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नोटबंदी पर ऊषा रामानाथन का नज़रिया हिला देने वाला है

सुहास मुंशी | Updated on: 24 November 2016, 8:02 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • नोटबंदी पर अभी तक का सबसे अलग और मौलिक नज़रिया ऊषा रामानाथन की तरफ़ से आया है. ऊषा नोटबंदी की जड़ें और उसके भविष्य की कहानी बता रही हैं. कहानी जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म से कम नहीं है.
  • ऊषा के मुताबिक नोटबंदी स्कीम के पीछे ताक़तवर अमीरों का एक समूह है जो किसी भी क़ीमत पर करोड़ों भारतीयों की तक़दीर अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं. 
  • उनके मुताबिक नोटबंदी की इस स्कीम में कालाधान वापस लाने जैसा कुछ भी नहीं है.

क़ानून की जानकार ऊषा रामानाथन मानवाधिकार और ग़रीबी पर लंबे समय से काम कर रही हैं. वह सरकार की आधार योजना की कट्टर आलोचक हैं. उनका मानना है कि आधार और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को समझे बिना नोटबंदी योजना के रहस्य को भेद पाना मुश्किल है. 

ऊषा कहती हैं, 'अब सारा खेल आंकड़ों का है. बहुत कुछ है इन आंकड़ों में. करोड़ों भारतीयों की निजी जानकारियों का अकूत भंडार जो अभी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के निर्माताओं के पास है. अब मान लीजिए कि इन्हीं आंकड़ों का इस्तेमाल एक यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एप्लीकेशन बनाने में होने लगे जो हमारे रुपयों का लेन-देन आसान कर दे.' 

इस एप्लीकेशन से होगा यह कि बैंक एक खाताधारक के अकाउंट में, एक खाताधारक दूसरे खाताधारक के अकाउंट में और सरकार किसी भी खाताधारक के अकाउंट में रुपए सुलभ तरीके से फ़ौरन ट्रांसफ़र कर पाएगी. मगर देश की इतनी बड़ी आबादी को प्रभावित करने वाला यह एक ऐसा क़दम है जो ना सिर्फ़ हमारी अर्थव्यवस्था को कैशलेस या पेपरलेस कर देगा बल्कि एक समय के बाद बैंकिंग व्यवस्था को भी खत्म कर देगा. 

और जब हमारी अर्थव्यवस्था में कैश की कमी हो जाएगी, तब हमारे सामने यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एप्लीकेशन को एक विकल्प के तौर पर लाने की कोशिश की जाएगी. इसका दूसरा ख़तरा यह होगा कि तब करोड़ों भारतीयों के वित्तीय लेन-देन का निजी डेटा ख़तरे में पड़ जाएगा.' 

ऊषा रामानाथन कहती हैं कि ख़ुद कल्पना करिए उस स्थिति के बारे में कि आपके वित्तीय लेनदेन का डेटा ऑनलाइन हो चुका है. फिर उसी डेटा का इस्तेमाल निजी कंपनियां रुपए बनाने के लिए कर रही हैं. अफ़सोस कि नोटबंदी के साथ जो सबसे बड़ी समस्या है, उस दिशा में हमारा ध्यान अभी तक नहीं गया है. 

सवाल-जवाब

नोटबंदी स्कीम को देखकर ऐसा लगता है कि इसके ढेर सारे फ़ायदे हैं मगर सच बात तो यह है कि हम इसके बारे में बहुत कम जानते हैं?

अभी तक सरकार ने यह साफ़ नहीं किया है कि उसने इसे क्यों लागू किया. 86 फ़ीसदी नक़दी चरणबद्ध तरीक़े से एक ठोस रणनीति के तहत क्यों नहीं हटाई गई? अभी तक यह भी पता नहीं चल पाया है कि प्रधानमंत्री को यह क़दम उठाने की सलाह आख़िर किसने दी? 

सरकार ग़रीबों के लिए चलने वाली सभी सरकारी योजनाओं के लाभ को सीधे अकाउंट में ट्रांसफर करने की व्यवस्था कर रही है जबकि देश का बैंकिंग तंत्र पूरी तरह इसके लिए तैयार नहीं है. जब सरकार की निरंतर उदासीनता से डाक सेवाएं बेहाल हैं, जब महंगाई नियंत्रण में है और रुपए का मूल्य तेज़ी से नहीं गिर रहा है, तो ऐसे में 86 फीसदी मुद्रा को अचानक से चलन से बाहर कर देना समझ से परे है. मगर जब आप इस पूरी प्रक्रिया को भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को आइने में देखते हैं, तब नोटबंदी का तिलिस्म समझ आने लगता है. 

आधार से नोटबंदी योजना का क्या रिश्ता है?

नोटबंदी क्या है? इसके लिए पहले यह समझना होगा कि इस वक़्त दुनिया में कंपनियां किस चीज़ के लिए मारा-मारी कर रही हैं. उनका सारा संघर्ष आंकड़ों का ज़खीरा हथियाने में लगा हुआ है. नई वित्तीय कंपनियां हमारे निजी आंकड़े हासिल करने के लिए युद्धस्तर पर जुटी हैं ताकि वे इन्हें बेच पाएं. वित्तीय कंपनियां अपनी सेवाएं मुफ़्त में देने के लिए आपके दरवाज़े पर खड़ी हैं, बशर्ते आप अपनी निजी जानकारी उनके हाथों में दे दें.  

देश की इतनी बड़ी आबादी की अहम जानकारियां वित्तीय कंपनियों के हाथ में जाने का मतलब है कि उन्हें सोने की खान मिल गई है. आधार के तहत यह हो चुका है. अब अगर करोड़ों की आबादी का आंकड़ा ऑनलाइन उपलब्ध है तो कोई भी उनका इस्तेमाल कर अपने लिए बेशक़ीमती संपत्ति खड़ी कर सकता हैं. 

अगर एक बार यह आंकड़ा जमा हो गया तो फिर एक प्लेटफॉर्म (एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) खड़ा करना आसान हो जाएगा जिसमें 100 करोड़ भारतीयों की निजी वित्तीय जानकारी से जुड़े आंकड़े होंगे. कल्पना करिए कि आंकड़ों का यह भंडार बाज़ार में कितनी संभावनाएं जगा सकता है. इसके बाद सरकार समेत लगभग सभी सेक्टर इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होंगे और फ़िर देभभर की आबादी के वित्तीय लेन-देन पर कुछ चंद ताक़तवर लोगों की निगरानी और कब्ज़ा होगा. 

इससे बड़े कारोबारियों को मुनाफ़ा होगा और हमारी अर्थव्यवस्था कैशलेस या कम कैश वाली अर्थव्यवस्था में बदल जाने के लिए मजबूर हो जाएगी. इस व्यवस्था में रकम बैंक खाते से बैंक खाते में नहीं बल्कि आधार से आधार में ट्रांसफ़र करने की सुविधा होगी. इसके लिए आपको सिर्फ़ आधार नंबर, जन-धन अकाउंट और एक मोबाइल नंबर की ज़रूरत होगी.   

इस स्थिति में बैंक बेकार हो जाएंगे. हमें किसी बैंक में जाने की जरूरत नहीं होगी. सबकुछ आभासी हो जाएगा, बिल्कुल पेटीएम की तरह. आप न तो यह जानते हैं कि पेटीएम का दफ़्तर कहां है और न ही वहां जाने की ज़रूरत महसूस करते हैं. मगर बैंकिंग व्यवस्था इसके उलट हैं जहां उसकी मौजूदगी ज़रूरी होती है. 

फिर आभासी बैंकिंग प्रणाली से समस्या क्या है? क्या इसमें ज़्यादा सहूलियत नहीं है कि हम अपना लेन-देन कैश या फॉर्म भरने की बजाय मोबाइल से कर लें? 

आप बारीक़ी से ग़ौर करें कि किस तरह नई वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसे लाया जा रहा है. पहले आधार योजना एच्छिक थी, बाद में यह अनिवार्य कर दी गई. सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए पहले आधार का होना ज़रूरी नहीं था लेकिन अब है. 

आधार योजना के दौरान यह डर बिल्कुल सही था कि हमारी निजी जानकारी ग़लत हाथों में जा सकती है. मगर इस बार डर बड़ा है. वह यह कि आपके वित्तीय लेन-देन का आंकड़ा बेचा जा रहा है जिससे निजी कंपनियां रुपए बनाएंगी. और सरकार देश को उस दिशा में धकेलने के लिए पूरी ताक़त लगा रही है.  

आधार के वक्त पैदा हुआ डर अब कई गुना बढ़ गया है. कल्पना करिए अगर आपका निजी वित्तीय डेटा नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को मिल जाए तो वो क्या करेगी? इस कंपनी का पंजीकरण कंपनी एक्ट के तहत है ना कि आरबीआई के जिसकी नज़र इन आंकड़ों पर है. अगर ये लोग ऐसी व्यवस्था अनिवार्य करवा दें कि अब हमारा सारा वित्तीय लेन-देन एक एप्लीकेशन आधारित इंटरफ़ेस (यूनीफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस) से होगा, तो? यह इंटरफ़ेस इन्हीं लोगों का होगा. 

आप ध्यान से देखिए इन सभी उपक्रमों के पीछे वही सारे लोग हैं. आधार, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और यूनीफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस आदि के पीछे इन्हीं लोगों का दिमाग है? ये वही लोग हैं जिन्होंने कुछ समय पहले कहा था कि सिस्टम को बदलने के लिए महज़ 100 लोगों की ज़रूरत है. वही लोग अब अपने मक़सद में कामयाब होते दिख रहे हैं और देश का भाग्य तय करने में लगे हैं. कल्पना करिए कि सौ करोड़ की आबादी से ज़्यादा वाला यह देश किस दिशा में आगे बढ़ेगा? यह सिर्फ़ 100 ताक़तवर लोग तय करेंगे.  

इससे भी बुरा यह है कि अभी तक देश की बहुत बड़ी आबादी नियमित बैंकिंग प्रणाली का हिस्सा नहीं हो सकी है. उनका ना बैंक में खाता है और ना ही इंटरनेट तक पहुंच. इस लिहाज़ से सोचिए कि अगर सरकार मनरेगा, पेंशन, छात्रवृत्तियां और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं का लाभ इलेक्ट्रॉनिक इंटरफ़ेस के ज़रिए करना चाह रही है तो क्या होगा? कितने लोग इन योजनाओं के लाभ से वंचित हो जाएंगे?  

क्या इस क्षेत्र के अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ आपके इन विचारों से सहमत हैं?

मुझे नहीं लगता और मुझे मालूम भी नहीं कि कोई इस दिशा में सोच रहा है. 

आधार और यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस के बाद ये लोग क्या कर सकते हैं?

स्वास्थ्य. अब वो लोग स्वास्थ्य सेक्टर की तरफ़ बढ़ेंगे.

First published: 24 November 2016, 8:02 IST
 
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