Home » इंडिया » Catch Hindi: up sp mlc list reveals akhilesh is real boss not shivpal
 

सपा की सूची में अखिलेश की धमक, शिवपाल दरकिनार

महेंद्र प्रताप सिंह | Updated on: 4 February 2016, 21:54 IST
QUICK PILL
  • यूपी में मार्च में एमएलसी की 36 सीटों के लिए चुनाव होने वाले हैं. बीजेपी कुछ ही सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है. कांग्रेस और सपा प्रत्याशी नहीं उतार रहे हैं. यानी इस चुनाव में सपा को एकतरफा जीत मिलने वाली है.
  • जिन प्रत्याशियों को सपा ने टिकट दिया है, उनकी सूची देखते हुए माना जा रहा है कि टिकट बंटवारे में शिवपाल यादव की नहीं चली. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के करीबियों की सूची में भरमार.

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 36 सीटों के लिए चुनाव तीन मार्च को होने हैं. कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी इस चुनाव में अपने प्रत्याशी नहीं उतार रही है. भाजपा कुछेक सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारेगी. इस तरह से सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के पास एमएलसी चुनाव के मैदान खुला चरने की छूट है. लेकिन, चुनाव के कुछ दिन पहले तक सपा के अंदर जो घमासान मचा था उसकी एक झलक ताजा सूची से मिल सकती है.

टिकट बंटवारे में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कोर टीम के युवाओं को तरजीह दी गई है. एमएलसी सूची में कई ऐसे विवादित चेहरे भी हैं जिन्होंने पार्टी की फजीहत कराई लेकिन वे आने वाले दिनों में विधान परिषद की शोभा बढ़ाएंगेें. विधान परिषद चुनाव की सूची को यदि आसन्न विधानसभा चुनाव का आइना मानें तो एक बात साफ है कि सपा में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कद काफी ऊपर जा चुका है वहीं पीडब्ल्यूडी और सिंचाई मंत्री जैसे कई मलाईदार विभागों को संभालने वाले मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव की पूछ-परख कुछ कम हुई है.

आधा दर्जन मुख्यमंत्री के चेहेते


सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने जिन 31 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, उसमें मुख्यमंत्री के कम से कम आधा दर्जन चेहते शामिल हैं. सबसे ज्यादा चौकाने वाले नाम सुनील यादव और आनंद भदौरिया का है. दोनों को कुछ दिन पहले ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. हालांकि हफ्ते भर के भीतर ही उनकी पार्टी में वापसी हो गई और महीने भर के भीतर एमएलसी पद की उम्मीदवारी भी मिल गई.

सुनील और आनंद को पिछले महीने अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव की सिफारिश पर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था. दोनों की मुख्यमंत्री से नजदीकी जगजाहिर है. लिहाजा शिवपाल के इस फैसले को सीधे अखिलेश को दी गई चुनौती के रूप में देखा गया. यह तनातनी हफ्ते भर में सच भी साबित हुई. अखिलेश इस निष्कासन से इतना नाराज हुए कि उन्होंने सैफई महोत्सव के उद्घाटन समारोह में भी हिस्सा नहीं लिया.

अंतत: चार-पांच दिन बाद इन दोनों नेताओं का पार्टी से निष्कासन रद्द करना पड़ा था. अब इन दोनों नेताओं को पार्टी ने क्रमश: लखनऊ-उन्नाव और सीतापुर सीट से विधान परिषद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है.

एमएलसी चुनाव के टिकट बंटवारे में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के करीबीयों को तरजीह दी गई है

इसके अलावा भी युवजन सभा के पूर्व जिलाध्यक्ष राजेश यादव को बाराबंकी और छात्रसभा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव उदयवीर सिंह को एटा-मथुरा-मैनपुरी से टिकट दिया गया है. जबकि, कन्नौज के इत्र कारोबारी पदमराज पम्मी जैन को इटावा-फर्रुखाबाद से मैदान में उतारा गया है. ये मुख्यमंत्री के काफी नजदीक माने जाते हैं.

आजमगढ़ और मऊ एमएलसी सीट से उम्मीदवार राकेेश कुमार यादव उर्फ गुडडू हैं. ये समाजवादी युवजन सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश सचिव रह चुके हैं. इन्हें भी अखिलेश यादव का नजदीकी माना जाता है. मेरठ-गाजियाबाद से प्रत्याशी राकेश यादव मूलत: इटावा के रहने वाले हैं.

रेशम विभाग के सलाहकार मुकेश को अखिलेश यादव ने दर्जा प्राप्त मंत्री का दर्जा दे रखा है. 2012 में चरथावल विधानसभा से चुनाव हार चुके हैं. अब इन्हें फिर से मुख्यधारा में लाने के लिए टिकट दिया गया है. इसके अलावा जिन युवाओं को टिकट मिला है उनमें परवेज अली, अक्षय प्रताप सिंह, बृज किशोर सिंह और रमेश मिश्रा प्रमुख हैं.

इन नामों पर अखिलेश की छाप है और यह आने वाले विधानसभा चुनावों के पहले अखिलेश की एकाधिकार सत्ता का भी सूचक है. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस पर शिवपाल यादव क्या रुख अपनाते हैं. यह तय है कि शिवपाल के कद में बहुत स्पष्ट काट-छांट हुई है.  
 

विधानसभा चुनाव का रिहर्सल


विधान परिषद की सीटों में जिस तरह से अखिलेश यादव के समर्थक युवाओं को अहमियत दी गई है, माना जा रहा कि विधानसभा चुनावों में भी इसी फार्मूले को अपनाया जाएगा. युवाओं को तरजीह मिलेगी और सिर्फ जिताऊ उम्मीदवारों पर पार्टी दांव लगाएगी.

एटा-मथुरा-मैनपुरी सीट से सपा महासचिव राम गोपाल यादव के भांजे अरविंद प्रताप सिंह को टिकट दिया गया है. अरविंद चुनाव जीतते हैं तो समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह के कुनबे से ये 20वें जनप्रतिनिधि होंगे.

समाजवादी पार्टी के एमएलसी प्रत्याशियों में 50% से ज्यादा यादव

अखिलेश के चहेतों के अलावा 31उम्मीदवारों में जिन अन्य को टिकट दिया गया है उनमें सपा ने मंत्री राजकिशोर सिंह के भाई बृज किशोर सिंह उर्फ डिंपल, महमूद अली के बेटे परवेज अली, आगरा-फिरोजाबाद से राम गोपाल यादव के नजदीकी दिलीप यादव, हरदोई से सांसद नरेश अग्रवाल के सिफारिस पर मिस्बाहुद्दीन को उम्मीदवार बनाया गया है. इसी तरह हाथरस से ओमवती यादव मुलायम सिंह यादव की काफी नजदीक मानी जाती हैं. इसलिए इन्हें टिकट मिला है.

यादवों की सघनता और दलितों की विरलता


हालांकि विधान परिषद की सीटों में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है लेकिन मुलायम सिंह की राजनीति यह कहती है कि उनके यहां सामाजिक न्याय का बोलबाला होगा. लेकिन 31 प्रत्याशियों की सूची सामाजिक न्याय से दूर जातिवाद के रोग से ग्रसित नजर आती है. नेताजी की सूची में एक भी दलित को स्थान नहीं मिला है.

सपा की सूची देखकर किसी को भ्रम हो सकता है कि सूबे की पचास फीसदी आबादी यादव है. कम से कम इस सूची से तो यही जान पड़ता है. 31 में 17 उम्मीदवार यादव हैं. यानि 50 फीसदी से ज्यादा यादवों को तरजीह दी गई है. मुस्लिम, कुर्मी, ब्राह्मण और राजपूतों को भी जगह दी गई है. लेकिन बात-बात में लोहिया और कर्पूरी ठाकुर को खींच लाने वाले नेताजी ने समाज के हाशिए यानि दलितों को एक भी टिकट के लायक नहीं समझा.

कुल 36 सीटें खाली हैं, 31 सीटों का लेखाजोखा इस तरह है- 17 यादव, 05 राजपूत (ठाकुर), 04 मुस्लिम, 02 कुर्मी, 01-01 ब्राह्मण, जाट और जैन. 05 सीटों पर उम्मीदवार अभी घोषित नहीं हुए हैं

फिलहाल लखनऊ के राजनीतिक पंडितों एक सवाल मथ रहा है, टिकट बंटवारे के इस पूरे खेल में पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव कहां हैं?

पढ़ें: भाजपा का यूपी फार्मूला: दलित राजनीति में सेंध और सपा से सांठगांठ

First published: 4 February 2016, 21:54 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी