Home » इंडिया » Unused land, failed targets & real estate scams: the great SEZ racket reaches SC
 

कैग ने हटाई सेज़ की चादर, रियल एस्टेट के धंधे में तब्दील हुई योजना

आकाश बिष्ट | Updated on: 12 January 2017, 8:32 IST
(फ़ाइल फोटो )

भारत सरकार की विशेष आर्थिक ज़ोन (सेज) नीति अतिरिक्त आर्थिक गतिविधियों, रोज़गार के अवसर पैदा करने और आधारभूत सुविधाओं के विकास सहित अपने सभी लक्ष्य हासिल करने के मामले में बुरी तरह विफल साबित हुई है.  

सेज इसके विपरीत ऐसे कई प्राइवेट डेवलपर्स के लिए फायदे का धंधा साबित हो रहा है, जिन्होंने लोन ले रखा है और जमीन गिरवी रख दी है. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने सेज नीति पर टिप्पणी करते हुए पूछा था कि गरीब किसानों से ली गई जमीन का सौदा कैसे किया जा सकता है. कैसे इन जमीनों को बाजार की कीमतों पर बेच कर रियल एस्टेट का रूप दिया जा रहा है. 

इस नीति के तहत लाखों को रोजगार देने का वादा किया गया था जो पूरी तरह से झूठा सिद्ध हुआ है. इससे भी बड़ी निराशाजनक बात यह है कि इसकी स्थापना प्रस्तावित लक्ष्य से बहुत ही कम है. कैग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए हैदराबाद के एक एनजीओ ‘सेज फार्मर्स प्रोटेक्शन एंड वेलफेयर एसोसिएशन' ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके मांग की है कि देश भर में सेज के नाम पर अधिगृहित की गई गरीब किसानों की 4,842 हेक्टेयर जमीन का 90 फीसदी हिस्सा लौटा दिया जाए.

चीफ़ जस्टिस ने किया तलब

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश जेएस खेहर ने याचिकाकर्ताओं की इस मांग पर कई राज्य सरकारों से जवाब मांगा है. याचिका में कहा गया है कि अधिगृहीत की गई भूमि में से 90 फीसदी जमीन का कोई उपयोग नहीं किया गया. यह यूं ही बेकार पड़ी है.

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि सेज के लिए ली गई जमीन खाली पड़ी है. रियल एस्टेट जैसे दूसरे तरह के उपयोग के लिए हस्तांतरित की जा रही है और इसके तहत रोजगार सृजन की कोई कोशिश भी नहीं की जा रही. याचिका में इस बात की ओर भी ध्याना दिलाया गया है कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में आदिवासियों, दलितों और किसानों से हथियाए गए सेज में स्वीकृत भूखंड प्राइवेट बिल्डरों द्वारा काम में लिए जा रहे हैं.

सेज़ या रियल एस्टेट का धंधा

संसदीय समिति (वाणिज्य) ने भी सेज की उपयोगिता का आकलन करते हुए कहा है कि सेज की आड़ में रियल एस्टेट कारोबार खूब पनप रहा है. संसदीय समिति ने दावा किया कि जमीन तो सेज के लिए अधिगृहीत की गई है लेकिन यहां अभी तक कोई उद्योग नहीं लगे हैं बल्कि किसानों की उपजाऊ भूमि को बिना किसी असल विकास के ‘कमाऊ भूमि’ में बदला जा रहा है.

कैग ने पहले भी सेज नीति की आलोचना करते हुए कहा था कि सेज में आई जमीनों पर रियल एस्टेट प्रोजेक्ट बना कर बड़ा मुनाफा कमाया जा रहा है. साथ ही यह भी कहा कि रोजगार सृजन, निर्यात और आर्थिक गतिविधियों संबंधी आंकड़े भी बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए और उनका समुचित रूप से सत्यापन नहीं किया गया. 

कैग ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि छह राज्यों की करीब 5,402.22 हेक्टेयर (14 फीसदी) जमीन को चिन्हित कर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए परिवर्तित कर दिया गया है, जो कि सेज नीति के नियमों के खिलाफ है. साथ ही यह भी देखा गया कि चिन्हित जमीनों को कुछ सालों तक ज्यों का त्यों रखा गया ताकि जमीनों की कीमतें बढ़ने पर ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके.

कैग की रिपोर्ट अनुसार, याचिका में दावा किया गया है कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में 11 बिल्डरों ने सेज की जमीन गिरवी रख कर 6,309.53 करोड़ का लोन उठा लिया. इसमें से उन्होंने 2,211.48 करोड़ रूपए यानी 35 फीसदी का इस्तेमाल तो सेज को छोड़कर दूसरे कामों में कर लिया क्योंकि सेज में तो कोई काम होता नजर नहीं आया.

याचिका में यह भी कहा गया कि इन निजी बिल्डरों द्वारा सेज की जमीन को गिरवी रख कर लोन उठाना सेज के नियमों के खिलाफ है. 

सेज़ के नाम पर टैक्स रियायत

इसके अलावा कैग की रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा यह हुआ कि कई मामलों में नियमों के खिलाफ जा कर टैक्स में छूट दी गई. 1,150.06 करोड़ रूपए की तो कर में छूट दी गई और इसी मामले में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों के कुप्रबंधन के चलते 27,130.98 करोड़ रूपए के टैक्स का नुकसान हुआ है. 

इन परिस्थितियों में रोजगार सृजन की बात तो भूल ही जाइए, क्योंकि सेज के लिए अधिगृहीत 4,842 हेक्टेयर भूमि के 90 फीसदी भाग का तो समुचित उपयोग ही नहीं हुआ. कैग अधिकारियों ने एक दर्जन इकाईयों का जायजा लिया तो पाया कि 12.47 लाख रोजगार सृजन के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 42,000 ही रोजगार दिए गए. कैग का कहना है कि यह कम से कम 93 फीसदी कम है.’’

याचिका में विशाखापत्तनम सेज का हवाला देते हुए कहा गया कि यहां प्रस्तावित रोजगार के अवसरों के बदले काफी कम रोजगार दिया गया; जबकि निवेश जरूरत से अधिक किया गया. इसलिए सेज के तहत विकास और रोजगार सृजन के सारे दावे गलत साबित हुए.

काउंसिल ने भी विफ़ल बताया

यहां तक कि भारत से निर्माण या उत्पादन संबंधी निर्यात भी काफी कम हुआ है. वाणिज्य मंत्रालय ने सेज नीति के लागत-लाभ संबंधी विश्लेषण के लिए इंडियन काउन्सिल फॉर रीसर्च ऑन इंटरनेशनल इकॉनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) का गठन किया है. 

आईसीआरआईईआर को देश की विदेश व्यापार नीति और नियामक रूपरेखा के अनुसार काम हो रहा है या नहीं; इस बात की देख-रेख का जिम्मा भी सौंपा गया है. साथ ही भारत और दूसरे देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौतों के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि और उसका सेज पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करने का काम सौंपा गया है. 

काउन्सिल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि सेज निर्यात लक्ष्य हासिल करने में भी विफल रहा है. ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया कि वाणिज्य मंत्रालय द्वारा सेज नीति के प्रोत्साहन के लिए रोजगार सृजन, निर्यात और आर्थिक गतिविधियों संबंधी आंकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए हैं. इनका सही सत्यापन नहीं किया गया.

इन सबके मद्देनजर याचिका में मांग की गई है कि सेज मालिकों पर अनुबंध के तहत निर्धारित ड्यूटी नहीं निभाने के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए, क्योंकि इसी वजह से रोजगार के अवसर नहीं मिले और बेरोजगारी बढ़ी है. याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सेज मालिकों द्वारा सेज के नियमों का उल्लंघन करने और लोन के पैसे का दुरूप्योग करने संबंधी मामलों की सीबीआई जांच की जाए.

First published: 12 January 2017, 8:32 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी