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उत्तर प्रदेश: दलित-आदिवासी छात्रों में फैला गुस्सा

अतुल चंद्रा | Updated on: 5 May 2016, 20:39 IST

लखनऊ स्थित बाबा भीमराव अम्बेडकर यूनीवर्सिटी (बीबीएयू) ने अपने मेस के संचालक को निर्देश दिया है कि वह छात्रों को सिर्फ उच्च गुणवत्ता वाला शुद्ध शाकाहारी भोजन ही परोसे. लेकिन छात्र इस बात पर गुस्सा नहीं हैं. उनका गुस्सा तो अन्य पिछड़ा वर्ग के उन कर्मचारियों के ऊपर है जो अब अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों का कोटा खा जाना चाहते हैं.

मंगलवार को नाराज छात्रों ने कुलपति प्रो. आरसी साबती काे कार्यालय का घेराव किया. कई घंटे अंदर बंद रहने के बाद आखिरकार कुलपति ने सहायता के लिए पुलिस बुलाई और छात्रों को तितर-बितर कर दिया गया.

छात्रों के दबाव के कारण छात्र कल्याण डीन एवं प्रॉक्टर कमल जायसवाल को उनके पद से हटा दिया गया है. छात्र अब उन छात्रों को भी हटाने की मांग कर रहे हैं जिन्होंने सोमवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर एससी-एसटी छात्रों के वर्तमान 50 प्रतिशत कोटा में से 27 प्रतिशत कोटा अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए देने की मांग की है.

बीबीएयू ने अपने मेस के संचालक को निर्देश दिया है कि वह छात्रों को सिर्फ उच्च गुणवत्ता वाला शुद्ध शाकाहारी भोजन ही परोसे

यूनीवर्सिटी के अध्यादेश के अनुसार वर्तमान में यूनीवर्सिटी की कुल सीटों में से 50 फीसदी सीटें एससी-एसटी के लिए आरक्षित हैं.

अम्बेडकर यूनीवर्सिटी दलित छात्र संघ के अध्यक्ष श्रेयत बौद्ध ने कहा, “प्रॉक्टर और छात्र कल्याण डीन को पद से हटाने के साथ ही हमारी दो मांगें पूरी हो गई हैं, लेकिन हमारी तीसरी मांग है कि उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाले कर्मचारियों को हटाया जाए. यह मांग अब तक पूरी नहीं हुई है.”

श्रेयत ने इस कदम को खतरनाक बताया है. उन्होंने पिछड़ा जन कल्याण समिति द्वारा दायर याचिका को प्रॉक्टर कमल जायसवाल के दिमाग की उपज बताया. श्रेयत ने बुधवार को कहा कि अब कैंपस के हालात सामान्य हैं.

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श्रेयत ने आरोप लगाया कि, “जायसवाल ने उस बैठक के मिनट्स पर सबसे पहले हस्ताक्षर किए थे, जिसमें यूनीवर्सिटी की 50 प्रतिशत सीटें आरक्षण संबंधी अध्यादेश को चुनौती देने का निर्णय लिया गया था.”

एक और दलित छात्र नेता अजय कुमार ने कहा कि जायसवाल की मानसिकता दलित विरोधी है.

जायसवाल, जो यूनीवर्सिटी के प्रवक्ता भी हैं, ने ऐसे आरोपों को सिरे से नकार दिया. जब उनसे पूछा गया कि क्या यूनीवर्सिटी याचिका वापस लेने के लिए पिछड़ा जन कल्याण समिति को मनाएगी क्या? तो उन्होंने कहा कि कोई भी आदमी वापस लेने के लिए याचिका दायर नहीं करता.

अभी यह तय नहीं है कि यूनीवर्सिटी याचिका दायर करने वाले जन कल्याण समिति के 22 सदस्यों के खिलाफ कोई कदम उठाएगी या कोई कार्रवाई करेगी या नहीं?

दूसरे देशों में लोग गौमांस खाते हैं, इसी कारण वे अधिक बुद्धिमान हैं: प्रो. कांचा इलैया

जब कुलपति को फोन किया गया तो उन्होंने कहा कि मैं इन मसलों पर टिप्पणी नहीं कर सकता क्योंकि “मेरे पिताजी का निधन हो गया है.”

पहले भी एक बिना तिथि के सर्कुलर पर विवाद हुआ था. इस सर्कुलर पर कनिष्क छात्रावास के अधीक्षक (प्रशासन) के हस्ताक्षर थे और कहा गया कि छात्रावास में किसी भी तरह का मांसाहार पकाने या परोसने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

सर्कुलर में कहा गया था कि यह निर्णय कुलपति द्वारा औचक निरीक्षण के दौरान दिए गए मौखिक आदेशों के बाद लिया गया था. परिपत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि “मांसाहारी भोजन नहीं परोसा जाएगा, यहां तक की छात्रों की मांग पर भी नहीं.”

इस सर्कुलर के कारण यूनिवर्सिटी परिसर में मुखर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे. विवाद उस समय और भड़क उठा जब एक फैकल्टी मेम्बर ने इस पूरे विवाद के लिए हैदराबाद की उस्मानिया यूनीवर्सिटी के प्रो. कान्चा इलैया को आरोपी ठहरा दिया. प्रो. इलैया 14 अप्रैल को यहां एक सेमिनार में भाग लेने आए थे. आरोप है कि उन्होंने कहा, “हम शाकाहारी हैं, इसलिए हमारा दिमाग डिब्बा हो गया है.”

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इस फैकल्टी मेम्बर के अनुसार प्रो. इलैया ने यह भी कहा था कि भारत बाकी देशों से तभी पीछे रह गया है "जब से हम गौमांस खाना भूल गए हैं.” आरोप है कि प्रो इलैया ने यह भी कहा था कि दूसरे देशों में लोग गौमांस खाते हैं, इसी कारण वे अधिक बुद्धिमान हैं.

इससे यूनीवर्सिटी परिसर में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे, जिसके बाद छात्रों को बाहर से मांसाहारी भोजन लाने की अनुमति दे दी गई.

यूनीवर्सिटी प्रशासन ने पहले तो इस बात से इनकार ही कर दिया कि मेस में मांसाहारी भोजन पर किसी तरह का प्रतिबंध लगाया गया है और बाद में कहा कि 90 प्रतिशत छात्र शाकाहारी हैं. आदेश की एक और व्याख्या में कहा गया कि मांसाहारी भोजन परोसने की अनुमति देने से हॉस्टल मेस महंगी हो जाएगी.

यदि शेष 10 प्रतिशत छात्र इन बढ़े हुए खर्चों के भुगतान के लिए तैयार हों तो? इस पर कमल जायसवाल ने कहा, “इसे मैनेज नहीं किया जा सकता.”

अंडों का क्या? इस पर उन्होंने कहा, “नहीं, नहीं. यूनीवर्सिटी परिसर से बाहर कई विक्रेता अंडे बेचते हैं, छात्र सदा वहां जा सकते हैं और वहां अंडे खा सकते हैं.”

श्रेयत ने कहा, “भोजन का यह विवाद तो असली मुद्दों से हमारा ध्यान भटकाने के लिए पैदा किया गया है.”

First published: 5 May 2016, 20:39 IST
 
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