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माफियाओं की खुशी के लिए गंगा को बनारस से दूर ले जायेगी यूपी सरकार?

आवेश तिवारी | Updated on: 28 July 2016, 7:53 IST

वाराणसी में गंगा नदी के प्रवाह द्वारा घाटों के कटाव का अध्ययन करने के लिए बनाई गई उत्तर प्रदेश सरकार की उच्च स्तरीय कमेटी ने चौंका देने वाली रिपोर्ट भेजी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा के तेज प्रवाह से घाटों का अस्तित्व संकट में हैं और इसे रोकने के लिए गंगा के प्रवाह की दिशा बदलना जरुरी है.

कमेटी की इस रिपोर्ट पर कछुआ पुनर्वास परियोजना ने कड़ा ऐतराज जताया है और बिना किसी इजाजत के सर्वेक्षण किये जाने को गंभीर गड़बड़ी बताते हुए कानूनी कार्रवाई करने की बात कही है. परियोजना के एक अधिकारी का कहना है कि अगर कमेटी की सिफारिशों को माना गया तो गंगा बनारस से दूर चली जायेगी.

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गौरतलब है कि राज्य सरकार के आदेश पर गठित की गई कमेटी ने प्रवाह को कम करने के लिए नदी के बीच में निर्माण कराने के लिए अधययन कराने की सिफारिश भी की है, साथ ही गंगा में मौजूद कछुआ सेंचुरी को अन्यत्र स्थांतरित करने का प्रस्ताव भी दिया है.

कछुआ सेंचुरी को ही खत्म करना चाहती है सरकार

गंगा मे मालवाहक जहाज चलाये जाने की केंद्र सरकार की कोशिशों के बीच यूपी सरकार के नए मंसूबों का पता चलता है. गंगा से हो रहे कटान को लेकर राज्य सरकार के आदेश पर वाराणसी के जिलाधिकारी की अध्यक्षता में वर्ष 2013 में एक कमेटी का गठन किया गया था. इस कमेटी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय समेत प्रदेश के अन्य सरकारी इंजीनियरिंग एजेंसियों के विशेषज्ञ शामिल थे.

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कमेटी ने गंगा को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की. उस रिपोर्ट के आधार पर जिलाधिकारी वाराणसी द्वारा वन विभाग को फरवरी 2014 में एक चौंका देने वाला पत्र लिखा गया. पत्र में कहा गया, 'गंगा नदी में रामनगर से लेकर राजघाट तक कछुआ सेंचुरी का निर्धारण गलत था, यह वह जोन है जहां सर्वाधिक हलचल रहती है ऐसी जगह पर किसी वन्य जीव के संरक्षण की कल्पना नहीं की जा सकती. सेंचुरी का कुप्रभाव सामने आने लगा है, अब इसे स्थानांतरित करने का प्रयास चल रहा है जो एक अच्छी पहल साबित होगी.'

वन विभाग ने कहा माफियाओं के दबाव में की जा रही सिफारिश

कमेटी की सिफारिशों के खिलाफ वन विभाग के अंतर्गत आने वाले कछुआ पुनर्वास परियोजना के प्रोजेक्ट अधिकारी ने प्रधानमंत्री कार्यालय का संदर्भ देते हुए अपने उच्चाधिकारियों को एक पत्र लिखा है. पत्रिका के पास मौजूद पत्र में इस पूरी कवायद को गंभीर बताते हुए कहा गया है कि बिना मुख्य जंतु प्रतिपालक से इजाजत के गंगा नदी में जिस तरह से सर्वेक्षण किया गया है वो पूरी तरह से गैरकानूनी है.

पत्र में कहा गया है कि खनन माफिया और स्वार्थी तत्व गंगा में मौजूद कछुआ सेंचुरी को लेकर दुष्प्रचार कर रहे हैं. पत्र में यह भी कहा गया है कि स्वार्थी तत्वों की निगाह मातेश्वरी गंगा के नाम से दर्ज उस हजारों एकड़ की राजस्व भूमि पर है जो कछुआ सेंचुरी का हिस्सा है.

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वाराणसी के परियोजना अधिकारी के मुताबिक गंगा नदी के प्रवाह से गंगा के बाएं किनारे पर बने घाटों के कटाव की बात पूरी तरह से भ्रामक और निराधार है. वास्तविकता यह है कि विगत 10-15 वर्षों के अन्दर पक्के घाटों के अनियंत्रित एवं अविवेकपूर्ण विस्तार से बाएं तट पर सिल्ट जमा हुई है.

गूगल अर्थ ने झुठलाया कमेटी के दावों को

वन विभाग के इस दावे की पुष्टि गूगल अर्थ भी करता है. अस्सी घाट की दो अलग-अलग वर्षों (2005 और 2008) की तस्वीरों से यह बात साफ हो जाती है. रविदास घाट पर पक्के निर्माण से वहां स्थिति बेहद खराब हुई है. वन विभाग का कहना है कि कार्यदायी संस्था ने रविदास घाट पर बिना पर्यावरण अनुमति के पक्का निर्माण करा लिया.

गौरतलब है कि पीएम मोदी भी इस जगह पर कई बार आ चुके हैं. महत्वपूर्ण है कि नवम्बर 2011 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गंगा नदी के किनारे किसी भी किस्म के अतिक्रमण को गंभीर बताते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि ऐसे किसी भी निर्माण की जवाबदेही सीधे सरकार की होगी.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तरह से कमेटी द्वारा गंगा में बालू खनन की इजाजत देने की सिफारिश की गई है उसके गंभीर परिणाम सामने आयेंगे. इससे नदी की मुख्य धारा जो गंगा के घाटों को स्पर्श करते हुए निकलती है बनारस से दूर चली जाएगी.

परियोजना अधिकारी ओपी सिंह ने हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट को खारिज करते हुए "गंगा रिवर बेसिन इनवायर्नमेंट प्लान के तहत अग्रिम कारवाई करने की इजाजत मांगी है. साथ ही साथ बिना अनुमति के सर्वेक्षण किये जाने के लिए भी कानूनी कारवाई करने की मांग की है.

First published: 28 July 2016, 7:53 IST
 
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