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मुफ्फरनगर दंगा: नेताओं को क्लीन चिट, पुलिस की नाकामी

अभिषेक पराशर | Updated on: 9 March 2016, 14:04 IST
QUICK PILL
  • जस्टिस विष्णु सहाय आयोग ने मुजफ्फरनगर दंगों की जिम्मेदारी से समाजवादी पार्टी को बड़ी राहत दी है. 
  • आयोग की रिपोर्ट बसपा और भाजपा नेताओं के लिए भी राहत लेकर आई है. जिन नेताओं पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप था उन सबको नजरअंदाज करते हुए आयोग ने पुलिस अधिकारियों के सिर ठीकरा फोड़ने की कोशिश की है. 
  • दंगों को लेकर चौतरफा आलोचना और दबाव के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने ही विष्णु सहाय की अध्यक्षता में मुजफ्फरनगर दंगों की जांच के लिए एक सदस्यीय आयोग का गठन किया था.

मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगे की जांच को लेकर गठित विष्णु सहाय आयोग ने करीब ढाई साल बाद अपनी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी है. कानून और व्यवस्था राज्य के क्षेत्राधिकार में होने के बावजूद आयोग ने समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार को बड़ी राहत देते हुए उसे क्लीन चिट दे दिया है.

साल 2013 में मुजफ्फरनगर में हुई व्यापक सांप्रदायिक हिंसा में करीब 60 लोग मारे गए थे. दंगा भड़काने और भड़काऊ भाषण देने के मामले में आरोपी अन्य नेताओं के खिलाफ पहले से चल रहे मुकदमों का हवाला देते हुए उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं किए जाने की सिफारिश भी आयोग ने की है. 

अन्य आयोगों के मुकाबले सहाय आयोग की रिपोर्ट इस मामले में अलग है कि सरकार को क्लीन चिट देने के अलावा जिन अन्य आरोपियों को इससे राहत मिली है उन्होंने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए सपा सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है. दूसरा आयोग ने सरकार की जिम्मेदारी तय करने की बजाए स्थानीय प्रशासन और मीडिया की भूमिका को कटघरे में खड़ा किया है.

इस हिंसा के बाद करीब 50,000 मुसलमानोंं को अपना घर-बार छोड़कर शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा था

यू-ट्यूब पर तालिबान का वीडियो क्लिप अपलोड करने के मामले में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) विधायक संगीत सोम और 30 अगस्त 2013 को शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद फक्कारशाह चौक पर भड़काऊ भाषण देने के मामले में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के तत्कालीन सांसद कादिर राणा समेत करीब 229 अन्य लोगों के खिलाफ पहले से दर्ज मुकदमों का जिक्र करते हुए आयोग ने कहा, 'हमारे मत में संविधान के अनुच्छेद 20 (2) के अंतर्गत इनके खिलाफ कोई अन्य दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती.'

नेता बरी, प्रशासन दोषी

आयोग ने दंगों के लिए पूरी तरह से स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार करार दिया है. करीब 700 पन्नों की रिपोर्ट में आयोग ने मुजफ्फरनगर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) सुभाष चंद्र दुबे और खुफिया विभाग के अधिकारी प्रबल प्रताप सिंह के सिर पर सारी जिम्मेदारी डालकर इनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है. 

सेंटर फॉर ऑब्जेक्टिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट के डायरेक्टर अतहर हुसैन बताते हैं, 'दंगों के मामले में बनने वाले जांच आयोग की यह सबसे बड़ी विडंबना है. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दंगों के लिए मामूली अधिकारियों को जिम्मेदार बताया है. और अगर अधिकारी ही इसके लिए जिम्मेदार थे तो फिर केवल मुजफ्फरनगर के अधिकारी ही क्यों. शामली के क्यों नहीं?'

विष्णु सहाय आयोग ने मुजफ्फरनगर में दंगा भड़काने के मामले में मीडिया की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा किया है

कवाल घटना (27 अगस्त 2013) का जिक्र करते हुए रिपोर्ट बताती है, 'पश्चिमी उत्तर प्रदेश विशेष रूप से मुजफ्फरनगर एवं शामली जनपदों में संबंधित घटनाओं की वजह से हिंदू और मुस्मिल समुदाय के बीच सांप्रदायिक मतभेद बेहद खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया.'

रिपोर्ट के मुताबिक, 'प्रबल प्रताप सिंह 7 सितंबर 2013 को नगला मंडौर की महापंचायत में शामिल होने वाले लोगों की सही संख्या के बारे में खुफिया सूचना देने में विफल रहे जिसकी वजह से इन जनपदों में हिंसा हुई और सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ा.' 

रिपोर्ट बताती है, 'खुफिया विभाग ने 15-20 हजार लोगों के जमा होने की जानकारी दी थी लेकिन पंचायत में 40-50 हजार लोगों की भीड़ जुट गई. ऐसी स्थिति में सभी योजनाएं धरी की धरी रह गई.' 

आईबी के  एक अधिकारी बताते हैं, 'भीड़ की संख्या को लेकर हम अनुमान ही लगा सकते हैं. जब पूरा इलाका ध्रुवीकरण की चपेट में हो तो लोगों की संख्या के बारे में सटीक अनुमान देना वैसे भी संभव नहीं.' 

मायावती ने सहाय आयोग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए आयोग की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं

आयोग के नतीजों को लेकर केवल अधिकारी ही ऐसा नहीं सोच रहे हैं. हुसैन बताते हैं, 'सहाय आयोग पिछले अन्य आयोगों के मुकाबले अलग नहीं है. और दूसरी बात कि सरकारें कभी भी आयोग की सिफारिशों को गंभीरता से नहीं लेती, उन्हें लागू करना दूर की बात है.' 

यह अलग बात है कि इस आयोग में लागू करने जैसी कोई सिफारिश भी नहीं की गई है. 

रिपोर्ट पर सवाल

अब सहाय आयोग की रिपोर्ट पर राजनीति भी शुरू हुो गई है. यह समाजवादी सरकार के लिए नई मुसीबत है. बसपा सुप्रीमो मायावती ने सहाय आयोग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा, 'यह समाजवादी पार्टी को बचाने की कोशिश है.' 

आयोग की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने कहा, 'रिपोर्ट से यह बात साबित होती है कि आयोग का काम दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करना और न्याय देना नहीं बल्कि सरकार को क्लीन चिट देना था.' 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मायावती का बड़ा वोट बैंक  है और यहां पर सपा की राजनीति मुस्लिम मतदाताओं पर टिकी है. मायावती ने 'सर्व समाज' विशेषकर मुस्लिम समुदाय का जिक्र करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि वह इस बारे में सोचे कि अगर समाजवादी पार्टी की सरकार सत्ता में रहती है तो उनकी जिंदगी, संपत्ति और धर्म की क्या कीमत रह जाएगी.

मायावती ने कहा कि मुजफ्फरनगर दंगा समाजवादी पार्टी और बीजेपी की सहमति से हुआ था. उन्होंने कहा, 'प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने के बदले सरकार बीजेपी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रही है जो प्राथमिक तौर पर इसके लिए दोषी हैं.'

उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को लेकर बीजेपी कटघरे में रही है तो सपा पर बीजेपी के प्रति नरम होने का आरोप है

वहीं बीजेपी ने सहाय आयोग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने की मांग की है. बीजेपी का कहना है कि सरकार एक सदस्यीय आयोग की मदद से अपनी भूमिका पर पर्दा डालना चाहती है. 

बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव श्रीकांत शर्मा ने कहा, 'समाजवादी पार्टी दंगों के लिए जिम्मेदार है. उसने वोट बैंक की राजनीति की खातिर दंगों को भड़काया. अगर उसने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की होती तो दंगा नहीं भड़कता.'

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को लेकर बीजेपी कटघरे में रही है और समाजवादी पार्टी पर बीजेपी को लेकर नरम रुख अख्तियार किए जाने का आरोप लगता रहा है. 

हुसैन बताते है कि बीजेपी सहाय आयोग की रिपोर्ट को इसलिए खारिज कर रही है कि क्योंकि इसने उसके नेताओं को क्लीन चिट देकर उसके सांप्रदायिक राजनीति को पटरी से उतार दिया है. उन्होंने कहा, 'बीजेपी इस मुद्दे को जिंदा रखना चाहती है. रिपोर्ट में अगर उसके नेताओं की भूमिका साबित होती है तो उसे हिंदुओं के पक्ष में खड़ा होने का मौका मिलता. धुव्रीकरण की उनकी राजनीति को रिपोर्ट ने झटका दिया है इसलिए वह इसका विरोध कर रहे हैं.'

सरकार पर सवाल

दंगों को लेकर पहली जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनती है. सहाय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं कहा है जो राज्य सरकार की जिम्मेदारी तय करता है. 

मुजफ्फरनगर में जब जाटों का धुव्रीकरण हो रहा था तो उसे लखनऊ में जानबूझकर नजरअंदाज किया गया. लखनऊ के एक बड़े अधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री की प्रमुख सचिव अनीता सिंह ने जाटों का धुव्रीकरण होने दिया. सिंह जाट समुदाय से ताल्लुक रखती है और वह सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह की पसंदीदा अधिकारियों में से एक हैं.

अधिकारी ने बताया कि जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धु्रवीकरण हो रहा था तब सरकार ने इसे हवा दी. बाद में 'जब जांच आयोग का गठन किया गया तो उसे केवल मुजफ्फरनगर पर ही ध्यान देने को कहा गया.' 

चुनावी माहौल में किसी दल या नेता को दोषी ठहराने का खामियाजा उठाना पड़ सकता था इसलिए दंगों के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर दी गई.

हुसैन बताते हैं कि अभी तक के जांच आयोग के रिकॉर्ड को देखते हुए हमें सहाय आयोग से बहुत उम्मीद नहीं थी. हालांकि हमें लग रहा था कि आयोग यू-ट्यूब पर गलत वीडियो अपलोड करने और 30 अगस्त 2013 को फक्कारशाह चौक पर तत्काली बसपा सांसद कादिर राणा समेत अन्य लोगों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देकर दंगा भड़काने के मामले में कठोर कार्रवाई की सिफारिश करता. उन्होंने कहा, 'आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दंगा भड़काने के मामले में इनकी भूमिका को स्वीकार तो किया है लेकिन किसी कार्रवाई की सिफारिश नहीं की है.'

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First published: 9 March 2016, 14:04 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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