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प्रणब मुखर्जी बनाम दिग्विजय सिंह: दोनों थोड़ा सही और थोड़ा गलत नजर आते हैं

चारू कार्तिकेय | Updated on: 1 February 2016, 8:00 IST
QUICK PILL
  • राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के दूसरे हिस्से में लिखा है कि अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि परिसर का ताला खोलने का राजीव गांधी का फैसला सही नहीं था.
  • इसके जवाब में एक अन्य कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह का बयान आया है कि ताला खुलवाने का फैसला दरअसल राजीव गांधी का नहीं बल्कि अदालत का था. राजीव गांधी ने शिलान्यास करके गलत किया.
  • दोनों नेताओं के इन दो विचारोंं ने एक बार फिर से अयोध्या विवाद को चर्चा में ला दिया है और साथ ही इस विवाद के पीछे कांग्रेस और राजीव गांधी की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है.

यह आम धारण है कि एक समय में (1986) पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी चाहते थे कि बाबरी मस्जिद का ताला खोल दिया जाए. ताकि हिंदू अपने पूज्यनीय भगवान राम की पूजा कर सके जो 1949 में रहस्यमयी तरीके से अयोध्या स्थित विवादित बाबरी-रामन्मभूमि परिसर में प्रकट हुए थे.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ताला खोलने का निर्णय 'शायद गलत' था. संभवत: यह पहली बार है जब किसी किसी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने ऐसा दावा किया है.

Pranab Book

प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक 'द टर्बुलेंट ईयर्स: 1980-1996' में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विफलताओं पर चर्चा की है. उन्होंने लिखा है, 'राम जन्मभूमि मंदिर मंदिर का ताला एक फरवरी 1986 को खोलना शायद एक और गलत निर्णय था. लोगों को लगता है कि इन कदमों से बचा जा सकता था.'

गेट खोलने का निर्णय राजीव गांधी ने नहीं लिया था. यह कोर्ट का आदेश था: दिग्विजय सिंह

यह किताब इस मुद्दे पर आगे कोई स्पष्टीकरण नहीं देती है. हालांकि, मुखर्जी के आकलन को कांग्रेस पार्टी के भीतर से ही चुनौती मिली है. उन्हें यह चुनौती पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने दी है. दिग्विजय ने भी वर्षों तक प्रणब मुखर्जी की तरह पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता रहे हैं और गांधी परिवार के नजदीकी भी.

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा है, 'ताला खोलने का आदेश कोर्ट ने दिया था ना कि राजीव गांधी ने.'

सिंह ने कथित तौर पर कहा है, 'गेट खोलने का निर्णय राजीव गांधी ने नहीं लिया था. यह कोर्ट का आदेश था.' हालांकि, उन्होंने यह भी इशारा किया कि राजीव गांधी द्वारा शिलान्यास के पत्थर को राम जन्मभूमि के पास रखना एक गलत निर्णय हो सकता है.

लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट

दिग्विजय सिंह पूरी तरह से गलत नहीं है. बाबरी विध्वंस पर बनी लिब्रहान जांच समिति की रिपोर्ट के अनुसार फैजाबाद कोर्ट ने एक फरवरी, 1986 को गेट खोलने का आदेश दिया था. दिलचस्प बात यह है कि रिपोर्ट के अनुसार जज ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि, 'कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी डीएम और सरकार की होगी.'

librahan report

इस स्पष्टीकरण का कारण यह है कि डीएम ने जज के सामने कहा था, 'बाबरी मस्जिद का ताला खोलने से कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं होगी.' यह बात गौर करने वाली है कि डीएम ने जज के सामने शपथपत्र दिया था. लेकिन लिब्रहान रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख नहीं कि डीएम को ऐसा करने के लिए किसने मजबूर किया था.

इस अनुत्तरित सवाल के जवाब में कुछ अटकलें लगाई जाती हैं, उनमें से एक यह भी है कि डीएम को ऐसा करने के लिए तत्कालीन सरकार ने ही मजबूर किया था.

राजीव गांधी ने अरुण नेहरू से कहा था कि केंद्र सरकार को उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहिए

इस पहलू पर फिर से जांच की जरूरत है. क्योंकि प्राय: इतने संवेदनशील कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर डीएम की राय सरकार से अलग नहीं होती है.

अगर यह तात्कालिक कानून-व्यवस्था की समस्या होती, जैसा कि अंत में 1992 में हुआ, इसका प्रभाव सिर्फ जिला प्रशासन के द्वारा ही नहीं बल्कि पूरे राज्य यहां तक की केंद्र तक पड़ता. हालांकि, लिब्रहान आयोग ने इस बात की जांच नहीं की आखिर डीएम से ऐसा बयान किसने दिलवाया. यह आज तक रहस्य है.

दूसरी रपटें

हालांकि, कई स्वतंत्र रपटों ने समय-समय पर इस मुद्दे को उठाया है. 2012 में वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट में पूर्व कांग्रेसी नेता आरिफ मोहम्मद खान का हवाला देते हुए कहा गया है, 'राजीव गांधी और उनके रिश्तेदार-सलाहकार अरुण नेहरू  चाहते थे कि गेट खोलने के लिए दायर याचिका सफल हो जिससे हिंदुओं को खुश किया जा सके.'

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आरिफ मोहम्मद खान ने जर्नल से कहा था, 'राजीव गांधी ने अरुण नेहरू से कहा था कि केंद्र सरकार को उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहिए.'

जर्नल ने खान के हवाले से दावा किया है, 'सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि दो सीनियर अधिकारी कोर्ट के सामने मौजूद होकर यह आश्वासन दें कि ताला खुलने से कानून-व्यवस्था की दिक्कत नहीं होगी. यही आश्वासन जज के फैसले का आधार बना.'

2009 में अंग्रेजी अखबार द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस लिब्रहान ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भूमिका को नजरअंदाज किया है.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के दावे से कांग्रेस को कुछ परेशानी हो सकती है

इस रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है, 'कांग्रेस नेतृत्व जो अरुण नेहरू के माध्यम से काम कर रही थी उसने यह सुनिश्चित किया कि मस्जिद का गेट फैजाबाद कोर्ट के आदेश के एक घंटे के अंदर खुलना चाहिए. विशेष बात यह है कि मस्जिद में घुसने वाले हिंदू पुजारियों के लिए टेलिविजन कैमरों की भी व्यवस्था हुई थी. '

प्रणब मुखर्जी ने अब तक अपने पुराने सहयोगी दिग्विजय सिंह की बातों का खंडन नहीं किया है और ऐसा करने की संभावना भी बहुत कम है. किताब लांच के मौके पर उन्होंने इशारा किया था कि किताब में किए गए दावे वहीं है जो वे कर सकते हैं बाकि उनके साथ 'दफन' हो जाएगा.

हालांकि, दिग्विजय सिंह के द्वारा उनके एक विचार को चुनौती देना इस बात की ओर इशारा करता है कि किताब से कांग्रेस को थोड़ी परेशानी हुई है.

First published: 1 February 2016, 8:00 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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