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उत्तर प्रदेश भाजपा: हिंदुत्व का नारा और अति पिछड़े का सहारा

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • बिहार में नीतीश कुमार अति पिछड़ों के मसीहा के तौर पर देखे जाते हैं. भाजपा ने इस वोट बैंक में सेंध मारने की कोशिश की लेकिन वो नाकामयाब रहे.
  • भाजपा का आकलन है कि अगड़ी जातियों में उनके पास एक अच्छी संख्या है. साथ ही शहरी मतदाता भी उनके साथ खड़ा होगा. 

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र भारतीय जनता पार्टी की रणनीति में दो चीज़ें अहम हैं. एक है जाति और दूसरा है हिंदुत्व. एक ओर जातियों के गणित को सही करना है और दूसरी ओर ऐसी जातियों को हिंदुत्व के नारे से लुभाना भी है जो अन्य राजनीतिक पार्टियों का वोट बैंक मानी जाती हैं.

इस तरह रणनीति मूल रूप से जातियों को जोड़ो और तोड़ो के सिद्धांत पर आधारित है. इसे ज़मीन पर अमलीजामा पहनाने में सबसे अहम भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रहने वाली है. संघ सोशल इंजीनियरिंग के इस नए फार्मूले को राज्य में ज़मीनी तौर पर लागू करने की दिशा में सक्रिय हो चुका है.

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दरअसल, भाजपा की उत्तर प्रदेश के लिए जो रणनीति बनती नज़र आ रही है वो बिहार के उनके प्रयोग से मिलती जुलती है. बिहार में भाजपा की नज़र अति पिछड़ा वर्ग के वोट पर थी और यही रणनीति भाजपा उत्तर प्रदेश में अपनाने जा रही है.

हालांकि यह फार्मूला बिहार में फेल हो गया लेकिन पार्टी का आकलन है कि दोनों राज्यों की स्थितियां भिन्न हैं और इसलिए इस रणनीति को लागू करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए.

अति पिछड़ों पर नज़र

बिहार में नीतीश कुमार अति पिछड़ों के मसीहा के तौर पर देखे जाते हैं. भाजपा ने इस वोट बैंक में सेंध मारने की कोशिश की लेकिन वो नाकामयाब रहे. लेकिन उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ा का ऐसा कोई मसीहा नहीं है. इसलिए भाजपा को उत्तर प्रदेश से ज़्यादा उम्मीद है.

उत्तर प्रदेश की आबादी का आधा हिस्सा पिछड़ा वर्ग का है. इसमें 150 से अधिक जातियां, उपजातियां हैं. इसमें एक बड़ी तादाद यादव, कोइरी, लोध और कुशवाहा जातियों की है. यादव बड़ी तादाद में हैं और उनके वर्चस्व वाली पार्टी की सरकार सूबे में है. 

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बाकी की जातियों के लिए अपनी पहचान और वर्चस्व की लड़ाई का सवाल बना ही रहता है. इन जातियां की तादाद सूबे के कुल मतदाताओं का एक चौथाई से अधिक है.

इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अपनी राज्य की टीम में ऐसी जातियों को प्रतिनिधित्व दिया है जो अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं. आने वाले दिनों में जो नए चेहरे अहम जिम्मेदारियों के साथ दिखाई देंगे उनमें भी एक अच्छी संख्या इन जातियों की होगी.

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भाजपा का आकलन है कि अगड़ी जातियों में उनके पास एक अच्छी संख्या है. साथ ही शहरी मतदाता भी उनके साथ खड़ा होगा. दलितों में एक सीमा से अधिक सेंधमारी संभव है नहीं और अधिकतर दलित वोट अपनी पारंपरिक पार्टी, बसपा के साथ जाता दिखाई दे रहा है. 

ऐसे में अपनी वोटों की गिनती को बढ़ाने के लिए भाजपा की नज़र इस एक चौथाई पिछड़ा वर्ग पर है और अगर वो इसे अपने पक्ष में ला पाती है तो पार्टी एक मज़बूत चुनौती बनकर सूबे में उभरेगी.

हिंदुत्व का नारा

दूसरी उम्मीद हिंदुत्व के नारे से है. हिंदुत्व का नारा दो तरह से लाभ पहुंचाएगा. एक तो यह कि अगड़े वोटों को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नारे के सहारे एकत्रित रखने की कोशिश की जाएगी. इससे कांग्रेस और बाकी पार्टियों की ओर इनके संभावित झुकाव को भाजपा और संघ रोक पाएंगे.

भाजपा की तरह ही कांग्रेस भी अगड़ी जातियों के बीच अपने पुराने वर्चस्व को खोजने की कोशिश कर रही है. ऐसे में भाजपा को अपना मूल वोटर एकत्रित रखना है और हिंदुत्व, राष्ट्रवाद जैसे विषय इसमें सहायक होंगे.

दूसरा लाभ यह है कि बाकी ऐसी जातियां, जिन्हें पहले से ही किसी पार्टी विशेष के वोटबैंक के तौर पर देखा जाता है, उनमें सेंधमारी की कोशिश इसी नारे के माध्यम से हो सकती है. 

भाजपा से भी कहीं अधिक संघ के लिए उत्तर प्रदेश में मज़बूत होना उनकी रणनीति का अहम हिस्सा है

गाय, गंगा, गायत्री के साथ-साथ अल्पसंख्यकों के साथ तुष्टिकरण की नीति और इससे "पिछड़ों को होने वाले नुकसान” के बारे में पिछड़ी और दलित जातियों को बताया जाएगा. इस प्रकार से भाजपा अन्य जातियों के वोटों को अपनी ओर आकर्षित कर सकेगी.

अति पिछड़ों और हिंदुत्व के इस नारे को ज़मीन पर उतारने में सबसे अहम भूमिका इस वक्त संघ की है. संघ पिछले कुछ समय से राज्य के दलितों के बीच काम कर रहा है और देवरस की सोशल इंजीनियरिंग को आगे ले जाने के लिए संघ दत्तात्रेय होसबोले को उत्तर प्रदेश का प्रभार दे चुका है.

भाजपा से भी कहीं अधिक संघ के लिए उत्तर प्रदेश में मज़बूत होना उनकी रणनीति का अहम हिस्सा है और इसके लिए प्रयास तेज़ किए जा चुके हैं. संघ की इस रणनीति का सीधा लाभ भाजपा को उत्तर प्रदेश में मिलेगा, ऐसा भाजपा का मानना है.

ग़रीब, पिछड़े, दलितों के पास भाजपा को अपना अगला नेवाला दिख रहा है

नए फ़ार्मूले को ध्यान में रखकर खुद प्रधानमंत्री भी अपनी रणनीति बनाते नज़र आ रहे हैं. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के नोएडा में प्रधानमंत्री ने 5 हज़ार ई-रिक्शा वितरित किए. लाभार्थियों में बड़ी तादाद दलितों और पिछड़ों की थी. यही फार्मूला प्रधानमंत्री 1 मई की अपनी बलिया और बनारस यात्रा के दौरान दोहराने जा रहे हैं.

ग़रीब, पिछड़े, दलितों के पास भाजपा को अपना अगला नेवाला दिख रहा है. अगड़े उसके साथ हैं, ऐसा उसका मानना है. जीत के लिए इस समीकरण पर काम किए बिना भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में संभावनाएं कम, आशंकाएं ज़्यादा हैं.

देखना यह है कि अपने इस नारे को भाजपा सूबे में कितना साकार कर पाती है. बिहार का अनुभव कड़वा था. उत्तर प्रदेश में क्या बिहार की पुनरावृत्ति होगी या हिंदुत्व और पिछड़ों की राजनीति कमल खिलाएगी, यह चुनाव के नतीजे तय करेंगे.

First published: 2 May 2016, 7:45 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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