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यूं ही नहीं बदनाम है उत्तर प्रदेश पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के लिए

अभिषेक पराशर | Updated on: 6 August 2016, 13:51 IST
QUICK PILL
  • बुलंदशहर सामूहिक बलात्कार कांड के बाद उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में पुलिस हिरासत में वाल्मीकि समाज के युवक की संदिग्ध मौत का मामला सामने आया है. 
  • आरोप है कि पुलिस की यातना के चलते युवक ने थाने में दम तोड़ दिया. राज्य की पुलिस हिरासत में लिए गए आरोपियों के साथ बर्बर और क्रूर तरीके से पेश आती है.
  • उत्तर प्रदेश देश के उन तीन शीर्ष राज्यों में शामिल हैं जहां सबसे ज्यादा हिरासत में मौत के मामले सामने आते हैं.

बुलंदशहर सामूहिक बलात्कार कांड के बाद उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में पुलिस हिरासत में वाल्मीकि समाज के युवक की संदिग्ध मौत के बाद राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. 

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश देश के उन तीन कुख्यात राज्यों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा हिरासत में मौत के मामले सामने आते हैं. 

बुलंदशहर बलात्कार कांड के बाद दबाव में आई उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस हिरासत में हुई मौत के मामले में फौरी कार्रवाई करते हुए पूरी पुलिस चौकी को निलंबित कर दिया है. 

खबरों के मुताबिक कानपुर जिले में स्थित चकेरी थाने की अहिरवां पुलिस ने गुरुवार को वाल्मीकि समाज के एक युवक कमल वाल्मीकि को हिरासत में लिया था. बाद में इस युवक की मौत चौकी में ही संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई. पुलिस ने चोरी के आरोप में कमल हिरासत में लिया था लेकिन बाद में संदिग्ध हालत में उसका शव मिला.

इस मामले में तत्काल कार्रवाई करते हुए सरकार ने चौकी के प्रभारी योगेंद्र सिंह के अलावा चौकी में तैनात सभी सिपाहियों को निलंबित करते हुए पांच पुलिसकर्मियों और तीन मुखबिरों के खिलाफ अपहरण और हत्या का मामला दर्ज किया है.

कमल के परिजनों का कहना है कि पुलिस हिरासत में बर्बर तरीके से हुई पिटाई की वजह से उसकी मौत हो गई. कमल के साथ एक और युवक को भी हिरासत में लिया गया था, जो फिलहाल लापता बताया जा रहा है.

पुलिस के मुताबिक कमल के ऊपर पहले से अपराध के कई मामले दर्ज हैं और इसी वजह से उसे पूछताछ के लिए पुलिस चौकी बुलाया गया था.

अपराध और भ्रष्टाचार को रोकने में विफल रही उत्तर प्रदेश पुलिस के दामन पर हिरासत में की जाने वाली बर्बरता के दाग भी लगे हुए हैं. यह एक आम धारणा है कि राज्य की पुलिस हिरासत में लिए गए आरोपियों के साथ बर्बर और क्रूर तरीके से पेश आती है. तमाम मानवाधिकार संगठनों की समय समय पर आने वाली रपटों में इस बात की पुष्टि की गई है.

कानपुर में हिरासत में वाल्मीकि समाज के युवक की संदिग्ध मौत के बाद यूपी पुलिस सवालों के घेरे में है.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2013 में कुल 97 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हुई थी जो 2012 के मुकाबले करीब 37 फीसदी अधिक थी. यह संख्या उन लोगों की है जिन्हें अदालत ने पुलिस हिरासत में नहीं भेजा था बल्कि पुलिस ने इन्हें खुद पूछताछ के लिए उठाया था. 

2013 में महाराष्ट्र में सबसे अधिक 34 लोग पुलिस हिरासत में मारे गए. दूसरे पायदान पर तमिलनाडु रहा जहां 15 लोग पुलिस की हिरासत में मारे गए. उत्तर प्रदेश में पुलिस की हिरासत में 14 लोग मारे गए. चौथे नंबर पर गुजरात रहा जहां पुलिस की हिरासत में 13 लोगों की जान गई.

उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बड़े अधिकारी बताते हैं, 'हिरासत के दौरान होने वाली मौत पर विभागीय खानापूर्ति कर पुलिसवालों को बचा लिया जाता है. इनके खिलाफ आपराधिक मामले नहीं दर्ज किए जाते. घटना के तत्काल बाद भले ही उन्हें सस्पेंड कर उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाती है लेकिन आगे इस कार्रवाई को कोई नतीजा नहीं निकलता.'

आंकड़े उस पुलिस अधिकारी के दावे की पुष्टि करते हैं. 2014 में पुलिसवालों के खिलाफ की गई कुल शिकायतों में से सिर्फ 25.4 फीसदी मामलों में जांच के आदेश दिए गए और इनमें भी सिर्फ 42.1 फीसदी शिकायतों को सही पाया गया. यानी उत्तर प्रदेश में पुलिस वालों के खिलाफ कुल शिकायतोंं के मुकाबले करीब 10 फीसदी मामलों की ही ठीक से जांच संभव हो पाती है.

देश भर में हिरासत में हुई कुल मौत में इन चारों राज्यों (उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात) की हिस्सेदारी 78.4 फीसदी है. चौंकाने वाली बात यह रही कि अदालत की तरफ से पुलिस रिमांड पर भेजे जाने के मामले में 21 मौतें हुईं और इसमें 2012 के मुकाबले 2013 में 44.7 फीसदी की गिरावट आई है. वहीं पुलिस द्वारा पूछताछ के लिए उठाए गए या हिरासत में लिए गए मामलों में मौतों की संख्या तोजी से बढ़ी है.

अधिकारी ने कहा, 'अदालत की तरफ से रिमांड पर भेजे जाने के मामले में पुलिस की जवाबदेही तय हो जाती है. उन्हें रिमांड के बाद आरोपी को अदालत में पेश करना होता है लेकिन जिन मामलों में पुलिस आरोपी को अदालती रिमांड के बिना पूछताछ के लिए उठाती है उन्हें अदालत में पेश करने की बाध्यता नहीं होती. वहां पुलिस को उत्पीड़न की पूरी छूट मिल जाती है. अक्सर पुलिस की पिटाई से और कभी-कभार पुलिस की पिटाई से तंग आकर खुद आरोपी ही खुदकुशी कर लेता है.'

दागदार यूपी पुलिस

ड्यूटी के दौरान लापरवाही और कानून सम्मत बर्ताव नहीं किए जाने के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस का रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है. 2014 में कुल 416 पुलिस वालों को बर्खास्त किया गया या उनकी सेवा समाप्त कर दी गई. 

दिल्ली में सबसे ज्यादा 68 पुलिसवालों को बर्खास्त किया गया जबकि उत्तर प्रदेश में 62 पुलिसवालों को नौकरी से निकाला गया. इसके बाद पंजाब और गुजरात में क्रमश: 59 और 28 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त किया गया.

1999 से एनसीआरबी की रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को शामिल किया गया है. इसके तहत अवैध हिरासत, फर्जी मुठभेड़, उगाही और मारपीट जैसे मामलों पर गौर किया जाता है.

2012 में मानवाधिकार उल्लंघन करने वाले शीर्ष पांच राज्यों की पुलिस में उत्तर प्रदेश पुलिस भी शामिल थी.

रिपोर्ट के मुताबिक 2012 में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में 19 पुलिस वालों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया. जबकि कुल मामलों की संख्या 205 रही.

2012 में मानवाधिकार उल्लंघन करने वाले शीर्ष पांच राज्यों की पुलिस में उत्तर प्रदेश पुलिस भी शामिल थी. 

सबसे अधिक मानवाधिकार उल्लंघन के मामले असम पुलिस के खिलाफ दर्ज हुए. इसके बाद दूसरे नंबर पर दिल्ली पुलिस, तीसरे और चौथे पायदान पर क्रमश: गुजरात और ओडिशा पुलिस शामिल थी. जबकि पांचवे नंबर पर उत्तर प्रदेश पुलिस थी जिसके खिलाफ पांच मामले दर्ज हुए.  

मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में दर्ज 205 मामलों में अधिकांश दलित और आदिवासियों के उत्पीड़न और महिलाओं से होने वाली बदसलूकी का था. 

First published: 6 August 2016, 13:51 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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