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उरी हमलाः भारत पाक को कूटनीतिक मोर्चे पर मात देने की नीति अपनाएगा!

सादिक़ नक़वी | Updated on: 21 September 2016, 8:19 IST

कश्मीर घाटी में नियंत्रण रेखा के पास उरी के एक सैन्य शिविर पर हुए भयावह हमले के दो दिन बाद लगता है प्रधानमंत्री ने इस पर तुरंत कोई जवाबी कार्रवाई करने से परहेज किया है, जबकि इस हमले में चप्पे-चप्पे पर पाकिस्तान का हाथ साफ नजर आ रहा है.

मोदी ने कथित तौर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने और लगातार आतंकवाद को प्रायोजित करने के लिए इसे दुनिया के सामने बेनकाब करने की रणनीति पर और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ने की अनुमति दे दी है. प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर उन्हें इस बारे में पूर्ण जानकारी भी दी.

हालांकि पाकिस्तान को स्पष्ट और जनता को दिखने वाली कार्रवाई क्या होगी इस पर अभी भी सत्ताधारी किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके हैं.

पाकिस्तान के खिलाफ स्पष्ट और दिखने वाली कार्रवाई क्या होगी इस पर अभी सत्ताधारी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे है

सैन्य अभियान महानिदेशक (डीजीएमओ) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि सशस्त्र बलों के पास ऐसे हमलों का जवाब देने की पूरी क्षमता है. परन्तु ‘ऐसे किसी भी हमले का जवाब देने के लिए समय और जगह हमारी चुनी हुई होगी.’

शायद सरकार ने इस दिशा में कोई निर्णय लिया हो, क्योंकि सरकार लगातार कह रही है कि उसके पास पक्के सबूत हैं कि हमले में पाकिस्तान का हाथ है.

केंद्रीय कानून एवं सूचना प्रसारण मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा, कि हमारे पास पुख्ता सबूत हैं और भारत-पाक के रिश्ते अब कभी सामान्य नहीं हो पाएंगे.

सवाल उठता है कि सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी की सदस्य विदेश मंत्री सुषमा स्वराज प्रधानमंत्री के साथ हुई इस बैठक में शामिल नहीं थी, जिसमें कथित तौर पर पाक को अलग-थलग करने का निर्णय लिया गया. सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने वाली सुषमा स्वराज ने इस विषय पर कोई ट्वीट भी नहीं किया. सिवाय अफगानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हनीफ अतमार के ट्वीट को चार बार रीट्वीट करने के, जिसमें उन्होंने उरी हमले की निंदा की थी.

पाक हासिल क्या करना चाहता है?

उरी में रविवार तड़के कथित तौर पर जैश-ए-मोहम्मद के बताए जा रहे चार आतंकवादियों ने हमला किया था, जिसमें 18 सैन्य कर्मियों की मौत हो गई थी. घाटी में यह अब तक का पहला ऐसा हमला है, जब किसी एक ही हमले में इतनी जानें गई हों. इसीलिए हर ओर से पाक के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठ रही है.

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में बलूचिस्तान में मानवाधिकारों हनन का मामला उठाया था और सुरक्षा एजेंसियों ने कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा पैदा किए गए अस्थिरता के हालात के मद्देनजर पाक के नापाक इरादें को बेनकाब किया था.

इस बीच, लगता है उरी हमला ऐसे बहुत सारे हमलों की ही अगली कड़ी है जो भारतीय जमीन पर उन आतंकियों ने किए हैं, जिन्हें पाकिस्तान का रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय ‘अच्छे आतंकवादी’ कहता है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा सम्मेलन से ठीक पहले इस तरह का हमला होना संदेह पैदा करता है कि संभवतः सीमा पार से यह हमला इसलिए किया गया हो ताकि कश्मीर मसले को अंतरराष्ट्रीय रंग दिया जा सके और ऐसा मामला बताया जा सके कि भारत सरकार कश्मीर मेें सामान्य हालात बहाल करने में नाकाम रही है.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पाक अधिकृत कश्मीर के नेताओं के साथ बैठक करके उन्हें आश्वासन दिया है कि वे संयुक्त राष्ट्र में यह मसला जरूर उठाएं. वे 21 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करेंगे जबकि भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तीन दिन बाद 24 सितम्बर को सभा को संबोधित करेंगी.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को दिए गए एक कड़े बयान में भारत ने मांग की है कि पाकिस्तान अपनी धरती से आतंकवादियों का सफाया करे और साथ ही कहा, ‘अब समय आ गया है जब भारत की धरती पर लगातार फैलाई जा रही हिंसा के जिम्मेदारों को पाकिस्तान से मिल रहे नैतिक और भौतिक समर्थन की ओर परिषद का ध्यान आकर्षित किया जाए.'

सरकार को मजबूती से अपना पक्ष रखने की जरूरत

पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं कि हमले को केवल संयुक्त राष्ट्र महासभा के नजरिये से देखना उचित नहीं है. संयुक्त राष्ट्र में किसी की भी इस मसले में दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान ने कई बार इस मंच पर कश्मीर मुद्दा उठाया है और ज्यादातर देश यह जानते हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को पोषित करता रहा है.

कूटनीतिक और रणनीतिक मामलोें के जानकारों के बीच इस मुद्दे पर मतभेद हैं कि सरकार को महत्वपूर्ण सैन्य शिविर पर हुए इस हमले पर क्या प्रतिक्रया करनी चाहिए. अफगाानिस्तान और नेपाल में पूर्व राजदूत राकेश सूद कहते हैं अगर सरकार पाकिस्तान को अलग-थलग और बेनकाब करना चाहती है तो इसे काफी मजबूत केस बनाना होगा.

उन्होंने कहा, ‘हमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह स्वीकार करने के लिए तैयार करना होगा कि पाकिस्तान आतंकी गुटों को शर्तियां समर्थन देता है.'

गुप्तचर ब्यूरो (आईबी) तथा अनुसंधान एवं विश्लेषण शाखा के पूर्व प्रमुख एएस दुलत का कहना है कि अतीत में संसद पर हमले और करगिल युद्ध के बाद पाकिस्तान के खिलाफ कूटनीतिक कदम के परिणाम कारगर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘यद्यपि पूर्व में सीधे हमले की बात भी हो चुकी है किन्तु सरकार किसी कारण से ऐसा नहीं करती. हालांकि 1999 में करगिल युद्ध के बाद से जम्मू कश्मीर में अब तक 106 आत्मघाती हमले किए गए.'

सैन्य कार्रवाई ही एकमात्र समाधान

सिब्बल का मानना है कि इस समस्या का एक मात्र समाधान सैन्य कार्रवाई ही है, और सरकार को कश्मीर में लगातार हालत बिगाड़ने के लिए पाक को सबक सिखाना ही होगा. उन्होंने कहा, 'सीमा पार कुछ ऐसे नाजुक ठिकाने हैं जहां बदले की कार्रवाई पाक के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है और वह इसका जवाब भी नहीं दे पाएगा.' वे कहते हैं कश्मीर में जवाबी कार्रवाई पाकिस्तान के लिए भारी पड़ेगी और भारत अभी जम्मू में किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है. हालांकि हमें जान-माल का नुकसान हो रहा है. पाकिस्तान और दुनिया को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि भारत एक सफेद हाथी है, जो कुछ नहीं कर सकता.

पूर्व एनएसए एमके नारायणन ने भी आशंका जताई कि पाक के साथ कूटनीति काम नहीं कर सकती, क्योंकि यह देश दुस्साहसी हैं. उन्होंने इस पर मिल रही प्रतिक्रयाओं पर उंगली उठाते हुए कहा, 26-11 के  बाद ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी.

हो सकता है नारायणन अपनी जगह सही हों कि भारत की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया लेकिन यह भी सही है कि 26-11 का मास्टरमाइंड आज भी खुले आम घूम रहा है और अक्सर कश्मीर में भारत के खिलाफ जिहाद की बातें करता दिखाई देता है.

राष्ट्रवाद भी सहायक सिद्ध नहीं होगा

कैबिनेट सचिवालय में पूर्व विशेष सचिव ने कहा कि कूटनीतिक तौर पर अलग करना कमतर तरीका है और समुचित भी नहीं होगा क्योंकि जनता इतने बड़े हमले के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहती है. पूर्व अधिकारी का मानना है कि इस खूनी आतंकी हमले के बाद पाक उच्चायुक्त को वापस भेज दिया जाना चाहिए.

पाक के साथ एक अन्य अधिकारी ने कहा, भले ही त्वरित कार्रवाई करना सही न हो लेकिन सरकार पाकिस्तान से इसकी कीमत तो वसूल ही सकती है. वे इस बात को मानते हैं कि यह पूर्णतः सोचा समझा तथा कार्रवाई संबंधी गोपनीयता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अंजाम दिया जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा, 'सरकार को बिना कोई हो हल्ला किए आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए. दुलत कहते हैं- राष्ट्रवाद काम नहीं आाएगा. उनसे सहमति जताते हुए सूद कहते हैं, ‘ऐसी जवाबी कार्रवाई की जरूरत है जिसका अवश्यंभावी असर तो हो.’

चीन और अमेरिका

सिब्बल कहते हैं पाकिस्तान के खिलाफ कूटनीतिक विकल्प कारगर नहीं है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के दो स्थाई सदस्य चीन और अमेरिका पाकिस्तान के ज्यादा नजदीक हैं. चीन ने यूएनएससी प्रतिबंध समिति में जैश-ए-मुहम्मद प्रमुख मसूद अजहर के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की भारत की मांग पर रोक लगा दी थी.

प्रोफेसर अनाटोल लीवेन के अनुसार, 'अमेरिकी भी भारत द्वारा पाक को निशाना बनाए जाने के पक्ष में नहीं है. यहां तक कि जब अमेरिकी मीडिया जम्मू-कश्मीर में असंतोषजनक हालात के लिए घरेलू कारणों को जिम्मेदार मानते हुए भारत की स्थिति कमतर बताते हुए कहता है कि पाकिस्तान कश्मीर में परेशानी खड़ी करने की कोशिश करता है.' वे कहते हैं ऐसा इसलिए है कि अमरिका इस बात को लेकर सतर्क है कि पाकिस्तान अब भी चीन के करीब है.

राजदूत सूद का कहना है कि अगर भारत इस मामले में अपना पक्ष मजबूती से रखे तो हो सकता है चीन को कुछ शर्मिन्दगी का एहसास हो और वह मसूद अजहर का नाम यूएनएससी प्रतिबंध सूची में शामिल करवाए.

पश्चिम एशियाई देशों में भारत के उच्च स्तरीय दौरे में हालिया अपनाई गई कूटनीति के बावजूद खाड़ी देेशों और तुर्की सहित इस्लामी देश इस्लामी सहयोग संगठन में कश्मीर पर पाक का ही रुख सही ठहराते हैं.

हालांकि भले ही अमेरिका पाक को सहलाता रहा हो, अततः देर से ही सही इसने भारत की ओर देखना शुरू कर दिया है. खास तौर पर अफगानी संदर्भ में. चूंकि इस माह के अंत में महासभा के अधिवेशन के बाद त्रिपक्षीय समझौता करना प्रस्तावित है. हाल ही में भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी पाकिस्तान यात्रा पर इसीलिए नहीं गए ताकि वह दोनों देशों के बीच आई संबंधों में शिथिलता को जता सकें.

रोचक बात यह है कि चीन ने उरी हमले की निंदा की और कहा, 'भारत-पाक को आपस में वार्ता करनी चाहिए.' अमेरिका ने ऐसी कोई सलाह नहीं दी. भारत अक्टूबर में क्षेत्रीय बिम्सटेक सम्मेलन के बाद ब्रिक्स सम्मेलन का भी आयोजन करेगा.

इस बीच, विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय हमला करने का मतलब है कश्मीर में, खास तौर पर दक्षिणी कश्मीर में उग्रादियों और अलगाववादियों को गड़बड़ी फैलाने के लिए और प्रोत्साहित करना.

दुलत ने हालांकि चेताया कि कश्मीर  के वर्तमान में चल रहे जटिल हालात के बीच हुए उरी हमले को नजरंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन दोनों मामलों को जोड़ कर देखना बुद्धिमत्ता नहीं है जबकि यह पता चल गया है कि हमलावर विदेशी थे और कश्मीर से उनको कुछ लेना-देना नहीं है. ‘कश्मीर को इस मुद्दे को अलग से निपटाना होगा.’

आखिरकार सरकार को एक साथ कार्रवाई करने की जरूरत है और यह जांच करने की भी कि इस तरह के फिदायीन हमले की खुफिया सूचना मिल जाने के बावजूद दुश्मन ने इस हमले को कैसे अंजाम दिया.

First published: 21 September 2016, 8:19 IST
 
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