Home » इंडिया » Uri & surgical strikes: India has played it right, Pakistan is tottering on internal issues
 

उरी हमला: भारत की सही चालों के चंगुल में फंसा पाकिस्तान

विवेक काटजू | Updated on: 8 October 2016, 14:29 IST
QUICK PILL
  • पाकिस्तान भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक से लगातार इनकार करता रहा है लेकिन उसकी आंतरिक स्थिति यह बता रही है कि पाकिस्तान भारत के सर्जिकल स्ट्र्राइक के बाद ऐसी स्थिति में फंस गया है जहां उसे अपनी कूटनीति विफल होती नजर आ रही है.
  • पाकिस्तानी अखबार डॉन में छपी एक रिपोर्ट यह बताती है कि पाकिस्तान की सरकार यह बात मानती है कि बुरहान वानी को लेकर की गई पाकिस्तान की कूटनीति पूरी तरफ से विफल रही है.
  • भारत ने साफ कर दिया कि वह हमले के दोषियों को नहीं बख्शेगा. भारत ने हमले के बाद सिंधु जल समझौता, तरजीही राष्ट्र का दर्जा और बलोचिस्तान के मुद्दे को उठाया लेकिन उसने संयुक्त राष्ट्र महाधिवेशन के दौरान किसी तरह की कार्रवाई से परहेज किया.

पाकिस्तान के खिलाफ की गई भारतीय सेना की कार्रवाई को लेकर सेना और राजनीतिक नेतृत्व में मतभेद बढ़ता नजर आ रहा है. हालांकि पाकिस्तान भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक से अभी तक इनकार करता रहा है.

शरीफ बंधु सेना को बैक फुट पर लाना चाहते हैं और पाकिस्तानी अखबार डॉन के 6 अक्टूबर के एडीशन को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है. प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के कार्यालय ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए पाकिस्तानी सेना की भूमिका की तारीफ की. लेकिन उनका नकारना चौंकाने वाला नहीं रहा.

डॉन में छपी सिरिल अल्मेदिया की रिपोर्ट बताती है कि नवाज शरीफ की अध्यक्षता में सेना और असैन्य अधिकारियों की बैठक में विदेश सचिव एजाज चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान की हालिया कूटनीतिक कोशिश (जाहिर तौर पर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में चल रहा विरोध प्रदर्शन) अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी तरह का समर्थन जुटाने में  विफल रही है.

चौधरी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जैश ए मोहम्मद, लश्कर ए तैयबा और हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. यहां तक कि चीन ने भी पाकिस्तान से अपना रैवया बदलने को कहा है.

पंजाब के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई शाहबाज शरीफ ने शिकायत करते हुए कहा कि सुरक्षा एजेंसियों ने पुलिस को प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने से रोका. 

डॉन की रिपोर्ट से यह बात साफ हो गई कि शरीफ अपने सेना के अधिकारियों को यह साफ साफ चेतावनी दे रहे थे कि पाकिस्तान फिलहाल अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना कर रहा है. उनकी यह चेतावनी अभूतपूर्व रही.

नवाज शरीफ की कहानी

नवाज शरीफ सेना पर आधारित प्रधानमंत्री रहे हैं और फिलहाल उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. मई 2013 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के करीब एक साल के भीतर ही रहील शरीफ को सेना प्रमुख बनाने के बाद सेना के साथ उनके रिश्ते बिगड़ने लगे थे.

सेना के साथ बिगड़ते रिश्तों की बड़ी वजह पाकिस्तानी की सुरक्षा नीतियों पर नियंत्रण की कोशिश रही. खासकर उन नीतियों को लेकर जिसका संबंध भारत के साथ होता है. सेना ऐसा करने को तैयार नहीं थी और फिर नवाज शरीफ को आखिरकार झुकना पड़ा. 

हालांकि इसके बावजूद वह सेना की मर्जी के बिना काम करते रहे और इससे सेना को खुशी नहीं हुई. उफा में जुलाई 2015 में भारत और पाकिस्तान की तरफ से जारी संयुक्त बयान हो या फिर पिछले साल नरेंद्र मोदी का लाहौर का अचानक दौरा.

पठानकोट हमला दरअसल मोदी और शरीफ के रिश्तों पर पाकिस्तानी सेना की तरफ से दी गई प्रतिक्रिया थी.

कश्मीर का मुद्दा

नवाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना हालांकि तथाकथित कश्मीर के मुद्दे को लेकर एक ही तरफ हैं. जब कश्मीर घाटी में बुरहान वानी की मुठभेड़ में हुई मौत के बाद प्रदर्शन शुरू हुए तब पाकिस्तान ने इसमें पूरी योजना के साथ दखल दिया. शुरुआत में पाकिस्तान ने जनाजे के नमाज के बाद होने वाले प्रदर्शनों को हवा दी और फिर इसके बाद पत्थरबाजी करने वाले युवा आगे आ गए. इन सबके पीछे घाटी में काम करने वाले अलगाववादी नेता काम करते रहे.

बाद में उन्होंने कथित मानवाधिकार का मुद्दा उछालकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने की कोशिश की. पाकिस्तान का मकसद साफ था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत पर दबाव डालकर उसे पाकिस्तान के साथ बातचीत करनेे के लिए कहेगी. इसके लिए बड़े पैमाने पर कूटनीतिक कोशिशें भी की गईं.

हालांकि एजाज चौधरी ने नवाज शरीफ की बैठक में साफ कहा कि बड़ी शक्तियों की पाकिस्तान के मामले में कोई रुचि नहीं है. बदले में उन्होंने हाफिज सईद जैसे आतंकी को मुद्दा बनाया जो पाकिस्तान में खुलेेआम घूम रहा है.

कूटनीति के विफल होने के बाद सैन्य अधिकारियों ने फिर वहीं पुराना पैंतरा अपनातेे हुए घाटी में आतंकी हमले करवाए ताकि संयुक्त राष्ट्र महाधिवेशन से पहले कश्मीर की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा जा सके.

पाकिस्तान हमेशा सेे यह कोशिश करता आया है कि जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़े, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान परमाणु युद्ध के खतरे की तरफ चला जाए और फिर दोनों देशों के बीच बातचीत को लेकर दबाव बनाया जा सके.

हालांकि सेना के शिविर हमले के बाद दोनों देशों के बीच के तनाव में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है और उरी पर हुए हमले के बाद भी ऐसा ही हुआ.

प्रायोजित आतंकवाद

हालांकि वैश्विक शक्तियां पाकिस्तान की तरफ से लगातार आतंकवाद को बढ़ावा दिए जाने को लेकर अपना धैर्य खो रही हैं. जाहिर तौर पर यह देश पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते नहीं खत्म करेंगे लेकिन वह अपनी नाराजगी जरूर जाहिर करेंगे और उरी हमले के बाद ऐसा हुआ भी.

उरी हमले के बाद मोदी सरकार ने बेहद सधे हुए तरीके से कदम बढ़ाया. भारत ने साफ कर दिया कि वह हमले के दोषियों को नहीं बख्शेगा. 

भारत ने हमले के बाद सिंधु जल समझौता, तरजीही राष्ट्र का दर्जा और बलोचिस्तान के मुद्दे को उठाया लेकिन उसने संयुक्त राष्ट्र महाधिवेशन के दौरान किसी तरह की कार्रवाई से परहेज किया.

इस वजह से पाकिस्तान की कूटनीति सिरे से धाराशायी हो गई. वहीं दूसरी तरफ उरी हमले ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान किस तरह से आतंकवाद का इस्तेमाल कर रहा है. फिर भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया. पाकिस्तानी सेना इसे स्वीकार नहीं कर सकी. उन्होंने अपनी कमजोरी को छिपाते हुए सवाल उठाने शुरू कर दिए. 

पाकिस्तानी सेना अगर सर्जिकल स्ट्राइक को स्वीकार कर लेती तो इससे यह बात साबित हो जाती कि भारत ने परमाणु युद्ध का खतरा उठाते हुए भी हमला किया, जिसे पाकिस्तानी सेना अपनी ढाल के तौर पर इस्तेमाल करती रही है.

नवाज शरीफ ने सेना को एक तरह से शर्मिंदा किया और यह सब कुछ वैसे समय में हुए जब रहील शरीफ रिटायर होने वाले हैं. उनके बाद सेना की दूसरी पंक्ति के जनरल को लेकर कई तरह की अनिश्चितताएं हैं.

नवाज शरीफ  जाहिर तौर पर इस बात को ध्यान में रखे हुए हैं. यह सैन्य अधिकारियों के लिए खतरे का खेल है क्योंकि जब कभी देश की सुरक्षा नीति को लेकर सवाल उठता है तो उनकी पकड़ और मजबूत हो जाती है. साथ ही उनका कॉरपोरेट हित भी सेना की प्रतिष्ठा की मांग करता है.

बोल वचन

इस बीच रहील शरीफ ने कश्मीर पर अपनी खोखली बयानबाजी को जारी रखा है और नवाज शरीफ को इसे झेलना होगा. हालांकि इस बीच इस बात के संकेत आए हैं कि सेना आतंकी संगठनों के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई के रास्ते में नहीं आएगी लेकिन इस बात की संभावा कम ही है कि वह अपनी पकड़ को यूं ही गंवा दे. 

कुछ दिखावे की कार्रवाई हो सकती है लेकिन शरीफ और सेना करीब दो महीनों तक का समय जरूर लेगी क्योंकि तब अगले सेना प्रमुख को लेकर स्थिति साफ हो जाएगी. तब तक तनाव की स्थिति रहेगी और पाकिस्तान का सार्वजनिक जीवन नारकीय बना रहेगा.

भारत के लिए खतरा यह है कि अगर पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ दिखावे की कार्रवाई करता है तो अमेरिका भारत को पाकिस्तान से बातचीत के लिए कह सकता है. भारत को हालांकि इस दबाव को तब तक झेलना चाहिए जब तक कि वह आतंकी संगठनों के खिलाफ की गई ठोस कार्रवाई को लेकर संतुष्ट नहीं हो जाता है. 

First published: 8 October 2016, 14:29 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी