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यूपी की राजनीति का नया फैक्टर है 'महिला'

पाणिनि आनंद | Updated on: 23 April 2016, 12:35 IST

उत्तर प्रदेश की राजनीति का नया फैक्टर है महिला फैक्टर. अभी तक भले ही किसी दल ने यह वादा न किया हो कि वो एक तिहाई सीटों पर महिलाओं को टिकट देंगा लेकिन महिलाओं के कंधे से राजनीति के निशाने साधने का काम शुरू हो चुका है और कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल इस काम में पीछे रहना नहीं चाहते हैं.

सबसे पहला दल तो बहुजन समाज पार्टी ही है लेकिन उसके लिए महिला का चेहरा नई बात नहीं है. कांशीराम के जाने के बाद से राजनीति और संगठन, दोनों की ही कमान मायावती के पास है. वो राज्य की मुख्यमंत्री रही हैं. महिला और दलित होना उनकी पहचान के दो अहम हिस्से हैं और वो इसका ज़िक्र भी करती आई हैं.

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लेकिन असल सुलगाहट बाकी दलों से देखने को मिल रही है. भाजपा की ओर से स्मृति ईरानी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश किए जाने जैसी ख़बरों को भले ही पार्टी के नेता अभी नकार रहे हों, लेकिन इतना तो तय है कि स्मृति ईरानी की इन चुनावों में महती भूमिका रहने वाली है. स्मृति ईरानी को सामने रखकर भाजपा कई पैंतरे खेलना चाहती है.

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दरअसल, स्मृति अपनी वाकपटुता के सहारे मायावती का तो जवाब बनेंगी ही, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राज्य में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में से एक, रीता बहुगुणा जैसे चेहरों को जवाब देने के लिए भाजपा अपनी इस स्टार प्रचारक को आगे रखेगी.

स्मृति 2014 के लोकसभा चुनाव में अमेठी संसदीय सीट से भाजपा की प्रत्याशी थीं. वो ये चुनाव कांग्रेस पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी से हार गई थीं. लेकिन उन्होंने अमेठी में जमे रहने का वादा किया था. पिछले दो वर्षों के दौरान स्मृति ईरानी अमेठी में कुछ राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं.

अपनी उपस्थिति के बहाने वो दरअसल कांग्रेस के गांधी परिवार के खिलाफ़ मोर्चा खोले रखती हैं. स्मृति प्रभावशाली भाषण देने की कला जानती हैं. उनमें स्टार वैल्यु है और वो अच्छी तरह जानती हैं कि कैसे मोदी और अमित शाह के हितों के अनुरूप भाषण देना है.

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पर कांग्रेस में भीतरखाने और भी तैयारियां हैं. रायबरेली और अमेठी संसदीय सीटों के लिए चुनाव प्रबंधन और सांसदों का कामकाज देखने वाली प्रियंका गांधी खुद को राजनीति से दूर रखती हैं और केवल इन दो संसदीय सीटों तक अपने को सीमित रखती हैं. 

लेकिन माना जा रहा है कि इस बार के विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र पार्टी प्रियंका से और अधिक मदद ले सकती है. सूत्रों के मुताबिक इस बार प्रचार और रणनीति के स्तर पर प्रियंका का दखल राज्य में बढ़ सकता है.

समाजवादी पार्टी ने इसके जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और सांसद डिंपल यादव को और प्रभावी बनाने का मन बनाया है. साथ ही परिवार की अन्य बहुएं भी चुनाव मैदान में दिखाई देंगी. परिवार में महिलाओं का राजनीति में दखल पहले कभी इतना नहीं था जितना इस बार देखने को मिल सकता है.

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इतना ही नहीं, पार्टी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ की अध्यक्ष रिचा सिंह को भी पार्टी में शामिल करा लिया है. पिछले हफ्ते ही उन्हें पार्टी की सदस्यता दी गई और माना जा रहा है कि बहुत सोची समझी रणनीति के पार्टी उन्हें कई मंचों पर उतारेगी. 

प्रगतिशील और वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव वाली रिचा के ज़रिए पार्टी एक मज़बूत महिला आवाज़ तो उतारना ही चाहती है, साथ ही रिचा की महंत आदित्यनाथ के खिलाफ़ लड़ाई को भी पार्टी अपने अल्पसंख्यक वोटों के सामने भुनाएगी.

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के लिए अभी आठ महीनों का वक़्त बाक़ी है लेकिन राजनीतिक दल अभी से चुनावी दंगल में दांव खेलते नज़र आ रहे हैं. और इस बार महिलाएं एक अहम पहलू हैं. दरअसल, महिला वोट की ओर नज़र इसलिए भी है क्योंकि बिहार में हाल ही संपन्न विधानसभा चुनावों में महिला वोट निर्णायक साबित हुआ है और ऐसे में किसी एक पार्टी के किसी एक महिला चेहरे के सापेक्ष बाकी पार्टियां खुद को पीछे नहीं रखना चाहतीं.

2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव केवल पुरुष वर्चस्व और पारंपरिक राजनीतिक दिग्गजों के सहारे ही नहीं, नारीशक्ति के ज़रिए भी कमान संभालता नज़र आएगा.

First published: 23 April 2016, 12:35 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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