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संगठन में शक्ति है, इसके बिना शीला और राज क्या करेंगे

अतुल चौरसिया | Updated on: 17 July 2016, 15:49 IST
(कैच न्यूज)

2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी लखनऊ में 10-15 संपादकों के साथ एक पांच सितारा होटल में बातचीत कर रहे थे. उन्होंने संपादकों से कहा कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी में एक विकेंद्रीकृत और लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव डाली है. सत्ता का डीसेंट्रलाइजेशन और लोकतंत्रीकरण उनकी पहली प्राथमिकता है. जबकि मोदी के नेतृत्व में भाजपा इसके एकदम विपरीत व्यवहार कर रही है.

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इस पर वहां मौजूद एक संपादक ने सवाल किया कि हाल ही में आपने उत्तराखंड में विजय बहुगुणा को उत्तराखंड का सीएम नियुक्त किया है. वो अपने दम पर राज्य में एक विधानसभा चुनाव तक नहीं जीत सकते, उनका उत्तराखंड से सीधा कोई जुड़ाव तक नहीं था, यह किस तरह का लोकतंत्रीकरण है.

इस सवाल पर राहुल गांधी को झेंपना पड़ा. उनके बचाव में पार्टी के दूसरे कार्यकर्ता उतर आए और व्यावहारिक राजनीति की दुहाई देकर बात टाल दी गई.

राज बब्बर के रूप में पार्टी को मिला एक लोकप्रिय चेहरा

आज जब उत्तर प्रदेश एक बार फिर से चुनाव के मुहाने पर है तब फिर से कांग्रेस में वही प्रवृत्तियां उभार पर हैं. कांग्रेस का इतिहास इस तरह के दुस्साहसों से भरा पड़ा है. कांग्रेस नेतृत्व ने हाल ही में राज बब्बर को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया है, दिल्ली की बुजुर्ग हो चली पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को प्रदेश का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद को प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है. प्रदेश के हर हिस्से को प्रतिनिधित्व देने की नीयत से पांच नए उपाध्यक्ष भी बना दिए गए हैं.

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इस लिहाज से देखने पर यह एक संपूर्ण, सुसज्जित टीम नजर आती है. लेकिन क्या यही सच है? इस नई टीम को पार्टी के पुराने कार्यकर्ता, पार्टी पदाधिकारी कैसे देखते हैं. बनारस इकाई के एक पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ता इसे दो टूक शब्दों में समेटते हुए कहते हैं, 'एक हफ्ते में कांग्रेस ने अपनी बढ़त का पचास फीसदी कम कर दिया.' इसे समझाते हुए वे बताते हैं, 'कांग्रेस ने राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर जो बढ़त बनाई थी शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे गंवा दी है.' लेकिन बात इतनी भर नहीं है.

शीला दीक्षित की उम्र, उनका बाहरी होना और राज बब्बर की उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुताबिक राजनीतिक काबिलियत आदि ऐसे तथ्य हैं जिन पर आम कांग्रेस कार्यकर्ता से लेकर राज्य स्तरीय नेता तक माथापच्ची कर रहे हैं. कुछ के पास इसके पक्ष में तर्क हैं तो बहुत सारे आलाकमान के इन फैसलों से निराश हैं.

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उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत पार्टी के ताजा फैसलों से अह्लादित हैं. उनके शब्दों में, 'पार्टी के पास इससे बेहतर कॉम्बिनेशन हो ही नहीं सकता था. गुलाम नबी आजाद पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, उनकी समझदारी, कद, वरिष्ठता से पार्टी में किसी भी तरह की अंदरूनी उठापटक को विराम लगेगा. राज बब्बर के रूप में पार्टी को एक लोकप्रिय चेहरा मिला है. गांधी परिवार को छोड़कर उनके कद का एक भी लोकप्रिय चेहरा उत्तर प्रदेश में नहीं है. शीला दीक्षित का 15 साल का कार्यकाल विकास का पूरक है. उत्तर प्रदेश में अखिलेश हो या मोदी सब लोग विकास के मुद्दे पर ही चुनाव में उतरेंगे. ऐसे में हमारे पास शीला के रूप में विकास का बेहतर चेहरा होगा.'

राज बब्बर की दिक्कत

राजपूत की बात को लखनऊ में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू एक अन्य नजरिए से देखते हैं. उनके मुताबिक राज बब्बर को अध्यक्ष बनाने का फैसला फिर से पार्टी आलाकमान की मानसिकता को दर्शाता है.

1996 में राज बब्बर को मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ लोकसभा सीट से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ उतार दिया था. हालत यह रही कि उन्हें लखनऊ शहर के वार्डों तक की जानकारी नहीं थी. वह चुनाव उनके लिए पूरी तरह से दु:स्वप्न सिद्ध हुआ.

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हालांकि इन सालों के दौरान राज बब्बर ने राजनीति में लंबी छलांग लगाई है. अब तक वे तीन लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. आगरा का सांसद रहते हुए उनके बेहतर कामकाज की काफी चर्चा हुई थी. लेकिन उत्तर प्रदेश के विशाल आकार और जटिल राजनीतिक स्वरूप को देखते हुए यह सवाल फिर भी बहुत बड़ा है कि क्या राज बब्बर में इतने बड़े राज्य और उसकी जटिलताओं, गुटों, जातियों और धर्मों में बंटी राजनीति को साधने के लिए जरूरी हुनर, दांवपेचों की समझ है या नहीं.

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राजू बहुत वाजिब चिंता जताते हैं. अगर उनके अंदर यह समझ नहीं विकसित हुई तो इस बात का खतरा बहुत बड़ा है कि वे लखनऊ मुख्यालय में बैठने वाले नेताओं की बातों में फंस कर रह जाएं और हकीकत से उनका साबका ही न पड़े. इसकी संभावना बहुत ज्यादा है.

पांच नए उपाध्यक्ष भी प्रदेश में नियुक्त

राज बब्बर के साथ ही कांग्रेस ने पांच उपाध्यक्ष भी प्रदेश में नियुक्त किया है. इनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से इमरान मसूद जो कि अल्पसंख्यक चेहरा भी हैं. हालांकि इनका दागदार अतीत उनके आड़े आ सकता है. अन्य उपाध्यक्ष बनारस के राजेश मिश्रा है जो सांसद भी रह चुके हैं. उनके जरिए पार्टी ने पूर्वाचंल और ब्राह्मण जैसे समीकरणों को साधने की कोशिश की है.

लेकिन राजेश मिश्रा के बारे में पार्टी के एक स्थानीय कार्यकर्ता की बात तवज्जो देने लायक है, 'राजेश मिश्रा शीला दीक्षित और राज बब्बर के किसी काम आ पाएंगे इसमें संदेह है. उनकी अपने क्षेत्र में राजेशपति त्रिपाठी के साथ इतनी घोर गुटबाजी चलती रहती है कि वे अपने विधानसभा चुनाव क्षेत्र में ही सुकून से नहीं बैठ पाएंगे तो पार्टी के लिए क्या काम करेंगे.'

दो अन्य उपाध्यक्ष हैं आरपीएन सिंह और भगवती चौधरी. एक कुर्मी हैं दूसरे दलित. इस तरह से जातियों का समीकरण पार्टी ने साध लिया है. भगवती चौधरी के सिर पर सबसे लंबी और सबसे सफल भीम ज्योति यात्रा संपन्न करवाने का ताज है. पार्टी में उन्हें राहुल गांधी की पसंद भी माना जाता है.

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पार्टी की सोच है कि राज बब्बर पिछड़ा और शीला दीक्षित का अगड़ा चेहरा उसकी किस्मत बदल सकता है. लेकिन राज बब्बर को लेकर पार्टी की जो सोच है उसे जनता कैसे देखती है इसे दिलचस्प शब्दों में लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान ने बयान किया- 'राज बब्बर ओबीसी हैं, पहले इस बात को बताने के लिए कांग्रेस को घर-घर अभियान चलाना होगा.'

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव इमरान अहमद इस पूरी टीम को लेकर बेहद आशान्वित हैं. वो कहते हैं, 'लंबे समय बाद कांग्रेस पार्टी ने एक संपूर्ण टीम बनाई है. इसमें लोगों को खींचने की ताकत भी है, जातियों और धर्मों का भी सही संतुलन है. राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से यूथ एक बार फिर से पार्टी से जुड़ेगा.'

ज्यादातर कार्यकर्ताओं को राज बब्बर से ज्यादा शीला को सीएम बनाने के फैसले पर अचरज है. प्रदेश में प्रमोद तिवारी, जितिन प्रसाद के रूप में कांग्रेस के पास अपेक्षाकृत युवा और कहीं ज्यादा यूपीवाला चेहरे मौजूद थे. प्रमोद तिवारी नौ बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं. लेकिन उनकी मुलायम सिंह यादव के साथ दबे-छिपे चलने वाली गलबहियों के कारण कांग्रेस आलाकमान उनसे हमेशा सशंकित ही रहता है. फिलहाल वे राज्यसभा में भी सपा के समर्थन से पहुंचे हैं.

कांग्रेस पार्टी की सोच है कि राज बब्बर पिछड़ा और शीला दीक्षित का अगड़ा चेहरा उसकी किस्मत बदल सकता है

पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत में इन हालिया फैसलों के पीछे एक बड़ी भूमिका प्रशांंत किशोर और उनकी टीम की कार्यशैली की भी सामने आ रही है. लखनऊ के मॉल एवेन्यू स्थिति पार्टी कार्यालय में तैनात एक नेता बताते हैं, 'नई टीम के आने से पार्टी के भीतर माहौल थोड़ा सुधर जाएगा. अब तक प्रशांत किशोर और उनकी टीम जिस तरह से काम कर रही थी उससे पार्टी के एक बड़े वर्ग में काफी असंतोष था. हो सकता है यह उनके कामकाज का पेशेवर तरीका हो लेकिन उत्तर प्रदेश में उस तरह से काम नहीं हो सकता जैसे दिल्ली में वो करते हैं. मसलन कई बार वो और उनके लोग प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री को मि. निर्मल कह कर बुलाते थे. आमतौर पर यहां खत्रीजी या अध्यक्षजी कहने का चलन है. आधे नेता-कार्यकर्ता इसी बात से भन्नाए रहते थे. इस कल्चरल गैप से बहुत बड़ी समस्या पैदा हो रही थी. उम्मीद है इन लोगों (बब्बर, दीक्षित) के आने से उनके ऊपर लगाम लगेगी. इस शैली से क्या होता था कि बड़े और वरिष्ठ कार्यकर्ता एकदम से बिदक जाते थे. उत्तर प्रदेश में अभी भी बड़े पैमाने पर सामंती मानसिकता मौजूद है.'

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जिन कार्यकर्ताओं की बात नेताजी कर रहे हैं उन्हें लेकर भी एक बड़ा संशय पार्टी में है. आज की तारीख में कांंग्रेस के पास अपने कार्यकर्ताओं को देने के लिए कुछ नहीं है. केंद्र में उसकी सरकार है नहीं, उत्तर प्रदेश में वह लंबे समय से हाशिए पर है. इलाहाबाद के एक बुजुर्ग कांग्रेसी नेता कहते हैं, 'इतने लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहने का नतीजा यह है कि आज बूथ स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ता ही नहीं बचे हैं. पार्टी के पास कार्यकर्ताओं को डालने के लिए कोई चारा नहीं है. तो बूथ पर कांग्रेस के लिए कौन खड़ा होगा.'

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इस समस्या से निपटने के लिए प्रशांत किशोर ने पार्टी टिकट की उम्मीद रखने वाले हर उम्मीदवार से संबंधित विधानसभा क्षेत्र में हर बूथ पर पांच कार्यकर्ता की अनिवार्यता कर दी है.

कार्यकर्ताओं के लिए चारे के अभाव में पार्टी द्वारा की जा रही इस पूरी कवायद का क्या मतलब है? क्या इससे पार्टी के दिन फिरने की कोई संभावना है? सूत्र बताते हैं कि इस पूरी कवायद से एक अच्छी बात यह हुई है कि गुटों और लॉबियों में बंटी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पास फिलहाल एक ऐसा नेतृत्व समूह है जिस पर सभी गुटों और समूहों की आम सहमति है. एक तरह से ये आम सहमति वाले उम्मीदवार भी हैं.

लेकिन कार्यकर्ता इसे देर से की गई कवायद मानते हैं. राजपूत कहते हैं, 'पार्टी अगर यह निर्णय छह से आठ महीना पहले कर लेती तो हम ज्यादा फायदे की स्थिति में होते. जिन सीटों पर कांग्रेस की स्थिति ठीकठाक थी ऐसे कम से कम डेढ़ सौ उम्मीदवारों के नाम अब तक घोषित हो जाने चाहिए थे.'

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इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि एक ब्राह्मण बहुल सीट पर अगर कांग्रेस ने सबसे पहले एक ब्राह्मण उम्मीदवार उतार दिया तो इस बात की संभावना बहुत बढ़ जाती है कि बाकी पार्टियां ब्राह्मण की बजाय दूसरी जातियों के उम्मीदवार ढूंढ़ेगीं. उस स्थिति में बाकी पार्टियां कांग्रेस की रणनीति के मुताबिक अपनी रणनीति तय करेंगी. यह बढ़त की स्थिति होती. जबकि आज की स्थिति में कांग्रेस दूसरी पार्टियों के पीछे-पीछे चल रही है. बाकी दलों ने अपने उम्मीदवार घोषित कर दिया है और कांग्रेस उनके मुताबिक अपनी रणनीति तय करने को मजबूर है.

राज बब्बर और शीला को लाया गया है कांग्रेस को आगे ले जाने के लिए लेकिन विडंबना और यथार्थ ऐसा है कि शायद उन्हें बाकियों के पीछे-पीछे ही चलना पड़े.

First published: 17 July 2016, 15:49 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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