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मुलायम परिवार की जंग: अखिलेश और शिवपाल आमने-सामने!

अतुल चौरसिया | Updated on: 29 December 2015, 16:02 IST
QUICK PILL
  • अखिलेश यादव के दो सबसे खास नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर \r\nउनके चाचा शिवपाल यादव ने परिवार के भीतर चल रही उठापटक को सार्वजनिक कर \r\nदिया है.
  • उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव मुलायम परिवार के बीच आपसी खींचतान की वजह बन गया है. प्रत्याशियों की घोषणा होने के साथ ही पार्टी में भी गुटबंदी तेज हो गई है.

18 सालों में शायद ऐसा पहली बार हुआ जब लखनऊ में होते हुए भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सैफई महोत्सव के उद्धाटन से दूर रहे. दो दिन पहले मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव में सैफई महोत्सव की शुरुआत हुई लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नहीं गए. रविवार को एक बार फिर से उन्होंने सैफई जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया. रविवार को उन्हें ग्रामीण क्रिकेट लीग टूर्नामेंट का उद्घाटन करना था.

इस दूसरे झटके के बाद उन कयासों को बल मिलने लगा कि अखिलेश यादव नाराज हैं. इस नाराजगी की वजह है. दो दिन पहले ही समाजवादी पार्टी ने तीन युवा नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. इन तीनों के नाम हैं सुनील यादव 'साजन', आनंद भदौरिया और सुबोध यादव. सुनील यादव और आनंद भदौरिया को अखिलेश यादव का आंख-कान माना जाता है. जबकि सुबोध यादव एटा के विधायक रामेश्वर यादव के पुत्र हैं.

कहा जा रहा है कि तीनों को पार्टी से बाहर निकालने का फैसला खुद मुलायम सिंह यादव का है. लेकिन अखिलेश यादव इस फैसले को मानने के लिए कतई तैयार नहीं हैं. मुलायम सिंह परिवार के एक सदस्य बताते हैं, 'मुख्यमंत्री बुरी तरह से भड़के हुए हैं. उन्होंने दोनों नेताओं को वापस पार्टी में लेने की जिद ठान ली है. जल्द ही सुनील और आनंद की वापसी हो सकती है.'

सुनील यादव और आनंद भदौरिया को अखिलेश यादव का आंख-कान माना जाता है

सारा विवाद उत्तर प्रदेश में चल रहे जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव के कारण पैदा हुआ है. जिला पंचायत अध्यक्ष पद के टिकट वितरण को लेकर मचा घमासान अब मुलायम सिंह यादव के परिवार के भीतर मौजूद दरारों को सतह पर ला रहा है.

कुछ दिन पहले ही मुलायम सिंह यादव ने जिला पंचायत चुनाव संचालन की बागडोर कैबिनेट मंत्री और अखिलेश के सगे चाचा शिवपाल यादव को सौंपी है. और सैफई महोत्सव की शुरुआत होने से मात्र एक दिन पहले ही शिवपाल सिंह यादव ने दो युवा नेताओं आनंद भदौरिया और सुनील यादव ‘साजन’ को बर्खास्त कर दिया. दोनों नेता अखिलेश के बेहद करीबी है.

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त्रिमूर्ति: सुनील यादव, आनंद भदौरिया और नफीस अहमद अखिलेश के साथ/फोटो: प्रमोद अधिकारी

दोनों पर आरोप लगा है कि जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में इन लोगों ने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों का विरोध कर पार्टी विरोधी काम किया है. लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आनंद भदौरिया सीतापुर के रहने वाले हैं. वहां से सपा ने जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में सीमा गुप्ता को टिकट दिया है.

सीमा के पति शिवकुमार गुप्ता पहले बसपा में थे. बसपा से सपा में आए व्यक्ति की पत्नी को टिकट दिए जाने से नाराज सपा कार्यकर्ताओं ने कुछ दिन पहले सीमा गुप्ता की कार पर जमकर पथराव किया था. कहा गया कि इस हमले के पीछे आनंद भदौरिया की भूमिका थी.

लखनऊ से सटे उन्नाव के रहने वाले सुनील यादव ने भी लखनऊ में पार्टी उम्मीदवार को बदलवा दिया था. जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए समाजवादी पार्टी ने विजय बहादुर यादव का नाम तय किया था लेकिन सुनील ने उसे बदलवा कर अपने किसी करीबी को दिलवा दिया. इसके अलावा वह कुछ अन्य पार्टी उम्मीदवारों का भी विरोध कर रहे थे.

सैफई महोत्सव से मात्र एक दिन पहले ही शिवपाल यादव ने आनंद भदौरिया और सुनील यादव को बर्खास्त कर दिया

सीतापुर और लखनऊ की तरह कई जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव के चलते सपा में गुटबाजी तेज हो गई है. इस बात की खबर जब मुलायम सिंह तक पहुंची तो उन्होंने अपने छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को कार्रवाई का अधिकार दे दिया.

पंचायत अध्यक्ष का चुनाव रुतबे और रुपए का मामला है. उत्तर प्रदेश में पंचायत अध्यक्ष का पद असीमित पैसा और संसाधन ले आता है. इससे राजनीतिक पार्टियों को चुनावी मौसम में कई तरह की सहूलियतें मिलती हैं. लिहाजा गुटों में बंटी सपा का हर गुट इस ताकत को पाना चाहता है.

पार्टी के भीतर मौजूद बेचैनी के पीछे राजनीतिक विश्लेषक एक और संकेत देख रहे हैं. कहीं न कहीं सपा के भीतर सभी गुटों को इस बात का अहसास है कि आने वाले समय में शायद सपा की सरकार न बने. ऐसे में हर कोई अपनी पसंद या अपने आदमी को पंचायत अध्यक्ष बनवाने के लिए जोर लगा रहा है.

बहरहाल अधिकार मिलते ही शिवपाल यादव ने पहली गाज भतीजे और सीएम अखिलेश के करीबियों पर गिरा दी. अक्सर कोई पार्टी जब किसी सदस्य को बर्खास्त करती है तो उसमें समय-सीमा का उल्लेख होता है, लेकिन भदौरिया और सुनील यादव को कब तक के लिए बर्खास्त किया गया है यह भी नहीं बताया गया. दोनों को पार्टी से बाहर करने का फरमान शिवपाल के दस्तखत से जारी हुआ है जबकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं.

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डीके ठाकुर के जूतों तले भदौरिया/फोटो: प्रमोद अधिकारी

चाचा-भतीजे के बीच दरार का कारण बने सुनील यादव और आनंद भदौरिया के बारे में जानना भी जरूरी है. धरना, प्रदर्शन, घेराव, और हल्लाबोल जैसे काम जो पहले मुलायम के लिए शिवपाल किया करते थे वह काम अखिलेश के लिए अानंद भदौरिया-सुनील यादव पिछले कुछ सालों से करते आ रहे हैं. दोनों को अखिलेश की युवा टीम का प्रमुख चेहरा भी माना जाता है.

जो काम मुलायम के लिए शिवपाल किया करते थे वह काम अखिलेश के लिए अानंद भदौरिया-सुनील यादव करते हैं

नौ मार्च 2011 को लखनऊ के एएसपी बीपी अशोक ने अखिलेश यादव को अमौसी एयरपोर्ट पर गिरफ्तार कर लिया था. इस गिरफ्तारी के विरोध में लोहिया वाहिनी के अध्यक्ष भदौरिया और समाजवादी छात्र सभा के अध्यक्ष सुनील यादव  विधानसभा का घेराव करने जा रहे थे.

लखनऊ के तत्कालीन डीआईजी डीके ठाकुर ने आंनद को सड़क पर गिराकर उनके चेहरे को जूते से कुचला था. यहां हुए लाठीचार्ज में सुनील का हाथ टूट गया था. इस लाठीचार्ज की तस्वीरें इतनी भयावह थी कि तस्वीरों के आधार पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने डीके ठाकुर को नोटिस जारी कर दिया था. अखिलेश इस बात को भूले नहीं. मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उन्होंने डीके ठाकुर को हटाकर पुलिस प्रशिक्षण केंद्र में भेज दिया.

तब से ही इन दोनों नेताओं को अखिलेश का करीबी माना जाता है. 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को मिली शानदार जीत के पीछे अखिलेश की जिस साइकिल यात्रा को श्रेय दिया जाता है उसकी रूपरेखा तैयार करने का काम इन्हीं दोनों नेताओं ने किया था.

हालांकि अखिलेश का सुनील पर भरोसा और भी पुराना है. 2008 में 34 वर्षीय सुनील से जुड़ी एक घटना दिलचस्प है. कहा जाता है कि इसके बाद से ही अखिलेश का भरोसा इन पर जम गया था. लखनऊ में छात्रसंघ की बहाली के समर्थन में सुनील कुछ छात्रों के साथ धरना दे रहे थे. इस धरने के समर्थन में शिवपाल यादव भी जा पहुंचे. वहां बेहद अप्रत्याशित घटनाक्रम में यूपी पुलिस के एक सिपाही ने शिवपाल को तमाचा जड़ दिया.

डीआईजी डीके ठाकुर ने आंनद को सड़क पर गिराकर उनके चेहरे को जूते से कुचला, सुनील का हाथ टूट गया

इसके बाद पैदा हुई अफरा-तफरी में पुलिस ने गोली चलायी जो एक कार्यकर्ता को लगी. शिवपाल को बचाने के चक्कर में सुनील घायल हो गए. उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर 19 दिन तक हिरासत में रखा. अब उसी सुनील यादव को उन्हीं शिवपाल यादव ने सफाई का मौका दिए बिना पार्टी से निकाल दिया है.

यह हमला एक तरह से अखिलेश यादव के विश्वस्त कोर ग्रुप पर हुआ है. अखिलेश की दूरगामी योजना में तीन युवा नेता आते हैं. इनमें अानंद भदौरिया ठाकुर हैं, सुनील, यादव हैं और नफीस अहमद अल्पसंख्यक हैं. तीनों छात्र राजनीति से आए हैं और हमेशा अखिलेश की छाया के रूप में मौजूद दिखते हैं. जाहिर है इनके जरिए जाति और धर्म के समीकरणों को भी अखिलेश ने अच्छी तरह से साधा है.

इनमें से दो नेताओं को बाहर निकाल कर शिवपाल यादव ने अखिलेश की उस विश्वस्त टीम को ही लगभग तोड़ दिया है जो उनकी भविष्य की योजना का हिस्सा हैं. देखा जाए तो शिवपाल को 2012 में सरकार बनने के बाद पहली बार इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिली है और इसके साथ ही इतना बड़ा विवाद भी खड़ा हो गया है.

मुलायम परिवार के बीच मौजूद टकराव की खबरें जब तब आती रहती है. मार्च 2012 में जब समाजवादी पार्टी को अभूतपूर्व बहुमत हासिल हुआ तभी से अखिलेश यादव और शिवपाल के बीच टकराव की खबरें आने लगी थीं. उस समय का बड़ा दिलचस्प वाकया है.

शिवपाल को बचाने के चक्कर में सुनील घायल हो गए. उसी सुनील यादव को शिवपाल यादव ने पार्टी से निकाल दिया

मुलायम सिंह यादव ने पार्टी का नेता यानी मुख्यमंत्री का नाम घोषित करने के लिए पांच, विक्रमादित्य मार्ग स्थित सपा के दफ्तर में बैठक बुलाई थी. यह लगभग तय था कि अखिलेश यादव के नाम की घोषणा होगी. इसके बावजूद बैठक में जाने से पहले तक शिवपाल यादव लगातार यह बयान दे रहे थे कि मुख्यमंत्री पद पर नेताजी ही बैठेंगे. जबकि ज्यादातर नेता अखिलेश को समर्थन दे चुके थे.

खैर अखिलेश के नाम की घोषणा हुई. इसके बाद भी लंबे समय तक इस बाबत खबरें आती रहीं कि शिवपाल यादव नाराज हैं. वे खुद मुख्यमत्री पद के आकांक्षी थे.

हाल के दिनो में शिवपाल यादव तेजी से मौके-बेमौके सार्वजनिक मंचों पर उभरे हैं. जानकार इसे परिवार में रामगोपाल यादव के घटते कद से जोड़कर देख रहे हैं. नोएडा के चीफ इंजीनियर यादव सिंह मामले में रामगोपाल और उनके बेटे अक्षय का नाम आने के बाद शिवपाल कई मंचों पर दिखने लगे है. पिछले महीने नीतीश सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में सपा की तरफ से उन्होंने ही शिरकत की थी.

इसी तरह हाल के दिनों में शिवपाल ने कई बार अमर सिंह से भी मुलाकात की है. उन्होंने अमर सिंह और मुलायम सिंह के बीच मुलाकात में मध्यस्थता भी की है. गैरतलब है कि रामगोपाल यादव सार्वजनिक रूप से अमर सिंह की आलोचना करते रहे हैं, बावजूद इसके शिवपाल हमेशा अमर सिंह से मिलते जुलते रहे. जानकारों के मुताबिक यह परिवार के भीतर मौजूद असहजता के कारण ही था.

अब यह लड़ाई चाचा-भतीजे की है, जिसमें पहले हथियार कौन डालेगा, यह तय होना बाकी है. हालांकि मुलायम सिंह यादव अंपायर के तौर पर बीच में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जैसा वे अब तक करते रहे हैं.

(निखिल कुमार वर्मा के सहयोग के साथ)

First published: 29 December 2015, 16:02 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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