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार को घेरा जा सके.

बात इमामों की

इस दस सूत्री प्रस्ताव के छठे बिन्दु में कश्मीर में धर्मगुरूओं पर की गई कथित कानूनी कार्रवाई पर खेद व्यक्त करते हुए कहा गया है ‘इमामों के बारे में जानकारी जुटाना और उन पर नजर रखना ‘धार्मिक हस्तक्षेप है.’

श्रीनगर के एक अंग्रेजी दैनिक में छपी रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीर में इमामों पर नजर इसलिए रखी जा रही थी ताकि यह पता लगाया जा सके कि वे जुम्मे की मजलिसों में क्या तकरीरें कर रहे हैं. इस रिपोर्ट से कश्मीर के सामाजिक-आर्थिक गुटों और सिविल सोसाएटी समेत कश्मीरी समाज के विभिन्न वर्गों में चिंता और अशांति व्याप्त है.

जम्मू-कश्मीरः क्या आतंकवादी 'स्मार्ट' बन रहे हैं?

हालांकि गुप्तचर एजेंसियों ने आधिकारिक तौर पर इस बात से इनकार किया है कि निकट भविष्य में इस तरह की कोई योजना है.

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि अभी वर्तमान मंे ही खुफिया एजेंसियां कश्मीर को ‘सुधारवादी’ बनाने की योजना के तहत ऐसा कर रही है.

प्रस्ताव के अंतिम बिंदु में ‘ईद-उल फितर से पहले जम्मू-कश्मीर की विभिन्न जेलों और देश भर की जेलों में बंद राजनीतिक बंदियों की तुरंत रिहाई’ की मांग की गई है.

संयुक्त रूप से पारित किए गए इस प्रस्ताव में मस्जिद अक्सा का इजराइल द्वारा गैर कानूनी अधिग्रहण किए जाने पर भी विरोध दर्ज किया गया है.

संगठित आजादी समर्थक समूह का यह दस सूत्री प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने विभिन्न मुद्दों पर विवादास्पद बयान दिए हैं.

वाद की जरूरत

कुछ सुरक्षा और गुप्तचर विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर में इस मामले को हवा दी है और हुर्रियत और जेकेएलएफ को जबरन एक करने का निर्देश दिया है. परन्तु यासीन मलिक ने कैच के साथ बातचीत के दौरान इस आरोप से इनकार किया. श्रीनगर में अपने अबि गुजर स्थित कार्यालय में उन्होंने कहा, 'किसी भी समस्या का हल बातचीत से ही संभव है लेकिन मौजूदा सरकार की अलोकतांत्रिक नीतियों के चलते कश्मीरियों का बातचीत पर से विश्वास उठ गया है.

मलिक ने कहा भारत इससे पहले पाकिस्तान के सैन्य शासकों तक से बात कर चुका है. आज वह वहां की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के साथ बात करने से उसे क्या गुरेज है. उन्होंने कहा कश्मीर विवाद में कश्मीर प्रमुख पक्ष है. इस समस्या का हल तब तक नहीं होगा जब तक कि कश्मीरी जन प्रतिनिधि आगे बढ़ कर खुद को इस मामले में प्रथम पक्ष के तौर पर पेश नहीं करते.

राष्ट्रवाद पर सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं: जम्मू-कश्मीर पुलिस

ऐसा लग रहा है मानो गठबंधन की मजबूरी के चलते जम्मू कश्मीर की पीडीपी नीत सरकार अपना खुद का एजेंडा ही भूल गई है, जिसे एक बार इसके एक बड़े नेता ने ‘पवित्र दस्तावेज’ कहा था. गठबंधन के लिए सरकार का एजेंडा इस बात का समर्थन करता है कि पाकिस्तान के साथ मेल-मिलाप रखा जाए और हुर्रियत काॅन्फ्रेंस से वार्ता की जाए.

हस्ताक्षर अभियान

जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक ने अपने लम्बे चले हस्ताक्षर अभियान के बारे में बताया कि उनके पास 15 लाख कश्मीरियों के हस्ताक्षर हैं जो कश्मीरी समस्या का हल चाहते हैं. आज तक जम्मू कश्मीर में ऐसी कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं अपनाई गई. हमने अपने हस्ताक्षर अभियान में 15 लाख हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान इकट्ठा किया है.

एनआईटी श्रीनगर बना राष्ट्रवाद का नया अखाड़ा

2003 में यासीन मलिक की अगुवाई में पूरे कश्मीर में यह हस्ताक्षर अभियान चलाया गया था. अपने हस्ताक्षर अभियान को रचनात्मक बताते हुए मलिक ने कहा कश्मीरियों की इच्छा पता करने का यह लोकतांत्रिक और पारदर्शी तरीका था. मलिक ने इसकी एक प्रति 2006 में एक सीडी के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति को भी दी. उन्होंने करीब 150 दूतावासों को भी इसकी एक प्रति भेजी है.

First published: 7 July 2016, 7:45 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी