Home » इंडिया » Uniform Civil Code: India's coercive search for a common code
 

कॉमन सिविल कोड की खोज में भारत

जॉन दयाल | Updated on: 11 July 2016, 7:44 IST
(कैच न्यूज)

देश में समान नागरिक संहिता के लिये उठ रही आवाजें इस वर्ष देश के अच्छे माॅनसून के पूर्वनुमान के साथ बहुत बारीकी से मेल खा रही हैं.

यह भीड़ को उत्तेजित करने वाला एक ऐसा उत्प्रेरक है जो मंदिर और मस्जिद जैसे विवादास्पद मुद्दों से कहीं ज्यादा जटिल है लेकिन इसका एक सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि इसके चलते जनता की नजरों में देश के असली खलनायकों की तस्वीर आ जाती है.

पर्दे के पीछे से काम करने वाले अराजक तत्वों के माध्यम से गोहत्या पर पाबंदी लगाने की सरकारी नीति तैयार करवाने, जिसके लिये कई बार पीट-पीटकर जान से मारने तक की नौबत आ गई, के बाद मुसलमानों के बीच लागू तीन-तलाक की प्रक्रिया पर पाबंदी लगाना अब अधिक आसान लगता है. 

समान नागरिक संहिता पर शिवसेना मोदी सरकार के साथ

और इस प्रक्रिया में इन लोगों द्वारा यह प्रचारित करना कि चार शादियां करने की आजादी देना ही इस समुदाय की बढ़ती हुई आबादी का मुख्य कारण है, उनके इस तर्क को और अधिक ताकत देता है.

अगर इसका इस्तेमाल देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को एक करने के लिये किया जाए तो कोई आप पर सवाल नहीं उठाएगा

पूरी दुनिया में अधिकतर मुसलमानों द्वारा किये जा रहे सैंकड़ों निर्दोष लोगों के नरसंहारों, चाहे वह दाएस के नाम पर हो, या फिर ईराक और सीरिया के इस्लामिक स्टेट के नाम पर, फैल रहा वैश्विक इस्लामोफोबिया इस विषय को लेकर देश में जनमत संग्रह के लिये सकारात्मक माहौल बना रहा है और टीवी स्टूडियो में होने वाली बहस इसे एक वाजिब पृष्ठभूमि प्रदान कर रही हैं.

यह मानना बिल्कुल सही है कि अगर इसका इस्तेमाल देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को एक करने के लिये किया जाए तो कोई आप पर सवाल नहीं उठाएगा. हाल के दिनों में उठी गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग अब राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है और सिर्फ गोवा, नागालैंड और केरल जैसे कुछ राज्य ही इससे अछूते हैं.

पढ़ें: समान नागरिक संहिता पर कानून मंत्रालय ने लॉ कमीशन को लिखा खत

इसके अलावा इस मांग के जरिये पिछले काफी समय से उठने वाली उन आवाजों को भी शांत किया जा रहा है जो एक धर्म को दूसरे पर हावी होने का विरोध कर रही हैं. जैसे हिंदू अनडिवाइडेड फेमिली एक्ट ऑन टैक्सेशन और अनुच्छेद 341 (3), जो कि अनुसूचित जातियों को तभी तक विशेष अधिकार देता है जबतक वे हिंदु बने रहने का वायदा करते हैं.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्हें समर्थन सिर्फ मुसलमान महिलाओं के कुछ समूहों का ही नहीं मिल रहा है बल्कि राजनीतिक और आर्थिक रूप से देश के शक्तिशाली ईसाई संप्रदाय के एक बड़े प्रमुख से भी मिल रहा है.

समान सोच वालों का मिलन

कैथोलिक चर्च के साइरो मालाबार राइट के प्रमुख कार्डिनल जाॅर्ज एलनकैरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कदम की सराहना करते हुए कहते हैं, ‘‘समान नागरिक संहिता देश और उसके नागरिकों के बीच एकता को और अधिक मजबूत करने में काफी उपयोगी साबित होगी.’’

हालांकि उन्होंने इस बारे में विस्तार से तो नहीं कहा लेकिन उन्होंने वैधानिक चेतावनी के साथ उम्मीद जताई कि सरकार सबके साथ सलाह-मशविरा करेगी और ‘‘परंपराओं और प्रथाओं पर आधारित कानूनों पर भी विचार करेगी.’’

कार्डिनल एलनकैरी ने नरेंद्र मोदी को 2014-15 में कुछ चर्चों और संस्थानों पर हुए हमलों के विरोध में देशभर में हुए विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर ईसाई समुदाय को संबोधित करने के लिये भी आमंत्रित किया है.

हो सकता है कि कई लोग इस प्रयास को अपनी पहचान को समाप्त करने के एक प्रयास के रूप में देखें

भारत में रहने वाला ईसाई समुदाय शायद पूरी दुनिया का सबसे विविध समुदाय है और इनमें कोई भी धार्मिक या राजनीतिक नेता सबकी बात कहने का दावा नहीं कर सकता.

हालांकि बेहद सख्ती से पितृसत्तात्मक विचारों को मानने वाला कैथोलिक धार्मिक नेतृत्व अपने ही समुदाय की महिला सदस्यों के संशय का शिकार है जो बीते काफी समय से अपने मौजूदा अधिकारों से आगे जाकर धार्मिक मामले में बड़ी भूमिका की मांग करती आ रही हैं.

पूर्वोत्तर के आदिवासियों, केंद्रीय भारत के आदिवासियों, दलित समुदाय से धर्मांतरित लाखों लोगों, चौथी सदी के सीरियाई प्रवासियों के वंशज होने का दावा करने वालों, ब्राह्मण परिवारों, पुर्तगाली, डच, फ्रेंच और अंग्रेज मिशनरी आपस में मिलती भी हैं और कई तरीकों से एक दूसरे से अलग भी हैं.

समान नागरिक संहिता पर कानून मंत्रालय ने लॉ कमीशन को लिखा खत

सभी तो नहीं लेकिन अधिकतर ईसाई, अच्छी या बुरी परंपराओं में, अपने विभिन्न हिंदू समकक्षों के साथ बेहद मजबूत सांस्कृतिक और एंथोलाॅजिकल संबंध रखते हैं. और इनमें भी जाति सबसे अधिक महत्व रखती है.

हो सकता है कि कई लोग इस प्रयास को अपनी पहचान को समाप्त करने के एक प्रयास के रूप में देखें.

बहस करने लायक कानून

लोगों ने दहेज विरोधी कानून से बचने के तरीके तलाश लिये हैं. कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट में अपनी तरफ से ऐसे प्रयास भी कर रहे हैं जिससे धार्मिक कानूनों की व्याख्या को अधिक अनुकूल बनाते हुए तलाक लेने की प्रक्रिया को आसान किया जा सके.

तमिलनाडु, पांडिचेरी, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश के कुछ हिस्सों के कैथोलिक अपने सीधे चचेरे रिश्ते में आने वाले संबंधियों से शादी करना पसंद करते हैं. जबकि पश्चिमी तट और उत्तर और पूर्व भारत में ऐसा करना किसी को भी पूरे समुदाय से बाहर करने का जरिया बन सकता है. जैसा कि हरियाणा में खाप पंचायतें करती हैं. जबकि दक्षिण में इस विषय पर किसी की हत्या नहीं होती.

पढ़ें: क्या 2017 चुनावों के मद्देनजर समान नागरिक संहिता भाजपा का एक और जुमला है?

पूर्वोत्तर राज्यों के पहाड़ी इलाकों में कुछ ऐसे समुदाय हैं जिनमें मातृसत्ता चलती है. वे उसी वंशावली और विरासत का पालन करते हैं. अगर हाल ही में सामने आए सर्वेक्षणों पर भरोसा करें तो कई ऐसे मामले देखने को मिले हैं जिन्हें बहुविवाह के नाम से जाना जाता है. 

लेकिन इसके फलस्वरूप पैदा होने वाले बच्चों को विरासत या संपत्ति में अधिकर देना तो दूर की बात है, पिता का नाम तक पाने का अधिकार नहीं है.

सुधारों की आवश्यकता

हमारे समाज में इस समय सुधारों की बेहद सख्त आवश्यकता है. सरकार को शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने से संबंधित कानूनों को बदलने और आधुनिक बनाने में बड़ी भूमिका निभानी होगी. यह ऐसे कानून हैं जिन्हें अंग्रेजों ने भारत में तब लागू किया था जब ब्रिटिश महारानी ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का कब्जा अपने हाथ में लिया था.

ईसाई समुदाय का संयुक्त महिला कार्यक्रम, जिसे विभिन्न संप्रदायों के बिशपों का समर्थन मिला हुआ है, ने लिंग और आधुनिक कानूनों के लिये लड़ाई छेड़ रखी है. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग की सरकार ने उनकी अपील के प्रति कोइ सकारात्मक नजरिया नहीं दिखाया था.

कैथोलिक बिशप्स कांफ्रेंस ऑफ इंडिया के अध्यक्ष दिल्ली के करिश्माई आर्कबिशप एलन डि लास्टिक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अपनी मुलाकातों के दौरान लगातार उनसे समान नागरिक संहिता के प्रति विचारों को देश के सामने रखने को कहते थे.

समान संहिता नहीं बल्कि एकरूप संहिता की आवश्यकता है जो सभी धर्मों की सर्वोत्तम प्रथाओं को खुद में समेटे हुए हो

वाजपेयी उनकी बातों से सहमत तो होते लेकिन खुलकर कभी ऐसा कर नहीं पाए. डि लास्टिक ने उन्हें आगाह किया था कि हिंदू कोड को किसी और नाम से लागू करने पर स्वीकार नहीं किया जाएगा. यह लेखक भी उन कुछ मुलाकातों का साक्षी रहा है.

आर्कबिशप उनसे लगातार कहते, ‘‘समान संहिता नहीं बल्कि एकरूप संहिता की आवश्यकता है जो सभी धर्मों की सर्वोत्तम प्रथाओं को खुद में समेटे हुए हो और जो सभी समुदायों को खुद को नियंत्रित करने के लिये स्वीकार हो.’’

पढ़ें: तीन तलाक: मुस्लिम पर्सनल लॉ पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया कि पुर्तगाली शासकों द्वारा लागू किया गया गोवा काॅमन सिविल कोड, जिसे बीजेपी सरकार ने अधर में लटका रखा था काफी अच्छा था लेकिन यह भी साफ था कि वह लैंगिक बराबरी का पक्षधर नहीं था.

गोवा काॅमन सिविल कोड के अनुसार एक हिंदु पुरुष अगर चाहे तो दो पत्नियां रख सकता था. लेकिन शरिया कानूनों के चलते एक मुसलमान पुरुष को एक पत्नि के रहते दूसरी शादी करने से रोकता है.

बदलाव की गुंजाइश

उम्मीद है कि इस मामले से जुड़े तमाम हितधारकों को सुनने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार करने के क्रम में विधि आयोग के पास भी पुराने सवालों और पुरानी मांगों पर ध्यान देने का एक मौका होगा.

लेकिन इन हितधारकों का हस्तक्षेप इसपर निर्भर करेगा कि सरकार समान नागरिक संहिता को लेकर क्या चाहती है. दूसरे शब्दों में कहें तो बीजेपी-आरएसएस क्या चाहते हैं?

अपनी स्थापना के बाद से विधि आयोग धार्मिक मुद्दों पर दो दर्जन से भी अधिक रिपोर्ट दाखिल कर चुका है जिनपर 1947 से अबतक आए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेशों के साथ ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है.

साथ ही उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि हाईकोर्ट इन मामलों में काफी अनिश्चित हो सकता है और उसके कुछ फैसले काफी प्रतिगामी साबित हो सकते हैं.

हिंदुओं के बीच जाति प्रथा को समाप्त किये बिना हम समान नागरिक संहिता की दिशा में कैसे अपना कदम आगे बढ़ा सकते हैं

इसके अलावा नए विचार इस मुद्दे की जटिलता को अधिक उजागर करेंगे. मुस्लिम महिलाओं की इच्छाओं और आकांक्षाओं की आड़ में मुसलमान समुदाय को लक्षित करना बेहद आसान है.

लेकिन जैसा कि मुंबई के अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता फ्लेविया एग्निस बताती हैं कि धर्मनिरपेक्ष लाॅबी समकालीन घटनाओं के मुकाबले लैंगिक मुद्दों को अधिक अहमियत देता है.

दो साल भगवाराज: विपक्ष एक कदम आगे, दो कदम पीछे

इसके अलावा एक और प्रवृति यह है कि यूसीसी की मांग को एक ऐसी जादू की छड़ी के रूप में पेश किया जाता है कि वह महिलाओं और विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के सभी दुखों का इकलौता हल साबित होगी.

दूसरे स्तर पर देखें तो ऐसा प्रचारित हो रहा है कि बिगड़े हुए सांप्रदायिक माहौल में इसकी मांग ‘‘राष्ट्रीय एकता’’ के लिये बेहद आवश्यक है. इसके अलावा अल्पसंख्यकों के बीच चर्चित बहुविवाह और कुछ दूसरी ‘‘बर्बर’’ प्रथाओं को खत्म करने के नाम पर इस मांग को और अधिक हवा दी जा रही है.

कोई भी समझदार व्यक्ति पूछ सकता है, ‘‘हिंदुओं के बीच जाति प्रथा को समाप्त किये बिना हम समान नागरिक संहिता की दिशा में कैसे अपना कदम आगे बढ़ा सकते हैं?’’

इस सारी बहस के बीच आॅनर किलिंग का मुद्दा भी आता है. फ्लेविया को लगता है कि जैसे चुनावी मौसम में समान नागरिक संहिता का मुद्दा राजनीतिक मजबूरियों के चलते पुर्नजीवित हुआ है, इस बात की पूरी उम्मीद है कि कुछ समय बाद यह फिर से अंधेरे में खो जाएगा.

संविधान में वर्णित नीति निर्देशक सिद्धांत जाति प्रथा समाप्त करने के बारे में कुछ नहीं कहते जबकि यह बाबासाहब अम्बेडकर के दिल के बेहद करीब था.

यह चुप्पी इस बात की स्पष्ट प्रमाण है कि समान नागरिक संहिता एक बार फिर से ठंडे बस्ते में चली जाएगी और दोबारा चुनावी मसम में ही ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से उछाली जाय.

First published: 11 July 2016, 7:44 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी