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उत्तर प्रदेश में तेज होती सांप्रदायिकता की आंच?

सुहास मुंशी | Updated on: 10 February 2017, 1:46 IST
QUICK PILL
  • पिछले\r\nसाल की तुलना में इस साल\r\nसांप्रदायिक हिंसा के मामले पूरे देश में\r\nबढ़े है. लेकिन इस मामले में सबसे आगे रहा उत्तर प्रदेश जहां समाजवादी पार्टी की सरकार है.
  • राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जब भी यूपी में सपा की सरकार आती है तो दंगे की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होती है. इससे बीजेपी और सपा दोनों को राजनीतिक फायदा होता है.

भारत में असहिष्णुता पर जारी चर्चा के बीच बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने असहमति जताने वाले लेखकों और कलाकारों को ''किराए का बौद्धिक'' शब्द से नवाजा है. साथ ही, लेखी ने लोकसभा में दावा किया कि मोदी सरकार में सांप्रदायिक हिंसा में गिरावट आई है.

लेकिन उनके दावे को गृह मंत्रालय के आंकड़े झुठलाते हैं. आखिर वास्तविकता क्या है?

  • पिछले साल की तुलना में इस साल सांप्रदायिक हिंसा के मामले बढ़े है. पिछले साल 644 मामले सामने आए जबकि इस साल 650 मामले अब तक हो चुके हैं.
  • सात राज्य हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं जिनमें चार राज्यों में बीजेपी की सरकार है.

यूपीए और एनडीए के शुरुआती 17 महीनों की तुलना करने पर ये बात सामने आती है कि एनडीए सरकार में महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा तेजी से बढ़ी है.

हिंसा प्रभावित राज्य

हालांकि, सबसे ज्यादा सांप्रदायिक हिंसा का मामला उत्तर प्रदेश में सामने आया है जहां बीजेपी सत्ता में नहीं है. यहां सेक्युलर मानी जाने वाली समाजवादी पार्टी का शासन है.

  • इस साल अब तक यूपी में सबसे अधिक 139 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं दर्ज की गई है.
  • महाराष्ट्र में 97, मध्य प्रदेश में 86, कर्नाटक में 79, बिहार में 59 और गुजरात में 47 मामले दर्ज हुए है.
  • पिछले तीन साल से लगातार यूपी सांप्रदायिक हिंसा के मामले में सबसे ऊपर रहा है. यूपी सरकार हिंसा रोकने के मामले में पूरी तरह नाकाम रही है.

दूसरी ओर बिहार और झारखंड जैसे राज्य हिंसा की आग रोकने में सफल रहे हैं

यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश अपने पड़ोसी राज्यों से शायद कुछ सीखना नहीं चाहते. उनके आलोचकों का आरोप है कि वह हिंसा का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में है.

दंगा उन्हें कैसे फायदा पहुंचाता है? अखिलेश के आलोचकों का मानना है, उनकी पार्टी मुस्लिमों को एहसास दिलाती है कि समाजवादी पार्टी ही मुस्लिमों की आखिरी उम्मीद है.

वास्तव में यह विश्वास करना मुश्किल है. कुछ तथ्यों पर विचार किया जाए:

  • मई 2012 में अखिलेश यादव यूपी की सत्ता पर काबिज हुए. जून में ही मथुरा के कोसी कलां में दंगा भड़क उठा.
  • कुछ महीने बाद बरेली जल उठा. इस घटना के बाद बरेली दंगे के मुख्य आरोपी तौकीर रजा के साथ पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव और अखिलेश ने मंच साझा किया था.
  • 2013 में हुए मुजफ्फरनगर में 60 लोग मारे गए जबकि 50 हजार लोग बेघर हुए.
  • इस दंगे की जांच करने वाले जस्टिस विष्णु सहाय ने बाद में इस बात की तरफ इशारा किया कि समाजवादी पार्टी और बीजेपी के कुछ नेता इस तबाही के लिए जिम्मेदार है.
  • मुजफ्फरनगर दंगे ने हिंदू और मुसलमान के बीच गहरी खाई पैदा कर दी जिसे भरने में कई साल लग जाएंगे.
  • इससे पता चलता है कि समाजवादी पार्टी कानून व्यवस्था को लेकर कितनी गंभीर है: यूपी में 3.68 लाख पद पुलिसवालों के लिए स्वीकृत हैं. 2012 तक यहां सिर्फ 1.73 लाख पुलिस वाले सेवा में हैं. कई वादों के बावजूद अखिलेश अब तक इस अंतर को कम नहीं कर पाए हैं.

यहां सवाल पैदा होता है कि क्या अखिलेश यादव सांप्रदायिकता को रोकने में रुचि रखते हैं? क्या उन्होंने यूपी के लोगों खासकर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने का झूठा वायदा किया है? क्या वह पार्टी के सिद्धांतों से भटक गए हैं?

क्या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण मुलायम को 2017 के विधानसभा चुनाव में फायदा पहुंचा सकती है?

राज्य के पूर्व मंत्री अशोक यादव के अनुसार दंगा और ध्रुवीकरण हमेशा मुलायम सिंह और बीजेपी को राजनीतिक फायदा पहुंचाता हैं. इसलिए मुलायम को मुजफ्फरनगर दंगे का कोई फर्क नहीं पड़ा. दूसरी ओर उनकी पार्टी के आजम खान जैसे नेता कार्रवाई की मांग करते रहे. जब राज्य हिंसा की आग में जल रहा था तो मुलायम अपना शाही जन्मदिन मना रहे थे.

कई राजनीतिक जानकारों की दलील है कि अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाए रखने और मुस्लिम वोटरों को एकजुट करने के लिए मुलायम हमेशा बीजेपी को मजबूत करते रहे हैं.

विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश सरकार ने संघ के अतिवादी तत्वों पर कार्रवाई करने से परहेज किया

यूपी में साध्वी प्राची और योगी आदित्यनाथ को द्वेष फैलाने की अनुमति दी गई लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की रैलियों को 'कानून-व्यवस्था के लिए खतरा' बताकर रद्द कर दिया गया.

अशोक यादव कहते हैं यादव सिंह मामले में बीजेपी ने एसपी पर नकेल कस दी है. सीबीआई के माध्यम से बीजेपी ने अखिलेश और मुलायम को दबाव में ला दिया है. अगर मुलायम सच्चे लोहियावादी थे तो बिहार में महागठबंधन से क्यों बाहर हो गए?

जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद से जुड़े प्रोफेसर बद्री नारायण ने अनुसार जब भी सपा की सरकार उत्तर प्रदेश में आती है यहां सांप्रदायिक हिंसा बढ़ जाती है. इससे चुनावों में तेज ध्रुवीकरण होता है और आधार वोटों में बढ़ोत्तरी होती है. हालांकि, अगले चुनाव में यह होने नहीं जा रहा. उन्होंने दलील दी कि हाल में ही सेक्युलर महागठबंधन ने अपनी सफलता और ताकत को दिखा दिया है.

क्या मुलायम और उनकी पार्टी अपनी गलती सुधारने के लिए तैयार है?

First published: 11 December 2015, 10:58 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

प्रिंसिपल कॉरेसपॉडेंट, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में आने से पहले इंजीनियर के रूप में कम्प्यूटर कोड लिखा करते थे. शुरुआत साल 2010 में मिंट में इंटर्न के रूप में की. उसके बाद मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मेल टुडे में बाइलाइन मिली.

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