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डोभाल डॉक्ट्रिन: सर्जिकल स्ट्राइक ने बदला दक्षिण एशिया में रिश्तों का समीकरण

वज़ाहत क़ाजी | Updated on: 4 October 2016, 8:00 IST
QUICK PILL
  • भारत की विदेश नीति को समझने से पहले पिछले साल म्यांमार में हुए भारत के सैन्य अभियान को समझना जरूरी है. इस हमले के बाद भारत में डोभाल डॉक्ट्रिन को लेकर चर्चा शुरू हुई. डोभाल डॉक्ट्रिन भारत के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के नाम से जुड़ा हुआ है.
  • डोभाल डॉक्ट्रिन के लागू होने के बाद दक्षिण एशिया की स्थिति में बदलाव आया है. पाकिस्तान को छोड़कर छोटे देश भारत की क्षेत्रीय ताकत को स्वीकार करते दिख रहे हैं और वह उसके साथ जुड़ते दिखाई दे रहे हैं. उनकी नीति भारत की ताकत को संतुलित करने की नहीं है.

नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार भारत की 'सर्जिकल स्ट्राइक' को लेकर उठे विवाद के बीच भारत की विदेश नीति की समीक्षा जरूरी है. पाकिस्तान का कहना रहा है कि भारत की तरफ से एलओसी के पार कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई है.

भारत की विदेश नीति को समझने से पहले पिछले साल म्यांमार में हुए भारत के सैन्य अभियान को समझना जरूरी है. इस हमले के बाद भारत में डोभाल डॉक्ट्रिन को लेकर चर्चा शुरू हुई. डोभाल डॉक्ट्रिन भारत के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के नाम से जुड़ा हुआ है.

डोभाल डॉक्ट्रिन में शक्ति के इस्तेमाल को लेकर कोई मनाही नहीं है. न तो क्षेत्रीय तौर पर और नहीं वैश्विक मंच पर. अगर भारत ने वाकई में पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में 'सर्जिकल स्ट्राइक' किया है तो इसे निश्चित तौर पर डोभाल डॉक्ट्रिन का हिस्सा माना जाना चाहिए.

डॉक्ट्रिन की जटिलताएं?

उरी हमले के बाद भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र्र के अधिवेशन में भाषण देते हुए भारत का पक्ष रखा और इस बीच कथित 'सर्जिकल स्ट्राइक' के बीच भारत ने खुद को दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन के मंच से अलग कर लिया. नवंबर महीने में इस्लामाबाद में सार्क की बैठक होने वाली थी.

भारत के सार्क से अलग होते ही बांग्लादेश, अफगानिस्तान और श्रीलंका ने  भी खुद को सार्क से अलग कर दिया. सर्जिकल स्ट्राइक के बीच इस तरह का घटनाक्रम बेहद अहम है या नहीं, फिलहाल तय नहीं किया जा सकता लेकिन उरी हमले के बाद की स्थिति में इस तरह के घटनाक्रम का घटित होना उप महाद्वीप के लिए बेहद जटिल स्थिति हैं जिसके प्रतिकूल परिणाम होंगे.

ऐतिहासिक तौर पर एक तनाव की स्थिति भारत के क्षेत्रीय हित और वैश्विक आकांक्षाओं को जाहिर करती है. क्या इस क्षेत्र में भारत की स्थिति मजबूत होनी चाहिए या फिर वह वैश्विक एजेंडा तय करने वाली हो, या फिर वह ऐसी ताकत है जो मानदंड तय कर सके?

आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने मानदंडों की तरफ मुड़ते हुए भारत की नीतियों से जुडे़ बहस को विराम दिया. यह पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को लेकर था. 

1991 के बाद हालांकि भारत ने अपने दरवाजे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खोले और यह तनाव एक बार फिर से सामने आया. भारत ने आर्थिक ताकत को राजनीति ताकत में बदलने का काम शुरू किया. भारत की इस कोशिश का अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वागत किया गया लेकिन इसने भारत के पड़ोसी देशों में चिंता की लहर पैदा कर दी.

तो क्या भारत पड़ोसी देशों के साथ खराब संबंधों की कीमत पर क्षेत्रीय ताकत बनेगा? या फिर यह वैसी ताकत बनेगा जो सबको साथ मिलाकर चलेगा? इन सवालों का जवाब मिलना बाकी है. भारतीय उप महाद्वीप में सभी देशों की विदेश नीति वैसी स्थिति में है जिसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ''सॉफ्ट बैलेंसिंग'' कहा जाता है.

सॉफ्ट बैलेंसिंग की स्थिति तब बनती है जब पारंपरिक संतुलन की प्रक्रियाएं किसी ताकतवर देश के खिलाफ काम करना बंद कर देती हैं. गैर सैन्य विधियों की मदद से शक्तिशाली देश को परेशान या फिर नजरअंदाज किया जाता है. इस दौरान आर्थिक, कूटनीतिक और संस्थागत तरीकों का भी सहारा लिया जाता है.

1991 के बाद भारत ने आर्थिक ताकत को राजनीति ताकत में बदलने का काम शुरू किया.

डोभाल डॉक्ट्रिन के लागू होने के बाद दक्षिण एशिया की स्थिति में बदलाव आया है. पाकिस्तान को छोड़कर सभी छोटे देश भारत की क्षेत्रीय ताकत को स्वीकार करते दिख रहे हैं और वह उसके साथ जुड़ते दिखाई दे रहे हैं. उनकी नीति भारत की ताकत को संतुलित करने की नहीं है.

सार्क से बाहर निकलना इसका एक संकेत हो सकता है. इसका भारत की विदेश नीति पर असर पड़ेगा. वहीं छोटे देश भारत को 'बड़े भाई' की तरह स्वीकार कर सकते हैं. यह स्थिति भारत की क्षेत्रीय हितों को जाहिर करने वाली हो सकती है लेकिन यह उसकी वैश्विक आकांक्षाओं पर विराम लगा सकता है. 

वैश्विक स्तर पर शक्ति संतुलन की कई प्रकियाएं एक साथ काम करती हैं. हालांकि यह साफ नहीं है वैश्विक स्तर पर डोभाल डॉक्ट्रिन की क्या जटिलताएं होंगी.

भारत पाकिस्तान संबंध

हमारा विमर्श दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को अलग-थलग करने का है. पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से भारत के साथ गतिरोध की स्थिति में रहा है. इस स्थिति को चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता की स्थिति से भी बल मिलता है.

पाकिस्तान भारतीय उप महाद्वीप में भारत को जगह नहीं देगा और पारंपरिक रूप से भारत की ताकत को संतुलित करने का प्रयास करता रहेगा. भारत को संतुलित करने की दिशा में चीन की तरफ से पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता और समर्थन से इनकार नहीं किया जा सकता.

ऐसी स्थिति की क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों तरह की जटिलताएं सामने आएंगी. क्षेत्रीय स्तर पर दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति बनी रहेगी. वहीं वैश्विक स्तर पर पर चीन और अमेरिका के रिश्तों से यहां की क्षेत्रीय राजनीति पर असर पड़ेगा.

दक्षिण एशिया की स्थिति समग्र तौर पर अस्थिरता की होगी. आने वाले दिनों में शक्ति संतुलन और उसकी संरचना में बदलाव आएगा, जिसकी वजह से कई बड़े बदलाव आएंगे. ऐसी स्थिति से इस क्षेत्र में क्या शांति आएगी? यह डॉनल्ड रम्सफेल्ड के शब्दों कहें तो किसी को नहीं पता.

First published: 4 October 2016, 8:00 IST
 
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