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विश्वविद्यालय बनाम सरकार और सरकार बनाम देश

संदीप सिंह | Updated on: 18 February 2016, 8:50 IST
QUICK PILL
  • जेएनयू पर हो रहे हमले को अलग-थलग काट कर नहीं देखा जाना चाहिए. यह देश भर में अलग-अलग समुदायों पर बढ़ रहे हमलों की निरंतरता में ही हो रहा है. 
  • निशाने पर रखे गए ये छात्र-छात्राएं धूल और हसरत से भरे भारत के वास्तविक गांवों, कस्बों और छोटे-बड़े शहरों से सपनीली आंखें लिए आते हैं. 

क्या भाजपा जेएनयू को अपना ख़ास देशी थीआनमेन स्क्वायर बनाना चाहती है? आखिर वह कौन सी चीज है जो सत्ता के सर्वोच्च शिखरों को एक विश्वविद्यालय के खिलाफ एकतरफा युद्ध जैसी स्थिति में उतार देता है? यदि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय या श्यामाप्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय होता क्या तब भी भाजपा का यही रुख रहता? लम्बे समय से केंद्र सरकारों की आंख की किरकिरी बन सकने की कूवत रखने वाले इस विश्वविद्यालय पर हो रहे हमले का निहितार्थ क्या है?

जेएनयू पर हो रहे हमले को अलग-थलग काट कर नहीं देखा जाना चाहिए. यह देश भर में अलग-अलग समुदायों पर बढ़ रहे हमलों की निरंतरता में ही हो रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि सत्ता-प्रायोजित जो खुला और छुपा युद्ध अब तक भारत के आदिवासी इलाकों, किसानों, महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों, हाशियों समुदायों और ‘अशांत क्षेत्रों’ के खिलाफ चल रहा था वह अब देश की राजधानी और उसमें भी देश के सर्वोच्च शिक्षण-संस्थानों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक आ पहुंचा है. 

यह हमला एक चेतावनी है उन सभी लोगों के लिए जो सत्ता से, उसकी ‘विकास’ के मॉडल से, उसके राष्ट्रवाद से, उसके भाषा से जरा सा भी नाइत्तेफाकी रखते हैं. यह हमला बचे-खुचे नेहरूयुगीन मूल्यों के खिलाफ भी है. इस हमले की पृष्ठभूमि में संघ-परिवार की जवाहरलाल नेहरू से दिली नफरत का मुजाहिरा साफ़-साफ़ देखा जा सकता है.

दरअसल यह दो भारत की लड़ाई है जो अब दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दे रही है. एक भारत है जो अपने किसानों को बर्बादी की ओर धकेल देने वाली नीतियों और निज़ाम से मुक्ति मांग कर रहा है, जो जंगलों में रह रहे आदिवासियों पर हो रहे हमले बंद करने की आवाज उठा रहा है, यह भारत पर्यावरण और भविष्य को दांव पर लगाकर विकास के नाम पर पूंजीपतियों के ‘अंधाधुंध मुनाफे’ के खेल को रोकने की मांग कर रहा है, यह भारत महिलाओं और दलितों के खिलाफ रोजनामचा बन चुकी हिंसा से लड़ रहा है. 

देश का यह दूसरा तसव्वुर धर्म या इलाके के नाम पर समुदायों के उत्पीड़न के खिलाफ एकजुट हो रहा है, यह लोकतंत्र को सिर्फ बोल भर पाने के अधिकार से आगे ले जाकर जीने के अधिकार से जोड़ रहा है.

इस हमले की पृष्ठभूमि में संघ-परिवार की जवाहरलाल नेहरू से दिली नफरत का मुजाहिरा साफ़-साफ़ देखा जा सकता है

दूसरी तरफ सत्ता का अपना भारत है जिसकी कोई भी आलोचना देशभक्ति के तराजू में तौली जाती है. इस भारत का ‘अखंड नक्शा’ नागपुर से पास हुआ है और एक पुराने मिथक को सच साबित करती हुई इसकी जान पूंजीपतियों के मुनाफारूपी तोतों और स्टॉक एक्सचेंज के ग्राफों में बसती है. 

सत्ता और पूंजी के गठजोड़ द्वारा पालित-पोषित माध्यम दिनरात इसकी सर्वोच्चता के गुण गाते हैं जिसके खिलाफ एक शब्द भी ‘देशद्रोह’ है. दादरी से लेकर हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय तक, उबड़-खाबड़ आदिवासी इलाकों से लेकर भारतीय किसानी के समतलों तक, मुजफ्फरनगर, मंगोलपुरी होते हुए, दाभोलकर, पंसारे और कुलबुर्गी के मृत शरीरों को तमगों की तरह पेश करते हुई यही मुनादी बज रही है- ‘जो हमारे खिलाफ है, देशद्रोही है.’ 

सत्ता के इस भारत में किसानों की जमीन ‘विकास’ के नाम पर कारपोरेट्स को दी जानी है और बिना किसी बाधा-अड़चन के चमचमाता भूमि-अधिग्रहण विधेयक पास किया जाना है. अब उस सरकार की खीझ समझने की कोशिश करिए जिसके प्रधानसेवक की आंख के तारे इस विधेयक को अब तक उसके मनचाहे रूप में सूरज की रोशनी देखना नसीब नहीं हुआ है! 

अचरज होता है कि जिस देश में क़र्ज़ और सूखे की रस्सी से लटककर आत्महत्या करने वाले किसानों, पेट फुलाए कुपोषित बच्चों और खून की कमी की शिकार औरतों की सालाना-दर बढ़ती ही जा रही हो वहां राष्ट्रीय बैंक, धन्नासेठों और उद्योगपतियों को लाखों करोड़ रुपयों का लोन सरकार माफ़ कर दे रही है.

क्या कृषि-नीतियों और सरकारी उपेक्षा से पैदा हुए संकट के चलते भूखों मर रहे, आत्महत्या कर रहे, गांव-देश छोड़कर पलायन करते और शहरों में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर किसानों की व्यथा-कथा को समझने की कोशिश यह ‘देश’ करेगा? आखिर यह किसका देश है? यह कैसा देश है और कैसी उसकी देशभक्ति है? 

वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य, भोजन, लैंगिक-बराबरी, सामाजिक-आर्थिक समानता, श्रम, शिक्षा और पर्यावरण के सबसे निचले पायदानों खड़े इस देश की सत्ता को अपने पूंजीपतियों पर बहुत घमंड है. इनमें दुनिया के सबसे अमीर लोगों में आते हैं.

दूसरी तरफ सत्ता का अपना भारत है जिसकी कोई भी आलोचना देशभक्ति के तराजू में तौली जाती है

जेएनयू जैसे शिक्षण-संस्थान इसी दुरभिसंधि पर बार-बार प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं. जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है. आंकड़े गवाह हैं कि यह सरकार अपने ही देश के आदिवासियों के खिलाफ उन्हें उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखली अभियान में उतरी हुई है और बच्चों व औरतों के शरीर पर देशभक्ति के तराने लिख रही है. 

अगर यह देश इतिहास की सबसे बड़ी किसान आत्महत्याओं का गवाह बन रहा है तो उसका जिम्मेदार कौन है? 

जेएनयू इन प्रश्नों को उठाता है. कानून-कचहरी और नौकरशाही से लेकर पूंजी के गढ़ों तक, पुलिस-फ़ौज-फाटे से लेकर सत्ता के गलियारों और संस्कृति-धर्म की दुकानों तक यह विश्वविद्यालय और उसका छात्र आन्दोलन हाथ में लुकाठी लिए अपने तईं नए समाज का सपना देखना नहीं भूला है. सत्ता की  नजर में यही जेएनयू का अपराध है, यही उसकी भूल है. वैसे भी यह ‘कड़े इरादों’ के साथ सत्ता में आयी सबक सिखाने को आतुर व देशद्रोहियों को जेल या पाकिस्तान भेजने वाली सरकार है.

विविधता और प्रतिनिधित्व के स्तर पर जेएनयू एक अर्थ में ‘मिनी इंडिया’ है. विचार और व्यवहार के स्तर पर लोकतंत्र की सर्वोच्च परम्पराओं व असहमति के स्वर को रचाए-बचाए जेएनयू आदर्श भारत का एक सूक्ष्म रूप (Microcosm of Ideal India) है, उसकी अंतश्चेतना है. तो भाजपा सरकार का यह हमला इसी ‘आदर्श भारत’ पर है. 

आखिर जेएनयू है क्या?

निशाने पर रखे गए ये छात्र-छात्राएं धूल और हसरत से भरे भारत के वास्तविक गांवों, कस्बों और छोटे-बड़े शहरों से सपनीली आंखें लिए आते हैं. आंखों देखा यथार्थ और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कठिन प्रवेश-परीक्षा से गुजरकर देश की राजधानी में स्थित इस विश्वविद्यालय तक पहुंचने के लिए किया गया संघर्ष उनकी मजबूती होते हैं. 

निश्चय ही इसमें इलाकाई पिछड़ेपन और लिंग के आधार पर अतिरिक्त अंक देने वाली प्रवेश-प्रक्रिया इत्यादि से उन्हें मदद मिलती है पर इसका कतई मतलब नहीं है कि उन्हें कैम्पस में कोई भेदभाव नहीं झेलना पड़ता. 

ऐसे में जेएनयू छात्रसंघ की रहनुमाई में वामपंथ के साथ-साथ बहुरंगी छात्र-आन्दोलन उनके पास उस सिम्त के रूप में आता है जिसे जेएनयू के छात्र ओढ़ते-बिछाते हैं. 

हजारों किलोमीटर की दूरियां और हज़ार किस्म की चुनौतियां पार करते हुए ये छात्र-छात्राएं देश के हर राज्य से, लगभग हरएक जिले से, कमोबेश हरएक वर्ग से और दक्षिण एशिया के गरीब देशों से जेएनयू पहुंचते हैं. 

अपवादस्वरुप ही सही जेएनयू अभी भी इस कसौटी पर खरा उतरता है. ज्यादातर लोग यकीन नहीं कर पायेंगे कि लगभग हर राजनीतिक रंग और हर विचारधारा के नरम-गरम और अतिवादी छात्रों और संगठनों की उपस्थिति के बावजूद जेएनयू में यदा-कदा ही ऐसी नौबत आती है कि प्रशासन या पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़े. 

इस पूरे ताने-बाने में वह नागरिकता बनती हैं जो आधुनिक भारत निर्माताओं का स्वप्न थी, जिसे देश के संविधान की किताब में लिखा गया है और महान दार्शनिकों और राजनीतिक चिंतकों द्वारा बार-बार उद्घाटित किया गया है.

गांधी-नेहरु की सोच को इस देश की सरकारें कब की अलविदा कह चुकी हैं. पर इस मायने में भाजपा सरकार का रवैया बहुत अलग है. औपनिवेशिक संरक्षण, धार्मिक मदान्धता और जातीय अभिमान के गारे से बनी इसकी विचारधारा जिस राष्ट्र और जिस तरह के समाज का सपना लेकर आगे बढ़ रही है उसमें न तो ऐसी नागरिकता, प्रश्नाकुलता, आलोचना, बहस के लिए गुंजाईश है न ही तमाम किस्म की अस्मिताओं, राष्ट्रीयताओं, वंचित समूहों के विचारों और आकांक्षाओं की सुनवाई. उन्हें गांधी-नेहरु जैसे उदारवादी भी मंजूर नहीं हैं.

नमक का हक अदा करो: किसका टैक्स और किसका विश्वविद्यालय?

गंवार और बदमाश कहने के लोभ से बचते हुए टीवी चैनलों के एंकरों द्वारा चीख-चीखकर पूछे जा रहे इस प्रश्न का भी जवाब देने की जरूरत है. ‘हमारे टैक्स के पैसे’ से चल रहे विश्वविद्यालय, सरकारी सब्सिडी पा रहे विश्वविद्यालय के छात्र देश के खिलाफ नारे कैसे लगा सकते हैं? 

पहली बात तो यह समझने की जरूरत है कि सरकार के खर्च से चल रही शिक्षा प्राप्त करने से यह कतई आवश्यक नहीं है कि कोई उस सरकार या देश के प्रति उत्तरदायी हो जाने की बाध्यता है. यह एक भावना है जो डंडे या धमकी से कभी नहीं आ सकती. दूसरी बात, देश को टैक्स सिर्फ टाइम्स नाउ और जी न्यूज़ के एंकरों जैसे मध्यवर्ग के लोग ही नहीं देते बल्कि खेती-किसानी से लेकर, बीड़ी, साबुन, चाय, चीनी, नमक, बिजली, तेल, रेल से लेकर तमाम किस्म के परोक्ष टैक्स इस देश का आम गरीब और आदिवासी-दलित जनता भी देती है. 

जेएनयू के छात्र पस्तहाल, गरीब और लगातार उजाड़ी जा रही जनता के हरकारे बनकर सत्ता के सम्मुख देश की लूट और गरीबों की बदहाली से जुड़े असहज सवाल खड़ा करते हैं. उनसे गलतियां भी हो सकती हैं पर वे नेकदिल वालों की गलतियां हैं. इस अर्थ में वे सच्चे देशभक्त हैं और देश की जनता के नमक का हक अदा कर रहे हैं. 

तीसरी बात कि किसी सरकारी विश्वविद्यालय में पढ़ने से, किसी जमींदार के खेत में मजूरी करने से, किसी पूंजीपति की फैक्ट्री में काम करने से कोई उसका ग़ुलाम नहीं हो जाता कि वह मालिक के खिलाफ बोल नहीं सके. यदि ऐसा होता तो यह दुनिया कब की सड़ चुकी होती. पर कारपोरेट घरानों की फेंकी रोटी और सत्ता के टुकड़ों पर पलने वाले इन बिनमांगे ग़ुलामों को यह कभी समझ नहीं आएगा.  

जेएनयू पर हमला क्यों?

बार-बार यह स्पष्ट किया जा चुका है कि अफज़ल गुरु की फांसी की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम पूर्व में छात्र संगठन डीएसयू से जुड़े छात्रों के एक छोटे से समूह ने किया था. अफजल गुरु की फांसी के बाद सालाना तर्ज़ पर हो रहा यह तीसरा कार्यक्रम था. जिसकी अनुमति प्रशासन ने सरकारी दबाव के चलते कार्यक्रम शुरू होने से बस 15 मिनट पहले रद्द कर दी और एबीवीपी ने कार्यक्रम स्थल पर पहुंचकर हुड़दंगई शुरू कर दी. इसके विरोध में ही कार्यक्रम स्थल पर कुछ छात्रों ने (जिनमें ज्यादातर बाहरी थे) आपत्तिजनक नारेबाजी की. 

जिस तरह से छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित अन्य वामपंथी कार्यकर्ताओं को निशाने पर लिया गया है उससे एबीवीपी, सरकार, पुलिस और मीडिया की मंशा पर संदेह होता है. एबीवीपी कार्यकर्ताओं द्वारा ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाते हुए वीडियो का सामने आना इस संदेह को और पुख्ता करता है.       

विश्वविद्यालय विचारों की बहुतायत और बहस की जगहें हैं. देश के लगभग हर महत्वपूर्ण कैम्पस के अंदरूनी मसलों में बात-बात में अपनी नाक घुसाकर यह सरकार क्या साबित करना चाहती है? कैम्पस में हुए किसी कार्यक्रम के दौरान यदि कुछ आपत्तिजनक हुआ है तो जेएनयू प्रशासन इतना सक्षम है कि उसकी जांच कर कोई कदम उठा सके. इसमें किसी सांसद, सरकार, गृहमंत्री, शिक्षा मंत्री और अमित शाह जैसे लोगों का कूदना साबित करता है कि सरकार किसी खास एजेंडा पर काम कर रही है.

पिछले दिनों हुए तमाम आन्दोलनों में, जाहिर है जेएनयू के छात्र-आन्दोलन की जबरदस्त भागीदारी रही है. और देश की राजधानी दिल्ली में इन सारे आन्दोलनों की गूंज बरकरार रखने का और सत्ता की नींद में खलल डालने का काम जेएनयू के छात्र-आन्दोलन ने किया है. इसी कारण आज जेएनयू पर इतना तीखा हमला किया जा रहा है.

हे मां! हम तुमसे प्यार करते हैं. वन्दे मातरम! भारत माता की जय!

टीवी बहसों में कुछ उन्मादी एंकरों सहित भाजपा और एबीवीपी के लोग बार-बार वामपंथी लोगों को ‘वन्दे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ बोलने के लिए ललकार रहे हैं. उनको लगता है उन्होंने वामपंथियों की कमजोर नस पकड़ ली है. ये नारे मां रूपी देश या देशरूपी मां (इस रूपक की नारीवादी आलोचना को एक मिनट के लिए छोड़ भी दें तो) के लिए एक भावनात्मक उच्छवास जैसे हैं. 

मां के प्रति प्रेम के सिवा इन नारों में भविष्य की कोई दिशा, नए समाज का कोई सपना नहीं मिलता है. इसलिए शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा दिया कि देश को इंक़लाब (क्रांति) की जरूरत है, वही हमारे भविष्य की दिशा है, हमें उसपर चलना है. भगत सिंह के दीवाने इसीलिये वन्दे मातरम पर इंक़लाब जिंदाबाद को तरजीह देते हैं. जाहिर है अपनी मां और देश से उनका प्यार अटूट-असंदिग्ध है.

वर्तमान गैर-बराबरी पर टिके ब्राह्मणवादी समाज को बचाए रखनेवाली ताकतें ठीक इसी कारण इन्कलाबियों से इतनी नफरत करती हैं. 

बेदखली, बेदखली, बेदखली और कुछ नहीं!

आज भी ग्रामीण भारत के घरों में सिर्फ तीन प्रतिशत ग्रेजुएट हैं. आज भी उच्च-शिक्षा में नामांकन दर के मामले में भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे मुल्कों से पीछे है. पिछले बजट में उच्च-शिक्षा का आवंटन बड़े पैमाने पर घटा दिया गया जिसकी अभिव्यक्ति शोध-छात्रों की छात्रवृत्ति की कटौतियों की रूप में सामने आयी. इसी की प्रतिवादस्वरूप छात्रों का अभूतपूर्व ‘ओकुपाई यूजीसी’ आन्दोलन हुआ.

ऐसे वक़त में जब उच्च-शिक्षा सहित शिक्षा के पूरे क्षेत्र को देशी-विदेशी पूंजी के हाथ में मुनाफा कमाने का एक और जरिया बनाने की कवायद पुरजोर हो, इसका हालिया उदाहरण दिसंबर 2015 में दिखा, डब्लूटीओ के नैरोबी राउंड में भारत सरकार द्वारा उच्च-शिक्षा को भी निजी पूंजी के लिए खोल देने का कदम उठाया जा चुका है.

जेएनयू खुद को सही साबित करेगा

ये गर्द-गुबार बैठेगा और एक दिन खरा सच सामने आएगा. खास बात यह है कि जेएनयू चुप बैठने वाला विश्वविद्यालय नहीं है. संभवतः भाजपा सरकार के खैरख्वाहों और सलाह देने वालों से कुछ अपनी सरकार से काफी नाराज चल रहे हैं और उन्होंने सरकार को मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डालने के लिए उकसा दिया है. अहसमति का यह उद्घोष लम्बा खिंचने वाला है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. संस्थान का इससे सहमत होना जरूरी नहीं है)

First published: 18 February 2016, 8:50 IST
 
संदीप सिंह @catchhindi

लेखक जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं. छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं. पढाई-लिखाई राजनीती विज्ञान, हिन्दी और दर्शनशास्त्र में हुई है. आजकल कलम की मजदूरी करते हैं. 

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