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उत्तर प्रदेश: 2017 की चौपड़ पर दल-बदलू बने अहम मोहरे

अनिल के अंकुर | Updated on: 20 April 2016, 9:14 IST
QUICK PILL
  • आने वाले महीनों में दल-बदल का दृश्य उत्तर प्रदेश में और रंगीन होगा. दल बदलने वाले और दूसरी जिताऊ पार्टी में शामिल होने वाले वे लोग हैं जो या तो अपनी पार्टी में उपेक्षित हैं अथवा उन्हें यह महसूस हो रहा है कि वे उस पार्टी से नहीं जीत पाएंगे जिससे उन्हें टिकट मिला है.
  • विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है. मगर मोहरों को अपने पाले में लाने के जोड़-जतन तेज हो गए हैं. यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक खेल है जिसे राजनीतिक पार्टियां चुनावों से पहले खूब आजमाती हैं.

विधानसभा चुनाव की तारीख करीब आते ही राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल शुरू हो गया है. यह आधिकारिक रूप से चुनावी प्रक्रिया में घुसने के पहले की उठापटक है जिसमें उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दल एक दूसरे के नेताओं को तोड़ने-फोड़ने के गंभीर काम में लग गए हैं. 

दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ कर ये दल प्रदेश की जनता को ये संदेश देना चाहते है कि उनके पक्ष में लहर चल रही है लिहाजा अन्य दल के नेता उनकी ओर भाग रहे हैं.

पिछले दो दिनों में इस तरह की दो घटनाएं हो चुकी हैं. शुरुआत सपा ने की और जवाब भाजपा ने दिया. सपा की शुरूआत जाने माने कवि गोपाल दास नीरज की बेटी से हुई. उनकी बेटी कुंजलिका शर्मा आगरा में विश्व हिन्दू परिषद में अहम पद पर थीं. वे भाजपा के टिकट पर आगरा की पार्षद भी थीं.

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पिछले दिनों सपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी बनाए गए शिवपाल सिंह यादव ने लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस करके इस बात की घोषणा की कि कुंजलिका सपा में शामिल हो गई हैं और वे आगरा उत्तरी सीट से चुनाव लड़ेंगी. 

यह भाजपा के लिए शर्मसार करने वाली स्थिति थी. शिवपाल ने साथ में इलाहाबाद युनिवर्सिटी की छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह के भी सपा में शाममिल होने की घोषणा की.   

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भाजपा ने अगले ही दिन इसका जवाब दे दिया. सपा के आगरा ग्रामीण विधानसभा सीट से उम्मीदवार घोषित की गई हेमलता दिवाकर को भाजपा में शामिल कराकर सत्ताधारी समाजवादी पार्टी की जबर्दस्त किरकिरी करवाई. पार्टी का टिकट पाई उम्मीदवार ने पार्टी छोड़ दी.

टिकट की उम्मीद में लोग बदल रहे हैं दिल और दल

आने वाले महीनों में दल-बदल का यह दृश्य उत्तर प्रदेश में और रंगीन होगा. दल बदलने वाले और दूसरी जिताऊ पार्टी में शामिल होने वाले वे लोग हैं जो या तो अपनी पार्टी में उपेक्षित हैं अथवा उन्हें यह महसूस हो रहा है कि वे उस पार्टी से नहीं जीत पाएंगे जिससे उन्हें टिकट मिला है.

दल बदल की संख्या दिन प्रतिदिन और बढ़ने की संभावना इसलिए भी है क्योंकि कोई भी पार्टी अपने सभी टिकट आकांक्षियों को संतुष्ट नहीं कर सकती है. लिहाजा असंतुष्टों की बड़ी जमात हर चुनाव से पहले इस तरह के खेल करती है.

पिछले विधानसभा चुनाव से पहले सुल्तानपुर जिले की लंभुआ विधानसभा सीट इस तरह के फेरबदल की मिसाल बन गई थी. इस बार की तरह तब भी सपा ने अपने उम्मीदवारों के टिकट चुनाव से साल भर पहले घोषित कर दिए थे. लेकिन पार्टी के भीतर मचे घमासान के कारण चुनाव आते-आते लंभुआ सीट से सपा ने कुल सात उम्मीदवारों का टिकट बदला.

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विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है. मगर मोहरों को अपने पाले में लाने के जोड़-जतन तेज हो गए हैं. यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक खेल है जिसे राजनीतिक पार्टियां चुनावों से पहले खूब आजमाती हैं.

सपा ने हाल ही में आगरा की एक फायरब्रांड नेता व फतेहपुर के एक अखाड़ेबाज को भाजपा से अपने पाले में लाकर जो शह दी थी, तो भाजपा ने दो दिन के भीतर उसका बदला भी ले लिया. 

शह और मात के इस खेल में कार्यकर्ताओं के पार्टी छोड़ने का सबसे ज्यादा असर सत्ताधारी पार्टी के ऊपर होता है. जानकारों की मानें तो मौजूद घटनाक्रम समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही बेचैनी का संकेत है.

विरोध के कारण कटे कइयों के टिकट

समाजवादी पार्टी ने 2012 में हारी हुई 143 सीटों पर मार्च महीने में ही प्रत्याशी घोषित कर विपक्षी दलों पर बढ़त बनाने का प्रयास किया. हालांकि यह सूची जारी होते ही कार्यकर्ताओं का विरोध भी शुरू हो गया. सहारनपुर से प्रत्याशी बनाये गए शहनवाज राणा का नाम कुछ घंटों में कट गया.

वाराणसी, फतेहपुर, बांदा, बस्ती, महराजगंज में प्रत्याशियों का विरोध सड़क पर आ गया जिसे थामने के प्रयास नाकाम होने पर पार्टी ने बांदा, अयाहशाह, खागा, बांदा, बिंदकी और पनियरा के प्रत्याशी आनन फानन में बदल दिए गए. मगर कई जिलों में प्रत्याशियों का विरोध अभी भी जारी है. इसी दौरान सपा और भाजपा  के बीच मनोवैज्ञानिक युद्ध भी शुरू हो गया.

सपा ने किया नीति में परिवर्तन

यह भी दिलचस्प संयोग है कि जिन कुंजलिका शर्मा को सपा आगरा में अपने पाले में लायी है वे हाल ही में आगरा में भड़काऊ बयान देने के लिए चर्चा में थीं. आगरा मेें एक विहिप कार्यकर्ता की हत्या के विरोध में आयोजित शोकसभा में कुंजलिका के साथ भाजपा के केंद्रीय राज्य मंत्री रामशंकर कठेरिया पर भी भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगा था.

आगरा ग्रामीण की प्रत्याशी हेमलता द्वारा टिकट त्याग कर भाजपा का दामन थामने के बाद समाजवादी पार्टी ने घोषित प्रत्याशियों की कार्यप्रणाली पर न सिर्फ नजर टिका दी है बल्कि उनके दूसरे दलों से रिश्तों का आकलन करना भी शुरू कर दिया है. जाहिर है पार्टी इस तरह के किसी और शर्मनाक स्थिति से बचना चाहती है.

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बदलते समीकरणों के बीच सपा ने अपनी रणनीति में भी परिवर्तन किया है. ध्यान रहे कि इससे पहले विधान परिषद के चुनाव में सहारनपुर से शहनवाज राणा को प्रत्याशी घोषित किया था, मगर वह नामांकन दाखिल करने से ठीक पहले ही बीमार हो गए. 

इसी तरह बांदा की जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए सपा की घोषित प्रत्याशी दीपा गौर ने चुनाव लडने से ही इनकार कर दिया. गोरखपुर और सीतापुर में पार्टी के नेताओं ने घोषित प्रत्याशी के विरुद्ध बगावत कर जीत हासिल थी. 

सपा के सूत्र कहते है कि राणा को इस बात का अंदाज था कि उनकी स्थिति अच्छी नहीं है और पार्टी उन्हें बदलने जा रही है, इसीलिए वे भाजपा  की गोद में जाकर बैठ गए.

इन पर है नेतृत्व की निगाहें

उम्मीदवारों की शुरुआती उठापटक से सपा चौकन्ना हो गई है. उसने अयाहशाह से पार्टी उम्मीदवार रीता प्रजापति, खागा (सु) से विनोद पासवान, बांदा से कमल सिंह मौर्य, मड़िहान से रविन्द्र बहादुर पटेल, बस्ती से उमाशंकर पटवा, आगरा दक्षिण से डॉ.रोली मिश्र, पनियरा से श्रीमती सुमन ओझा, आगरा (उत्तर) से कुंजलिका शर्मा आदि पर विशेष निगाह रखना शुरू कर दिया है. 

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हाल ही में सपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी बनाए गए शिवपाल सिंह यादव ने कहा, "यूपी में प्रत्याशियों का चयन उनके क्षेत्र से आई रिपोर्ट के आधार पर किया जा रहा है. जो टिकटें बदली गईं, उनकी रिपोर्ट अच्छी नहीं आई  थी. अभी भी कुछ और बदलाव होने हैं, लेकिन इतजार करना होगा.”

First published: 20 April 2016, 9:14 IST
 
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