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अलीगढ़ हिंसा: सांप्रदायिकता के मुहाने पर उत्तर प्रदेश

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 July 2016, 7:56 IST

छेड़खानी और अंर्तधार्मिक प्रेम संबंधों की घटनाएं चुनावों की देहरी पर खड़े उत्तर प्रदेश का तापमान गर्म रखे हुए हैं. एक तरफ जहां मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में युवा इरशाद को पड़ोसियों द्वारा इसलिये गला दबाकर मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि वह उसकी बहन के साथ प्रेम करता था वहीं दूसरी तरफ अलीगढ़ में अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े कुछ लड़कों ने एक नवविवाहिता के साथ छेड़खानी की. दोनों ही घटनाओं के चलते सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया है.

कवाल में 2013 में भी बिल्कुल ऐसी ही एक घटना हुई थी जिसके चलते हिंसक दंगे हुए थे. उसमें 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी. साथ ही इस घटना के बाद हजारों लोग विस्थपित हो गए थे.

उत्तर प्रदेश में तेज होती सांप्रदायिकता की आंच?

अलीगढ़ और मुजफ्फरनगर, दोनों ही जगहों की घटनाएं हिंदू संगठनों के गढ़े हुए शब्द ‘लव जिहाद’ की परिभाषा में बिल्कुल सटीक बैठती हैं. हालांकि इसे साबित करने के लिये कोई सबूत नहीं है लेकिन हिंदुत्व संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े नवयुवक बहुसंख्यक समुदाय की लड़कियों को अंततः इस्लाम में परिवर्तित करने के इरादे से निशाना बना रहे हैं. उनके इस प्रकार के प्रचार के चलते लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी मुजफ्फरनगर और मेरठ सहित उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में सांप्रदायिक तनाव का माहौल बन गया था.

अलीगढ़ के बाबरी मंडी इलाके में बुधवार की रात से ही माहौल गर्म था जब अपने पति के साथ घर वापस जा रही एक नवविवाहिता के साथ अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ युवकों के एक समूह ने छेड़खानी की थी.

महिला ने आरोप लगाया है कि पुरुषों के इस समूह ने उनका रास्ता रोका और उसे एक सुनसाज जगह पर ले गए. जब इस महिला ने मदद की गुहार लगाई तो फिर पुरुषों का एक समूह इकट्ठा हो गया और उन्होंने उसके पति पर चाकू से हमला बोल दिया.

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एक स्थानीय पुलिस अधिकारी बताते हैं, ‘वहां पर पथराव भी हुआ.’ उन्होंने दावा किया कि स्थानीय प्रशासन द्वारा माहौल को घटना के चंद मिनटों बाद ही नियंत्रण में कर लिया गया. अधिकारी बताते हैं, ‘दो मामले दर्ज किये गए हैं. पहला महिला द्वारा छेड़ाखानी का और दूसरा उसके ससुर द्वारा आगजनी और दंगा करने का.’ इसके अलावा अबतक दो लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.

इस बीच घटना की खबर मिलते ही बीजेपी की स्थानीय इकाई हरकत में आ गई और प्रशासन पर आरोपियों का पक्ष लेने का आरोप लगाया. शुक्रवार को बीजेपी नेताओं और स्थानीय मेयर के नेतृत्व में लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल जिला प्रशासन के आला अधिकारियों से मिला और उन्हें हस्ताक्षरित शपथ पत्र दिये जिनमें उन्होंने लिखा था कि वे जान के खतरे को देखते हुए क्षेत्र में मौजूद अपनी संपत्तियों को बेचकर कहीं और जाने के इच्छुक हैं. इसके अलावा नाटकीय कदम उठाते हुए कई लोगों ने अपने मकान-दुकान इत्यादि पर ‘बिक्री के लिये’ जैसे बोर्ड भी चस्पा कर दिये.

अलीगढ़ की मेयर और बीजेपी नेता शकुंतला भारती कहती हैं, ‘हमारी महिलाओं का सड़कों पर निकलना मुहाल है. सिर्फ एक आरोपी, वह भी जिसने आत्मसमर्पण किया, को गिरफ्तार किया गया है. हम आरोपियों की गिरफ्तारी होने तक अपना विरोध-प्रदर्शन जारी रखेंगे.’

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पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘बाजार अब खुला हुआ है और हालात शांत हैं. कुछ लोगों ने ‘बिक्री के लिये’ वाले पोस्टर और छोड़कर जाने के शपथपत्र सिर्फ सुर्खियां पाने के लिये दिये हैं ताकि जल्द कार्रवाई हो सके.’

दिलचस्प बात यह है कि पिछले ही महीने गन्ना बेल्ट शामली के छोटे से शहर कैराना में बीजेपी नेता हुकुम सिंह ने यह आरोप लगाकर सनसनी फैला की दी थी कि स्थानीय मुस्लिम बाहुबलियों के डर से स्थानीय हिंदु परिवारों को अपनी जायदाद बेचकर वहां से बाहर जाना पड़ा है.

हालांकि बाद में सिंह द्वारा पेश की गई सूची फर्जी निकली जिसमें अधिकतर का दावा था कि वे बहुत पहले ही यह जगह छोड़कर जा चुके थे. और वे डर की वजह से नहीं गए इसके बावजूद बीजेपी इसका मुद्दा बनाने की कोशिश में लगी रही. यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इलाहाबाद के पार्टी सम्मेलन में यहां तक कह दिया कि कैराना जैसी घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिये.

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शामली के एक जानेमाने व्यक्ति ऐसी घटनाओं की पृष्ठभूमि पर रोशनी डालते हैं. वे कहते हैं, ‘जब कभी भी हिंदुओं और मुसलमानों से संबंधित कोई घटना होती है तो बीजेपी हिंदुओं का पक्ष लेती है और सपा मुसलमानों के पक्ष में खड़ी हो जाती है. इसी वजह से छोटे-मोटे झगड़े भी अकस्मात ही सांप्रदायिक घटना में बदल जाते हैं.’

वे आगे बताते हैं कि जब बहुसंख्यक समुदाय के लोग शामली के स्थानीय विधायक को पुलिस स्टेशन में जाकर अल्पसंख्यक समुदाय के स्थानीय बदमाशों की पैरवी करते देखते हैं तो उन्हें काफी बुरा लगता है. वे कहते हैं, ‘एक विधायक का ऐसा गैरजिम्मेदार व्यवहार सपा के मुस्लिम तुष्टिकरण की बातों को और अधिक हवा देते हुए सच्चाई में तब्दील करता है. इससे दोनों समुदायों के लोगों का ध्रुवीकरण होता है.’

इस बीच देश में सांप्रदायिक गड़बड़ी का नाम आते ही अलीगढ़ और मुजफ्फरनगर का नाम लोगों की जुबां पर आ जाता है. एक तरफ जहां अलीगढ़ का भीषण दंगों का इतिहास रहा है वहीं मुजफ्फरनगर भी 2013 में भयंकर दंगों का साक्षी बन चुका है.

First published: 26 July 2016, 7:56 IST
 
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