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सॉफ्ट हिंदुत्व: उत्तर प्रदेश में कांग्रेस फिर वही गलती दोहरा रही है जिसके चलते गुजरात में वह हाशिए पर पहुंच गई है

अनिल के अंकुर | Updated on: 30 August 2016, 7:55 IST

क्या कांग्रेस बदल रही है? सोच और बर्ताव दोनों मोर्चों पर. उत्तर प्रदेश में यह बदलाव नजर आ रहा है, विधानसभा चुनाव के ठीक पहले. पहली बार ऐसा हुआ है कि कांग्रेस ने चुनाव से बहुत पहले अपने मुख्यमंत्री पद के दावेदार का नाम घोषित कर दिया है. दूसरा बड़ा बदलाव यह दिख रहा कि कांग्रेस अपनी छवि हिंदूवादी पार्टी के रूप मे दिखलाने के प्रयास में जुटी है. बड़े ही शातिर और प्रतीकात्मक तरीके से कांग्रेस इस कोशिश में लगी हुई है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने विभिन्न चरणों में अपनी यात्राएं शुरू की हैं. इन यात्राओं में कांग्रेस ने अपनी पुरातन सोच और बर्ताव में परिवर्तन किया है. कांग्रेस नई ऊर्जा के साथ उत्तर प्रदेश में अपने चुनाव अभियान को आगे बढ़ा रही है. उसने चुनावी प्रचार को व्यवस्थित और आकर्षक रूप देने की कोशिश की है. पुराने कांग्रेसियों को जोड़ने के लिए हिन्दुत्व का छौंका लगाना भी शुरू कर दिया है.

हिंदी हैं हम हिंदू हैं हम

हिंदी हैं हम हिन्दू हैं हम का छौंका उन दलों को जवाब देने के लिए लगाया जा रहा है जो पूरी तौर से हिन्दुत्व की लड़ाई लड़कर कांग्रेस को एक वर्ग विशेष से जोड़ते थे. यही कारण है कि इस बार कांग्रेस ने यूपी के चुनाव में अंग्रेजी-दॉ शैली वाले नेताओं को दूर रखा है. कांग्रेस ने इस दिशा में कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एकजुट करने में काफी हद तक सफलता भी पाई है.

सिने स्टार राज बब्बर को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने के मौके पर निकली एक रैली में लोगों की अच्छी खासी शिरकत रही. जब शीला दीक्षित मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार घोषित की गईं, तब भी ऐसा ही हुआ. प्रदेश कार्यालय में उन्होंने भाषण भी दिया. उसके बाद कांग्रेस ने अपने केंद्रीय कार्यालय से यूपी की तीन दिवसीय यात्रा के लिए बस रवाना की, जिसमें प्रदेश के सारे खास नेता बैठे थे.

कांग्रेस के इस भारी-भरकम काफिले की यात्रा कानपुर में खत्म हुई. जाहिर सी बात है कि इस दौरान नेताओं ने अनेक सभाओं को संबोधित किया. उसके बाद राहुल गांधी की लखनऊ में एक विशेष सभा हुई. इसके लिए अनोखा मंच बनाया गया था. उन्होंने कार्यकर्ताओं द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए. उसके बाद सोनिया गांधी ने अभियान की शुरुआत नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में रोड शो के साथ की.

अभी यात्राओं का दौर खत्म नहीं हुआ है. अभी कांग्रेस की प्रदेश में यात्राएं चल रही हैं. इस तरह के अनेक कार्यक्रम कांग्रेस और आयोजित करने वाली है. लेकिन इन सभी यात्राओं की शुरुआत में वही सब किया गया जो अब तक भाजपा करती आई थी. मतलब यात्रा की शुरुआत के पहले नारियल फोड़ा गया. शंखनाद और घंटे-घडिय़ाल की आवाज के बाद यात्रा शुरु हुई. आरती और रोली चंदन भी किया गया. कुल मिलाकर जनता के बीच हिंदुत्ववादी छवि दिखाने की कोशिश की गई.

कांग्रेस की नई स्टाइल शीट में क्या है खास

बीते विधानसभा चुनावों को याद करें तो पता चलेगा कि किस तरह कांग्रेस ने चुनावी संग्राम में गोता लगाया. सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन पर उनके संसदीय क्षेत्र फूलपुर से चुनावी अभियान की शुरुआत की थी.

उन्होंने अकेले 125 से ज्यादा सभाएं की थीं. परिणाम में 28 सीट और 11.53 प्रतिशत मत ही मिले. अब हालात बदलने के लिए प्रशांत किशोर को रणनीतिक सलाहकार बनाया है. अभी तक के सारे कार्यक्रमों की योजना प्रशांत किशोर ही बना रहे हैं.

कहा जा रह है कि उन्हीं की सलाह पर एक ब्राह्मण को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया है. कांग्रेस ने बस यात्रा की रवानगी हिंदू कर्मकांड और शंख ध्वनि से की, इसे भी हम कांग्रेस की नई स्टाइल शीट का हिस्सा कह सकते हैं जिसमें हिंदुत्व की तड़का साफ देखी जा सकता है.

बनारस में सोनिया का दर्शन-पूजन

मोदी के गढ़ वाराणसी में सोनिया गांधी के कार्यक्रमों में काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा एवं गंगा आरती में भाग लेना भी शामिल था. ये अलग बात है कि उनके बीमार हो जाने के कारण यह सब न हो सका. बिना मंदिर गए और बिना नाम लिए हिंदुत्व की छौंक लगाने में कांग्रेस सफल रही.

इसके अलावा भी कांग्रेस ने मुसलमानों, दलितों और ब्राह्मणों की जो तिकड़ी बनाई है उससे इस बार परिणाम अच्छे आने की आस कांग्रेसी लगाए बैठे हैं और कहते हैं कि भइया मेहनत रंग लाएगी.

पार्टी इस बार अपने पुराने तौर-तरीके में बदलाव कर रही है. दरअसल, कांग्रेस ने अपने प्रचार का तरीका बदला है. रैली का आयोजन किया तो, अलग तरीके से, मंच भी बिल्कुल अलग बनाया. शो का भी ढांचा पहले जैसा नहीं है. अब देखना यह है कि कांग्रेस ने अपनी पुरातन धरोहरों और कांग्रेस संस्कृति को छोड़कर नए तरीकों को इस्तेमाल वहां किया है जहां 27 सालों से कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता रहा है. 403 सीटों में 28 सीटों पर पहुंचने वाली कांग्रेस अपना कल्चर त्यागने के बाद कितने मुनाफे में जाती है या फिर कितने घाटे में इसके लिए इंतजार करना होगा.

First published: 30 August 2016, 7:55 IST
 
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