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यूपी: दहेज की मांग पूरी न होने पर युवक ने व्हाट्स एप पर पत्नी को दिया तलाक

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 August 2016, 22:53 IST
(पत्रिका)

उत्तर प्रदेश में व्हाट्स एप पर तलाक देने का एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है. ये मामला सिद्धार्थनगर जिले का है जहां शहर के करीब महादेवा टाउन के रहने वाले एक युवक फरीद अहमद ने अपनी पत्नी तस्नीम खान को विदेश से व्हाट्स एप पर तलाक लिख के भेज दिया है. तस्नीम के मायके वालों के अनुसार शादी के बाद से ही फरीद के घर वाले दहेज की मांग कर रहे थे.

सिद्धार्थनगर नगर की रहने वाली पीड़िता तस्नीम ने बताया कि मेरी शादी 16 मार्च 2011 को मुहम्मद फ़रीद से हुई थी. फ़रीद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मैथमेटिक्स डिपार्टमेंट से पीएचडी कर रहे थे. शादी के बाद मैं भी उनके साथ रहने के लिए अलीगढ़ चली गई लेकिन एक महीने बाद से ही उन्होंने मारपीट शुरू कर दी. शादी के बाद से ही फरीद के घर वाले दहेज की मांग कर रहे हैं.

तस्नीम ने बताया कि मेरे पति की पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें सऊदी अरब की अल क़सीम यूनिवर्सिटी में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिल गई. सितंबर 2015 में अरब जाने से पहले उन्होंने मुझे दिल्ली के ओखला इलाक़े में मेरे देवर मुहम्मद सगीर के पास ये कहकर शिफ्ट कर दिया कि दो तीन महीने में मुझे भी बुला लेंगे लेकिन कुछ दिन बाद से ही मेरे देवर सगीर ने दहेज की मांग को लेकर मेरी पिटाई शुरू कर दी. 

तस्नीम ने कहा कि जब हालात बद से बदतर हो गए तो मैंने दिल्ली छोड़ दिया और दूसरी तरफ़ पति ने मुझसे बात करनी बंद कर दी. वो न मेरा फोन उठाते और न ही मेरे मैसेज का जवाब देते. फिर ईद के ठीक तीन दिन पहले उन्होंने मुझे व्हाट्स एप पर तलाक़ लिखकर भेज दिया लेकिन मैंने यह तलाक़ कुबूल नहीं किया है बल्कि अदालत से इंसाफ की गुहार लगाई है.

तस्नीम का कहना है कि 2013 में सिद्धार्थनगर पुलिस स्टेशन में उनके पति पर घरेलू हिंसा और मारपीट का मुकदमा दर्ज है इसके बावजूद वह अपना पासपोर्ट बनवाने में सफल रहे जबकि मारपीट का मुकदमा अभी चल रहा है.

इस्लामिक मामलों के जानकार डॉक्टर ज़फरुल इस्लाम कहते हैं कि अगर लड़की ने तलाक़ कुबूल नहीं किया है तो इसके कोई मायने नहीं हैं. कोर्ट में यह मामला एक झटके में ख़ारिज हो जाएगा. देशभर में मुस्लिम समाज के कई धड़े इस तरह के तलाक़ को मान्यता नहीं देते लेकिन कुछ हिस्सों में आज भी ये चलन बरकरार है लेकिन यह तलाक़ कुरआन या शरीयत के मुताबिक नहीं है. लिहाज़ा यह प्रथा गैरइस्लामी भी है. 

First published: 20 August 2016, 22:53 IST
 
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