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यूपी 2017: यह तय है कि कांग्रेस की उम्मीद सिर्फ प्रियंका हैं

अतुल चंद्रा | Updated on: 6 July 2016, 7:16 IST

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सत्यदेव त्रिपाठी के हवाले से रविवार को किए गए एक ट्वीट ने पार्टी के खेमे में काफी उत्तेजना पैदा कर दी. ट्वीट में कहा गया कि प्रियंका गांधी वाड्रा 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए राज्यभर में 150 रैलियों को संबोधित करेंगी. हालांकि, अभी तक इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया है कि क्या प्रियंका पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार होंगी.

कहा जा रहा है कि सत्यदेव त्रिपाठी के अनुसार प्रियंका द्वारा प्रदेश के इस सिरे से उस सिरे तक कोने-कोने में रैलियों को संबोधित करने की संभावना ने कार्यकर्ताओं में उत्साह भर दिया है.

पार्टी के महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने न तो इस बयान की पुष्टि की और न ही इनकार किया.

प्रियंका के पक्ष में माहौल बनाने वालों में पार्टी के 620 में से 600 ब्लॉक प्रमुख शामिल हैं

लखनऊ में एक होटल में एक इफ्तार पार्टी के बाद मीडिया से बात करते हुए आजाद ने कहा कि प्रियंका चुनाव अभियान की अगुवाई करेंगी या नहीं, इस संबंध में निर्णय उचित समय आने पर लिया जाएगा.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अम्मार रिजवी ने भी आजाद की इफ्तार पार्टी में भाग लिया था. उन्होंने भी चुनाव अभियान की अगुआई प्रियंका द्वारा करने के महत्व पर जोर देते हुए पार्टी आलाकमान को पत्र लिखा था. उन्होंने कहा, "निर्णय ले लिया गया है, लेकिन यह कहना कि वह 150 रैलियों को संबोधित करेंगी या 250 रैलियों में जाएंगी, यह राजनीतिक रूप से सही नहीं होगा."

चुप्पी साधे हुए

त्रिपाठी ने बाद में प्रियंका के बारे में कुछ भी कहने से इनकार किया है, लेकिन पार्टी के एक और सूत्र ने कहा कि इस मुद्दे पर निर्णय पहले ही ले लिया गया था. सूत्र ने कहा कि इसकी औपचारिक घोषणा उस समय की जाएगी, जब सही समय आएगा.

सूत्रों ने कहा कि प्रदेश में पार्टी नेतृत्व के बदलने के बाद इस संबंध में निर्णय लिया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप माथुर को भी बदला जा सकता है.

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आगामी चुनावों में प्रियंका की क्या भूमिका होनी चाहिए, उस पर पार्टी दोराहे पर खड़ी नजर आ रही है. पार्टी में एक धड़े का मानना है कि प्रियंका अकेले दम पर उत्तर प्रदेश में पार्टी की किस्मत बदल सकती हैं. वहीं राज्य के पूर्व प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री ने इस बात को खारिज कर दिया कि प्रियंका मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में उभर सकती हैं.

नेताओं का चुनाव

प्रियंका के पक्ष में माहौल बनाने वालों में पार्टी के 620 में से 600 ब्लॉक प्रमुख शामिल हैं, जो प्रियंका को एक मजबूत नेता के रूप में और पार्टी के तुरुप के पत्ते के रूप में देखते हैं. उनकी राय है कि प्रियंका गांधी का वक्तृत्व और संगठनात्मक कौशल पहले ही अमेठी और रायबरेली में साबित हो चुका है.

प्रियंका ने अब तक खुद को अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल के संसदीय क्षेत्रों के प्रबंधन तक ही सीमित रखा है. लेकिन अब उन्हें ही कांग्रेस की एकमात्र उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है.

कथित तौर पर राजनीति में प्रवेश और चुनाव लड़ने की प्रियंका की कोई योजना नहीं है

पार्टी के चुनाव अभियान की अगुआई के लिए प्रियंका के पक्ष में आवाजें तब से अधिक जोर पकड़ने लगीं, जब से प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की रणनीति का प्रभार संभाला है.

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कथित तौर पर राजनीति में प्रवेश और चुनाव लड़ने की प्रियंका की कोई योजना नहीं है. यही कारण है कि कांग्रेस उनको अपने मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश नहीं कर रही है. लेकिन पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करना एक अलग मामला है.

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के एक विकल्प के रूप में सुझाया गया है कि अगर प्रियंका राजनीति में प्रवेश नहीं करने पर दृढ़ रहती हैं तो शीला पर दांव खेला जा सकता है.

खुद को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किए जाने के लिए प्रियंका सहमत हों या न हों, लेकिन जिस तरह से उनका नाम उभर कर आया है और इस पर जिस तरह की गोपनीयता बरती जा रही है, इसने सभी राजनीतिक हलकों में कांग्रेस को चर्चा का विषय बना दिया है.

निराशाजनक समय

2017 के चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इस नाते, ये प्रशांत किशोर ही थे, जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर यह प्रभाव डाला है कि इस बार करो या मरो की लड़ाई में प्रियंका को परिवार की सीटों (अमेठी और रायबरेली) तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए.

चुनाव प्रचार के लिए जो दूसरे नाम डिमांड में हैं, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व टेस्ट कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन शामिल हैं.

भाजपा की तरह, कांग्रेस भी एक ऐसे उम्मीदवार की खोज में है, जिसे राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जा सके.

भाजपा यह निर्णय नहीं कर पा रही है कि उसका मुख्यमंत्री पद का दावेदार ब्राह्मण होना चाहिए, या ठाकुर या फिर दलित

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भाजपा यह निर्णय नहीं कर पा रही है कि उसका मुख्यमंत्री पद का दावेदार ब्राह्मण होना चाहिए, या ठाकुर या फिर दलित. ऐसे में कांग्रेस में शीला दीक्षित का नाम भी तभी उभरकर आया जब यह महसूस किया गया कि सपा, बसपा और भाजपा द्वारा ब्राह्मणों को दरकिनार किया जा रहा था.

शीला दीक्षित को रीता बहुगुणा जोशी की तुलना में अधिक करिश्माई और प्रमोद तिवारी, से अधिक विश्वसनीय माना जाता था. बताते चलें कि प्रमोद तिवारी को सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ उनकी करीबियों के लिए जाना जाता है.

वाराणसी से एक और ब्राह्मण नेता राजेश मिश्रा भी एक विकल्प थे, लेकिन यह माना गया कि उनका चयन हुआ तो एक और प्रमुख नेता अजय राय इसका विरोध करेंगे.

यूपी चुनाव: प्रियंका गांधी सक्रिय राजनीति के लिए राजी!

कांग्रेस और भाजपा अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों के नाम का खुलासा करने के लिए इंतज़ार का खेल खेल रही हैं. ऐसे में प्रियंका द्वारा राज्य के अन्य हिस्सों में भी चुनाव प्रचार करने की खबर निश्चित रूप से पार्टी के कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेगी.

First published: 6 July 2016, 7:16 IST
 
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