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उर्दू लेखकों को हलफनामा देना होगा कि उन्होंने देश के खिलाफ नहीं लिखा

कैच ब्यूरो | Updated on: 19 March 2016, 16:46 IST

अब उर्दू लेखकों को अपने लेख के बारे में यह घोषणा करनी होगी कि उन्होंने जो भी लिखा है वो देश के खिलाफ नहीं है. इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज ने उर्दू लेखकों और संपादकों के लिए एक फॉर्म जारी किया है.

इस फॉर्म के जरिये लेखकों से यह घोषणा करने के लिए कहा गया है कि बुक और मैग्जीन में प्रकाशित कंटेट सरकार और देश के खिलाफ नहीं है. यह फॉर्म उन लेखकों के लिए है जो कि सरकार की आर्थिक योजना के तहत एनसीपीयूएल का लाभ उठाना चाहते हैं.

बीते कुछ माह में कुछ उर्दू लेखकों और संपादकों को यह फॉर्म दिया गया है. उर्दू भाषा में ही बने इस फॉर्म को भरने के बाद दो गवाहों के हस्ताक्षर कराने के लिए भी कहा गया है.

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फॉर्म के मुताबिक, "मैं..... पुत्र/पुत्री..... यह घोषणा करता हूं कि एनसीपीयूएल द्वारा आर्थिक सहायता योजना के तहत एक साथ खरीदने के लिए मंजूर हुई मेरी किताब और मैग्जीन में भारत सरकार की नीतियों और राष्ट्रहितों के खिलाफ नहीं लिखा है. इसे किसी भी सरकारी और गैर सरकारी संस्थान द्वारा आर्थिक सहाया नहीं मिली है."

इतना ही नहीं फॉर्म में चेतावनी भी दी गई है कि यदि इस नियम का उल्लंघन किया जाता है तो संस्थान लेख के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगा और उसे दी गई आर्थिक मदद वापस ले ली जाएगी.

वहीं, इस बारे में एनसीपीयूएल के निदेशक इरतेजा करीम ने कहा कि अगर कोई लेखक सरकार से आर्थिक मदद चाहता है सामग्री सरकार के खिलाफ बिल्कुल नहीं होनी चाहिए. एनसीपीयूएल एक सरकारी संस्थान है और हम सरकारी कर्मचारी. स्वाभाविक है कि हम सरकार के हितों की रक्षा करेंगे. 

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इस फॉर्म का निर्णय बीते वर्ष काउंसिल सदस्यों की बैठक में लिया गया था. इस दौरान मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सदस्य भी शामिल थे. गृह मंत्रालय भी इससे वाकिफ है.

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि बीते साल पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के बारे में एक किताब में गलत सूचना दे दी गई थी. कलाम एक राष्ट्रीय व्यक्तिव हैं और उनसे संबंधित गलत सूचना राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है. हमलोग सभी चीजों के लिए जिम्मेदारी नहीं ले सकते हैं.

First published: 19 March 2016, 16:46 IST
 
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