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उरी हमलाः कूटनीति या कार्रवाई? सरकार करे तय

प्रताप भानु मेहता | Updated on: 24 September 2016, 7:23 IST
QUICK PILL
  • भारत-पाक विवाद अब एक पारम्परिक समस्या ही नहीं रह गई है, यह एक मनोवैज्ञानिक और एतिहासिक प्रक्रिया है. 
  • सिद्धान्ततः हमारी सेनाएं आंतरिक आदेश से बंधी हुई हैं और पाकिस्तान कश्मीर में हिंसा के दौर तेज करते हुए वहां दबाव की राजनीति करना चाहता है. 
  • भारत के पास अब भी पाक के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार कूटनीति ही है. लोकप्रिय अवधारणा के विपरीत मोदी सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक प्रतिक्रया करने में ज्यादा मजबूती से पेश आएंगे. 
  • सैन्य कार्रवाई में उन्हें क्षमता संबंधी अभावों का सामना करना पड़ सकता है जबकि उनकी कूटनीतिक शैली अधिक साफ, स्पष्ट और आत्म विश्वास से परिपूर्ण है. अब इस कूटनीतिक चातुर्य के सही इस्तेमाल का वक्त आ गया है. 

उरी हमले में 18 जवानों की दर्दनाक मौत दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के लिए एक निर्णायक क्षण है लेकिन बरसों से चली आ रही भारत-पाक संबंधों की गुत्थी अब भी अनसुलझी ही है. आप एक ऐसे परमाणु शक्ति संपन्न देश से कैसे निपट सकते हैं,जो आतंक को हथियार की तरह इस्तेमाल करता हो और जिसे विश्व की बड़ी ताकतों से पैसा मिल रहा हो?, कैसे ऐसे देश के साथ संबंध रख सकते हो, जहां सेना को मुख्य भूमिका में बने रहने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाता रहा हो, जिसकी पहचान ही नफरत फैलाना हो? इन सवालों के जवाब न तो आसान हैं और न ही पुरसुकून. भारत के पास अधिकार है कि वह ऐसे हमले के जवाब में चाहे जो कार्रवाई करे, लेकिन इससे बहुत सारे पहलू जुड़े हैं.

इस बारे में बहुत ज्यादा विकल्प सामने नहीं हैं. कई बार दोहराया जा चुका है कि पाक पर किसी तरह का सामरिक प्रतिबंध लगाना हार मानने के बराबर नहीं है. इससे पाकिस्तान के बारे में वास्तविक अवधारणा बनती है. गौरतलब है कि यह एक एक ऐसा देश है, जिसने हार के बाद अपनी सैन्य व मौलिक शक्तियों में इजाफा ही किया है. यह ऐसा देश है, जो बड़े पैमाने पर अंदरूनी हिंसा झेलने के लिए तैयार रहता है, इसलिए देश के भीतर मामूली हिंसा से इसे बमुश्किल ही कोई फर्क पड़ेगा. आक्रामकता के जोखिम पर पाक वाजिब ‘वजहें’ बताने को तैयार रहता है. इस जोखिम को अनदेखा नहीं किया जा सकता. यह भारत की क्षमताओं पर भी अपनी ही तार्किक अवधारणाएं बनाता रहता है.

यह हाल ही के एतिहासिक अनुभव पर भी ध्यानाकर्षित करता है कि समाज आतंकवाद से उतने कमजोर नहीं होते जितने इसके बाद की जवाबी कार्रवाइयों से. कुछ परिस्थितियों में यह प्रतिकार गतिरोध के रूप में भी हो सकता है, क्योंकि हो सकता है दूसरे पक्ष को आशाजनक राजनीतिक समर्थन नहीं मिले. यह इस मान्यता पर भी आधारित है कि भारत-पाक विवाद अब एक पारम्परिक समस्या ही नहीं रह गई है, यह एक मनोवैज्ञानिक और एतिहासिक प्रक्रिया है. प्रतिरोध करना भी भारत के पक्ष में ही जाता है. पिछले दशक के दौरान भारत की ताकत मेें असीमित रूप से इजाफा हुआ है.

इस्लाम की लाठी से देश चलाया

हमें पाकिस्तान से चरम हिंसा की आशंका होनी ही चाहिए थी. हार और अलगाववाद के डर से पाक कट्टरवाद के चरम पर पहुंच गया है. 1971 के बाद से इसे अपनी नई और उदारवादी छवि बनानी चाहिए थी लेकिन बजाय इसके इसने हिंसा और इस्लाम की लाठी से ही देश को चलाया. परन्तु यह कोई आरोप का आधार नहीं है. सीधा सा राजनीतिक तर्क यह है कि जैसे ही आपने बलूचिस्तान मसले पर उंगली उठाई, पाक जैसे बेशर्म देश से इसी तरह की प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक था. दूसरा, सैन्य और आम नागरिकों के बीच संघर्ष अब भी पाक में ज्वलन्त मुद्दा है और भारत के साथ विवाद को सुलगाए रखना ही इसका मुख्य ध्येय है. तीसरा, पाक की ‘अंतरराष्ट्रीयकरण’ की नीति से दक्षिण एशिया में सदा तनाव ही फैला है. इस संदर्भ में पाक इस सिद्धान्त पर काम करता है कि क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान स्वतः इस ओर खींचा जा सकेगा. इसलिए भारत की ओर से प्रतिरोध पर उसका चिढ़ना स्वाभाविक है. चैथा, अमेरिका में मौजूदा अस्थिरता के चलते कई दूसरी ताकतें सिर उठा रही हैं. 

कूटनीति सबसे मज़बूत हथियार

अंततः कश्मीर मसला तो है ही. सिद्धान्ततः हमारी सेनाएं आंतरिक आदेश से बंधी हुई हैं और पाकिस्तान कश्मीर में हिंसा के दौर तेज करते हुए वहां दबाव की राजनीति करना चाहता है. भारत के पास अब भी पाक के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार कूटनीति ही है. पाकिस्तान ने लगता है सारी हदें पार कर दी हैं और अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाक को लेकर संयम खोता नजर आ रहा है. 

लोकप्रिय अवधारणा के विपरीत मोदी सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक प्रतिक्रया करने में ज्यादा मजबूती से पेश आएंगे. सैन्य कार्रवाई में उन्हें क्षमता संबंधी अभावों का सामना करना पड़ सकता है जबकि उनकी कूटनीतिक शैली अधिक साफ, स्पष्ट और आत्म विश्वास से परिपूर्ण है. अब इस कूटनीतिक चातुर्य के सही इस्तेमाल का वक्त आ गया है.

राजनीतिक स्तर पर बात की जाए तो कश्मीर मसले को हल करने में भारत की साख ही इसके आड़े आ रही है. सही और सच्चे लोकतंत्र का सिद्धान्त भी इस तनाव से जूझ रहा है. पाक सदा से यही करता आया है, उसकी सेना ने एक झटके में कश्मीर आंदोलन की आड़ में एक बार फिर भारत को उकसाने का काम किया है, कि वह जवाब में कोई हिंसक कार्रवाई करे. पाकिस्तान सीधे लिप्त होकर ‘अपनी ही कूटनीति’ पर चलने का प्रयास कर रहा है.

हवाई किले बनाने से जवाब नहीं मिलेंगे

प्रस्तावित ‘समाधानों’ की कोई कमी नहीं है. सिंधु नदी के पानी के इस्तेमाल से लेकर आर्थिक प्रतिबंध एवं गुप्त कार्रवाई से लेकर खुले युद्ध तक. परन्तु इन पर केवल विचार मात्र से काम नहीं चलेगा. सैन्य और गुप्त दोनों ही स्तर पर सब कुछ आपकी कार्यात्मक कुशलता पर निर्भर करता है. परन्तु इस संदर्भ में बड़े-बड़े दावों के प्रति सशंकित होने के पीछे वजह है. 

अगर आप सिंधु पर दांव खेलते हैं तो क्या उम्मीद करते हैं कि सामने से क्या प्रतिक्रया आएगी? क्या पाकिस्तान के अंदर और अधिक कट्टरवाद पनपेगा? या चीन को निर्णायक बनाना कारगर होगा? ये ऐसे निर्णायक प्रश्न हैं जिनके जवाब सीधे मामले में लिप्त हो कर ही मिलेंगे न कि हवाई किले बनाने से. 

पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के लिए चीन और अमरीका का सहयोग अति आवश्यक है. आर्थिक प्रतिबंध से पाक के नीति निर्धारकों को फर्क पड़ेगा, उन्हें तकलीफ होगी. ऐसे प्रतिबंध जिनसे जनता को तकलीफ होती है न कि नेताओं को, वे संभवतः जवाबी कार्रवाई की वजह बन सकते हैं. अमरीका ने अब तक ऐसे किसी प्रतिबंध की इच्छा नहीं जताई है. चीन अपने सहयोगी का साथ नहीं छोड़ेगा. परन्तु अगर संघर्ष बढ़ने के आसार हो तो क्या लाइन खींचना सही होगा?

परन्तु साथ ही सवाल उठता है कि हम पाकिस्तान को किस हद पर रोकना चाहते हैं? भारत का इसे एक मानवाधिकार मानक पर रखने का दावा पक्का हो सकता है यदि कश्मीर में हमारा रिकाॅर्ड अपेक्षाकृत और सतही हो. अन्य उपाय हो सकता है-अहिंसा, यानी दूसरे प्रान्त में प्रत्यक्ष या छद्म हिंसा पर रोक लगे.

सिद्धान्ततः यह एक ऐसा उपाय है, जिस पर चीन प्रतिबद्धता दिखा सकता है. इसके पीछे भी वही तर्क काम करता है और इससे एक प्रकार से अलगाववादी आंदोलन को ‘बाहरी’ समर्थन का डर होगा. परन्तु यहां बलूचिस्तान पर खेला गया अपरिपक्व दांव फिर जटिलता पैदा करता है. या तो आप सीमा पार से किए जा रहे दुस्साहस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा निंदा करवा कर उसका समर्थन पा सकते हैं या आप स्वयं ‘जैसे को तैसा’ का रवैया अपना कर इसी तरीके को सही ठहरा सकते हैं.

 आप एक साथ दोनों काम नहीं कर सकते. अपने कूटनीतिक कदम को तय करते हुए हमें स्पष्ट तौर पर तय करना होगा कि हम पाक के साथ किस तरह का संबंध रखना चाहते हैं-मानवाधिकार वाला या ‘सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देने का’,जो कि तुरंत प्रभावी दिखता है.

सोच में परिवर्तन ज़रूरी

भारत सरकार इस मोर्चे पर लगातार विफल ही रही है. एक अड़ियल प्रतिद्वंदी से मुकाबला हो तो सोच और रवैये में परिवर्तन लाना जरूरी होता है. हमारी विफलता घरेलू स्तर पर है, जो हमारी सफलता को कम श्रेय देती है. स्वयं को कम नुकसान पहुंचाते हुए हम एक खतरनाक रणनीतिक मोड़ पर खड़े हैं, जबकि समान परिस्थितियों में दूसरी ताकतें शायद ही ऐसा कर पाएं. परन्तु हमारी हाल ही अपनाई गई आक्रामक नीति ही हमारी उलझन बन गई है और हमारे सरकारी तंत्र ने वीभत्स रूप में दिखा कर हमारे जवानों का मनोबल गिरा दिया है.

हमें अपने ढ़ांचे की मरम्मत करनी होगी ताकि हम हमारी कमजोरी दूर कर सकें, पाबंदी लगाना संभवतः उन जवानों की शहादत को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने अपनी जानें गवां दी, बजाय बेकार का दुस्साहस दिखाने के. इससे सिर्फ राजनीतिक अहम् को चोट पहुंचेगी लेकिन समस्या हल होने की संभावना कम है. हमारी सेना ने परिपक्वता का परिचय दिया है; लेकिन पाक को कहीं न कहीं यह लगता है कि हमारे राजनेता ऐसा नहीं कर पाएंगे.

First published: 24 September 2016, 7:23 IST
 
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